Saturday, April 26, 2014

क्या है ग्रहों की महादशा?


ज्योतिषाचार्य डॉ.दत्तात्रेय होस्केरे-

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आज के इस आलेख में बदलते समय और उसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव का विश्लेषण किया गया है जो इस प्रकार है. यदि हम सूर्य की, चन्द्र और पृथ्वी की सापेक्ष खगोलीय स्थिति का अध्ययन करें तो पता लगता है, कि इनमें प्रतिपल कुछ न कुछ आंशिक परिवर्तन होता है. हो सकता है ये अत्यंत सूक्ष्म हो और इससे ज्यादा सूक्ष्म सापेक्ष परिवर्तन अन्य ग्रहों का भी हो सकता है. हम सभी अवगत हैं कि, मनुष्य पर प्रकाश, उसकी उष्मा और जल इत्यादि का प्रभाव पड़ता है. किसी को गर्मी अच्छी लगती है तो किसी को ठंडी. कोई शीत ऋतु में ज्यादा ऊर्जावान महसूस करता है तो कोई ग्रीष्म ऋतु में ज्यादा अच्छी मानसिक स्थिति में रहता है. हम ये कह सकते हैं कि मनुष्य पर प्रत्येक ग्रह का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता है. जिस तरह सूर्य की तासीर गर्म करने की, चन्द्र की शीतलता प्रदान करने की है उसी तरह अन्य सभी ग्रहों के भी निश्चित प्रभाव हैं और इन सभी का असर समान रूप से सभी पर पड़ता है.

क्या है ग्रहों की महादशा? 

प्रत्येक मनुष्य को अपने निश्चित जीवन काल में लगभग प्रत्येक ग्रह की महादशा से होकर गुजरना पड़ता है. इसे कुछ इस तरह से समझाया जा सकता है: जैसे हम हर कक्षा में विभिन्न विषय पढ़ते है. हर विषय की एक किताब होती है, उस किताब में अध्याय होते हैं और प्रत्येक अध्याय के अंतर्गत अलग अलग टॉपिक्स होते हैं. ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन एक कक्षा है जिसमें विभिन्न ग्रहों की अलग अलग किताबें हैं. जिन्हें पढ़ना आवश्यक है. इन किताबों को महादशा कह सकते हैं.  प्रत्येक ग्रह की किताब कम या ज्यादा पन्नों की है. जैसे शुक्र की किताब सबसे ज्यादा मोटी है, क्योंकि उसकी महादशा भी सबसे ज्यादा  20 वर्ष की है. प्रत्येक ग्रह की किताब में शेष सभी ग्रहों के छोटे-छोटे अध्याय हैं जिन्हे हम प्रत्यंतर दशा कहते है. इसी तरह और भी विभक्तिकरण हम कर सकते हैं. आइये जानते हैं किस ग्रह की मह दशा कितने वर्षों की है: सूर्य:6 वर्ष, चन्द्र:10वर्ष, मंगल और केतु:7 वर्ष, बुध:17वर्ष, गुरु:16 वर्ष, शुक्र:20 वर्ष, शनि:19वर्ष, राहु: 18वर्ष.
हर मनुष्य पर विभिन्न ग्रह दशाओं का प्रभाव, उसकी लग्न कुंडली में उस ग्रह की स्थिति के अनुसार पड़ता है. उदाहरण के लिये यदि किसी व्यक्ति की लग्न कुंडली में चन्द्र उच्च का है या कारक भाव में है, तो चन्द्र की महदशा में उसे लाभ होगा. आइये जानते हैं, विभिन्न ग्रहों की दशाओं में कैसा प्रभाव पड़ता है:

1.सूर्य की महादशा: 

सूर्य आत्मा,शक्ति और लक्ष्मी का कारक ग्रह है. इसे पिता के रूप में भी देखा जाता है. यदि लग्न  कुंडली में सूर्य उच्च का होकर मेष राशि में हो, लग्नस्थ या नवम भाव में हो तो अनुकूल प्रभाव देता है. सिंह और धनु राशि के जातकों के लिये लाभदायक है और तुला तथा कुम्भ राशि के जातकों को कुछ कष्ट हो सकता है. वैसे सूर्य की महादशा में मनुष्य की आदतों में अवश्य परिवर्तन आता है. चूंकि सूर्य तुला राशि में नीच का होता है इसलिये इस राशि के जातकों को सूर्य की महादशा प्रारम्भ होते ही अपनी आदतों और संगति दोनो पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी चाहिये. अधिकतम लाभ के लिये बेल के वृक्ष की प्रतिदिन पूजा करें. सूर्य को जल दें.

2.चन्द्र की महादशा: 

चन्द्रमा मन, माता,राज्य कृपा इत्यादि का कारक ग्रह है. यदि आपकी कुंडली में चन्द्र उच्च का होकर वृषभ राशि में है या चतुर्थ भाव में है तो चन्द्र की महादशा में आपको सकारात्मक परिणाम मिलेंगे. वृश्चिक राशि के जातकों को सर्वाधिक लाभ हो सकता है. वैसे तो चन्द्र की महादशा किसी के लिये भी कष्टकारक नही होती. लेकिन यदि आपकी कुंडली में चन्द्र राहु या शनि द्वारा दृष्ट है या उनकी युति में है तो भावनात्मक कष्ट हो सकते हैं. लाभ के लिये शिव जी की आराधना करें. चाँदी का एक सिक्का अपने पास रखें.

3.मंगल की महादशा: 

मंगल को वीरता, छोटा भाई, शत्रु और भूमि का कारक माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में मंगल उच्च का होकर मकर राशि में है या तीसरे या छठवें भाव में है तो आपको मंगल के दशा में लाभ होगा. कर्क और मीन राशी के जातकों के लिये मंगल की महादशा लाभदायक होती है. वृषभ,कन्या और मकर राशि के जातकों को मंगल की महादशा में अत्याधिक क्रोध के कारण हानि हो सकती है. मंगल की महादशा में भूमि,स्वास्थ्य और रोजगार सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिये हनुमत आराधना कर एक ताँबे का सिक्का अपने पास हमेशा रखें.

4.बुध की महादशा: 

बुध को विद्या,बुद्धि, विवेक और कार्य क्षमता का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में बुध कन्या राशि में अवस्थित उच्च का है या चौथे अथवा दशम भाव में है तो बुध की महादशा आपके लिये विकास के बहुत सारे अवसर लेकर आयेगी. वैसे तो बुध की महादशा सभी के लिये सामान्य होती है लेकिन कन्या व मिथुन राशि के जातकों के लिये उत्तम होती है. मीन राशि के जातकों के निर्णय बुध की महादशा में गलत हो सकते हैं. विद्या प्राप्ति और कार्य क्षमता बढ़ाने के लिये बुध की महदशा में विधारा की जड़ धारण करें. गणेश जी का प्रतिदिन पूजन करें.

5.गुरु की महादशा:  

गुरु को गुरु, संतान,देह और सौन्दर्य का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में गुरु दूसरे, पाँचवे,नवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में है तो आपको गुरु की महादशा में लाभ होगा. यदि गुरु मकर राशि में पड़कर नीच का है या राहु अथवा शनि द्वारा दृष्ट है तो हानि भी हो सकती है. मेष राशि के जातकों को व्यवसायिक उन्नति   और प्रमोशन जैसे लाभ गुरु की महादशा में ही होते हैं. कन्या राशि के जातकों को गुरु की महादशा में राज्य से सम्बन्धित हानि हो सकती है. समग्र उन्नति के लिये गुरु की महादशा में केले के पेड़ का पूजन कर विष्णु मंत्रों का जप करें.

6. शुक्र की महादशा:

शुक्र को शास्त्रों में पत्नि सुख, वाहन,प्रेम, सौन्दर्य इत्यादि का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी कुंडली में शुक्र सप्तम भाव में है या मीन राशि में अवस्थित उच्च का है तो आपको शुक्र की महादशा में अद्वितीय लाभ होगा. शुक्र यदि कन्या राशि में है, तो आर्थिक हानि हो सकती है. मिथुन मकर और कुम्भ राशि के जातकों के लिये शुक्र की महादशा अत्यंत लाभदयक हो सकती है. कर्क और वृश्चिक राशि के जातकों को आर्थिक निर्णय सोच समझ कर लेने होंगे. शुक्र की महादशा में अधिकतम लाभ के लिये श्वेत अश्व का दर्शन प्रतिदिन करें. लक्ष्मी जी की आराधना करें.

7.शनि की महादशा: 

शनि को आयु, जीविका, नौकरी इत्यादि का कारण माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में शनि तुला में होकर उच्च का है अथवा छठवें,आठवें,दसवें या बारहवें भाव में है तो आपको सम्पन्नता की राह दिखाता है. वृषभ और कन्या राशि के जातकों के लिये शनि की महादशा लाभदायक होती है. मेष, सिंह और धनु राशि के जातकों को न्याय सम्बन्धी समस्याएं आ सकती है. वैसे तो शनि की महादशा में सभी को हर तरह की परिस्थियों से दो चार होना पड़ता है, क्योंकि शनि की महादशा 19 वर्ष की एक लम्बी अवधि होती है. अधिकतम लाभ के लिये पीपल के पेड़ की छाँव में बैठ कर शनि मंत्रों का जाप करना या लोहे का एक छल्ला मध्यिका में पहनें.

8.राहु की महादशा: 

राहु एक छाया ग्रह है और दादा और पूर्वजों का कारक ग्रह है. मनुष्य के जीवन में जब भी कोई अवस्था ऐसी हो जब उसे कुछ सूझ न रहा हो तो समझना चाहिये कि राहु का प्रभाव है.  राहु अस्थिरता का कारक ग्रह है. यदि आपकी कुंडली में मिथुन राशि में है तो अपनी महादशा में सकारात्मक प्रभाव देगा. आपकी कुंडली में राहु यदि दशम भावस्थ है तो अपनी महादशा में व्यवसायिक प्रगति दे सकता है. राहु की महादशा में शिव जी की आराधना अवश्य करें. चन्दन का एक टुकड़ा कंठ में धारण करें. लाभ के लिये अच्छे लोगों से मित्रता करें.

9.केतु की महादशा: 

राहु के तरह केतु भी एक छाया ग्रह है जो धनु राशि में उच्च का होता है. ये नाना और अन्य पितरों का कारक ग्रह है. केतु की महा दशा में अनचाहे कार्यों को करने के स्थिति आ सकती है. मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में फंस सकता है. यदि आपकी कुंडली में लग्नस्थ केतु सूर्य की युति में है तो अपनी दशा में आपको आर्थिक लभ दे सकता है. लाभ के लिये मत्स्यावतार का पूजन करें. पानी से भरा एक बर्तन सदैव अपने आसपास रखें.
वैसे यह आम धारणा है कि राहु, केतु और शनि अपनी महादशा में मनुष्य का अहित करते हैं, जो कि गलत है. 

हमारे पुरातन आध्यात्म में स्थिरता, नेकनियती और सत्कर्म को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है. जो भी इन सभी नियमों का पालन कर दृढ़ता से अपने  कार्य को सम्पादित करता है, उसे ये तीनो ही ग्रह अत्याधिक लाभ देते हैं. सभी ग्रहों की महादशा मनुष्य को एक सन्देश देती है कि प्रत्येक मनुष्य को विभिन्न समय चक्र से गुजर कर ही अपने आप को सफल साबित करना है, अत: किसे भी ग्रह की महादशा अपनी नैतिकता को न खोयें. प्रत्येक ग्रह की महादशा आपके लिये सफलता का एक पायदान है




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