Thursday, April 3, 2014

नवरात्रों में नवग्रह शात्नि पूजा विधि

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या देवी सर्व भूतेषु बुद्धि रूपेण संस्थिता 
नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमस्तुभ्यं नमो नम: ।।

नवरात्रि के नौ दिनों में नौ ग्रहों की शान्ति पूजा की जाती है. 

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प्रतिपदा के दिन मंगल ग्रह की शान्ति हेतू पूजा की जाती है. द्वितीया तिथि के दिन राहू ग्रह की शान्ति पूजा की जाती है. तृ्तिया के दिन बृ्हस्पति के दिन, चतुर्थी के दिन शनि ग्रह, पंचमी के दिन बुध, षष्ठी के दिन केतु, सप्तमी के दिन शुक्र, अष्टमी के दिन सूर्य व नवमी के दिन चन्द्र देव की शान्ति पूजा की जाती है.

यह शान्ति क्रिया शुरु करने से पहले कलश की स्थापना और माता की पूजा करनी चाहिए. पूजा के बाद लाल वस्त्र पर एक यंत्र बनाया जाता है. इस यंत्र में नौ खाने बनाये जाते है. पहले तीन खानों में उसमें बुध, शुक्र, चन्द्र, बीच में गुरु, सुर्य, मंगल और नीचे के खानों में केतु, शनि, राहू को स्थान दिया जाता है.

इसके बाद नवग्रह बीच मंत्र की पूजा की जाती है. इसके बाद नवग्रह शात्नि संकल्प लिया जाता है. इसके बाद दिन अनुसार ग्रह के मंत्र का जा किया जाता है.

ग्रहों के मंत्र इस प्रकार है.

सूर्य बीज मंत्र -         ऊँ ह्रां ह्रीं ह्रौं स: सूर्याय नम: 
चन्द्र बीज मंत्र -            ऊँ श्रां श्रीं श्रौं स: चन्द्रमसे नम: 
मंगल बीज मंत्र-           ऊँ क्रां क्रीं क्रौं स: भौमाय नम: 
बुध बीज मंत्र -         उँ ब्रां ब्रीं ब्रौ स: बुधाय नम: 
गुरु बीज मंत्र -         ऊँ ग्रां ग्रीं ग्रौं स: गुरवे नम: 
शुक्र बीज मंत्र -          ऊँ द्रां द्रीं द्रौ स: शुक्राय नम: 
शनि बीज मंत्र -              ऊँ प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम: 
राहू बीज मंत्र -           उँ भ्रां भ्रीं भौं स: राहुवे नम: 
केतु बीज मंत्र -             उँ स्त्रां स्त्रीं स्त्रौं स: केतवे नम: 

दुर्गासप्तशती में सात सौ महामंत्र होने से इसे सप्तशती कहते है. सप्तशती उपासना से असाध्य रोग दूर होते है. और आराधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती है.

नवरात्रों में ध्यान देने योग्य बातें 


नवरात्रों की पूजा करते समय ध्यान देने योग्य यह विशेष बात है कि एक ही घर में तीन शक्तियों की पूजा नहीं करनी चाहिए. देगी को कनेर और सुगन्धित फूल प्रिय है. इसलिये पूजा के लिये इन्ही फूलों का प्रयोग करें, कलश स्थापना दिन में ही करें, मां की प्रतिमा को लाल वस्त्रों से ही सजायें. साधना करने वाले को लाल वस्त्र या गर्म आसन पर बैठकर पूजा करनी चाहिए.

उपवासक को क्या नहीं करना चाहिए 


नवरात्रों का व्रत करने वाले उपवासक को दिन में केवल एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए. मांस, मदिरा का त्याग करना चाहिए. इसके अतिरिक्त नवरात्रों में बाल कटवाना, नाखून काटना आदि कार्य भी नहीं करने चाहिए. ब्रह्मचार्य का पूर्णत: पालन करना चाहिए. नवरात्रे की अष्टमी या नवमी के दिन दस साल से कम उम्र की नौ कन्याओं और एक लडके को भोजन करा कर साथ ही दक्षिणा देनी चाहिए.

लडके को भैरव का रुप माना जाता है. कंजनों को भोजन करवाने से एक दिन पूर्व रात्रि को हवन कराना विशेष शुभ माना जाता है. कंजकों को भोजन करवाने के बाद उगे हुए जौ और रेत को जल में विसर्जित कर दिया जाता है. कुछ जौं को जड सहित उखाडकर समृ्द्धि हेतू घर की तिजौरी या धन रखने के स्थान पर रखना चाहिए.
कलश के पानी को पूरे घर में छिडक देना चाहिए. इससे घर से नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है. और नारियल को माता दुर्गा के प्रसाद स्वरुप खा लिया जाता है.


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Friday, March 28, 2014

अद्भुत है पारद-शिवलिंग ( या इसे रसलिंग भी कहते है) की पूजा

                                                     आलेख - आशुतोष जोशी 

पारद शिवलिंग शिव जी को अत्यन्त प्रिय है. पारद शिवलिंग की पूजा विशेष फलदायी मानी गई है. विशेष रुप से यह पूजा सुख सम्रद्धी और शांती के लिए की जाती रही है और घर में सकारात्मक उर्जा के सतत प्रवाह के लिए हर घर में पारद शिवलिंग रखा जा सकता है. किंतु पारद शिवलिंग का आकार बहुत बडा नही होना चाहिये.


                                                                      "पारदसंहिता"


केदारादीनि लिंगानी पृथ्वियं यानि कानिचित

तानि दृष्टिवाच यत्पुण्य तत्पुण्यं रसदर्शनात।।


इस पृथ्वी पर केदारनाथ से लेकर जितने भी महादेव जी के लिंग (प्रतिमा) है, उन सबसे दर्शन से जो पुण्य होता है, वह पुण्य केवल इस के  ( या इसे रसलिंग भी कहते है) दर्शन करने मात्र से ही मिल जाता है।


 

गोध्नाश्चैव कृतघ्नाश्चैव वीरहा भ्रूणहापि वा
शरणागतघातीच मित्रविश्रम्भघातकः
दुष्टपापसमाचारी मातृपितृप्रहापिवा
अर्चनात रसलिङ्गेन् तक्तत्पापात प्रमुच्यते |

अर्थात् गौ का हत्यारा , कृतघ्न , वीरघती गर्भस्थ शिशु का हत्यारा, शरणगत का हत्यारा, मित्रघाती, विश्वासघाती, दुष्ट, पापी अथवा माता-पिता को मारने वाला भी यदि पारद शिवलिंग की पूजन करता है तो वह भी तुरंत सभी पापों से मुक्त हो जाता है |

पारद शिवलिंग की पूजा में जल, ढुध , दही या कोई अन्य तरल पदार्थ को शिवलिंग के ऊपर अर्पित नही करना चाहिये क्योकि शिवलिंग के खंडित होने की सम्भावना अधिक होती है. 

बिल्पत्र, पुष्प, मिश्री , अक्षत ( चावल) , नाग्केसर, रुद्राक्ष, कलम गत्ते, गोमती चक्र आदि पर अर्पित करके पारद शिवलिंग की पूजा करना हमेशा ही लाभदायी होता है.

पारद शिवलिंग की पूजा का महत्व इसलिए भी है क्योकि यह पूजा, वास्तु दोष और अशुभ-तंत्रो के प्रभावो को दूर कर देती है तथा साधक की रक्ष करती है.

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Thursday, March 27, 2014

कार्तिक महीने का सबसे ज्यादा महत्व है


Collection from -( Writer - स्वर्गपति दास -)  http://hindi.webdunia.com

भगवान कृष्ण के लिए कार्तिक महीने का सबसे ज्यादा महत्व है। उन्होंने इस महीने में सबसे ज्यादा लीलाएं इस धराधाम पर कीं। 

भगवान विष्णु और राधारानी को भी यह महीना सबसे अधिक पसंद है। भगवान विष्णु ने इसमें मस्य अवतार लिया था और राधारानी को यह महीना इसलिए पसंद है क्योंकि इसमें भगवान कृष्ण ने विलक्षण लीलाएं की हैं। तुलसी महारानी के लिए भी यह महीना बेहद महत्व रखता है। तुलसी महारानी का प्राकट्य धराधाम पर कार्तिक की शरद पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। 

कार्तिक की शरद पूर्णिमा सबसे अधिक महत्व इसलिए है क्योंकि इस पावन दिवस पर भगवान कृष्ण ने महारास रचाया था। इस दिन वैसे भी चांद की किरणों की शोभा निराली होती है। चांद का यौवन और शीतलता अद्भुत होती है। इस रात्रि वैष्णव भक्त खीर बनाकर उसे चंद्रमा की किरणों से आपुरित करके अगले दिन यह अमृत प्रसाद पाते हैं। 


ND
कार्तिक पूर्णिमा के दिवस पर स्वयं भगवान श्रीकृष्ण तुलसी महारानी की पूजा निम्नलिखित मंत्र से करते हैं :-

वृंदावनी, वृंदा, विश्वपूजिता, पुष्पसार।
नंदिनी, कृष्णजीवनी, विश्वपावनी, तुलसी। 

इस मंत्र से पूर्णिमा के दिन जो भी श्रद्धालु तुलसी महारानी की पूजा करता है वह जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त होकर गोलोक वृंदावन जाने का अधिकारी बनता है। 

पद्म पुराण के अनुसार कार्तिक महीने में कई कल्पों को एकत्रित करते हुए पाप दामोदर कृष्ण को दीपदान करने से समाप्त हो जाते हैं। पद्म पुराण में कृष्ण और सत्यभामा के बीच संवाद से कार्तिक महीने में दीपदान के अद्भुत फलों का रहस्य खुलता है। पूरे कार्तिक महीने भगवान कृष्ण को (जो कि दामोदार भाव में होने चाहिए) दीया दिखाने से अश्वमेघ यज्ञ के फल से भी अधिक लाभ मिलता है। 



ND
दामोदर भाव वाले कृष्ण यशोदा के द्वारा ऊखल से बांधे गए थे, लेकिन अपने भक्तों के दीपदान से वे उनको सांसारिक सभी बंधनों से छुटकारा दिला देते हैं। पद्म पुराण के अनुसार कार्तिक में दीपदान करने वाले श्रद्धालु के पितर और अन्य परिजन कभी नरक का मुंह नहीं देखते। पूरे महीने दीपदान करके कोई भी श्रद्धालु अपनी संपत्ति दान देने के बराबर फल प्राप्त कर सकता है। जो श्रद्धालु किसी अन्य व्यक्ति को दीपदान के लिए अगर प्रेरित करता है तो उसे अग्निस्तोम यज्ञ का फल मिलता है। 

गंगा या पुष्कर में स्नान करने के भी कार्तिक में बहुमूल्य लाभ हैं। इस स्थानों में स्नान करने से श्रद्धालुओं को अनगिनत पुण्य की प्राप्ति होती है।

स्कन्द पुराण में ब्रह्मा जी और नारद के बीच कार्तिक मास में दीपदान की महिमा को लेकर खासी चर्चा हुई है। उनके अनुसार ज्येष्ठ-आषाढ़ के जल दान या फिर पूरा अन्न दान के बराबर फल केवल दीपदान से मिल जाता है। इसके अतिरिक्त ब्रह्मा जी ने दीपदान को राजसुय यज्ञ और अश्वमेघ यज्ञ के समान बताया गया है। पूरे साल भर में तपस्या और भक्ति के लिए निर्दिष्ट चार महीनों यानी चातुर्मास के तीन महीनों का फल अकेले कार्तिक मास में भगवान की सेवा करके प्राप्त किया जा सकता है। 

विशेष कर कार्तिक माह के आखिरी पांच दिनों, जो कि भीष्म पंचक कहलाता है उसमें की गई तपस्या का फल पूरे साल की तपस्या के बराबर है। 


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एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व

Information collected by - Ashutosh Joshi 

From 
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 http://hi.wikipedia.org



एकादश्यां यथोद्दिष्टा विश्वेदेवाः प्रपूजिताः।
प्रजां पशुं धनं धान्यं प्रयच्छन्ति महीं तथा।।


एकादशी पूजा मंत्र!

 

अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।
मृत्तिके हर मे पापं जन्मकोटयां समर्जितम्॥

This MANTRA is taken from 
www.onlineprasad.com 


शास्त्रों के अनुसार हिन्दू वर्ष के बारह माह बताए गए हैं और हर माह में दो एकादशी आती हैं क्योंकि प्रत्येक माह में दो पक्ष बताए गए हैं। एक है कृष्ण पक्ष और दूसरा है शुक्ल पक्ष। दोनों ही पक्षों में एकादशी व्रत का गहरा धार्मिक महत्व है।

मूलत: एकादशी व्रत भगवान श्रीहरि को समर्पित है। जो भक्त यह व्रत रखता है उसे भगवान विष्णु की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है। ऐसे लोगों को जीवन के दुख-दर्द नहीं सताते हैं। साथ ही व्यक्ति सदैव निरोगी और स्वस्थ रहता है।

एकादशी व्रत का धार्मिक महत्व है साथ ही यह मानसिक एवं शारीरिक पवित्रता के लिए भी महत्वपूर्ण है। निरोग रहने में यह व्रत श्रेष्ठ उपाय है। यह मन को संयम का भाव सिखाता है। शरीर को नई ऊर्जा प्रदान करता है।

प्रतिदिन चन्द्रमा के घटने और बढऩे का सीधा प्रभाव सभी जीवों और वनस्पतियों पर पड़ता है।  हिन्दू पंचांग तिथियों पर आधारित होता है। इन तिथियों और चन्द्रमा क स्थितियों में गहरा संबंध है।  उसका असर भी शरीर पर वैसा ही पडता है। हर मास में दो एकादशी होती है और इन दोनों तिथियों पर आहार संयम रखा जाए तो यह हमारी पाचन क्रिया को बल प्रदान करता है। शरीर निरोगी बना रहता है।
 नाममासपक्ष
कामदा एकादशीचैत्रशुक्ल
वरूथिनी एकादशीवैशाखकृष्ण
मोहिनी एकादशीवैशाखशुक्ल
अपरा एकादशीज्येष्ठकृष्ण
निर्जला एकादशीज्येष्ठशुक्ल
योगिनी एकादशीआषाढ़कृष्ण
देवशयनी एकादशीआषाढ़शुक्ल
कामिका एकादशीश्रावणकृष्ण
पुत्रदा एकादशीश्रावणशुक्ल
अजा एकादशीभाद्रपदकृष्ण
परिवर्तिनी एकादशीभाद्रपदशुक्ल
इंदिरा एकादशीआश्विनकृष्ण
पापांकुशा एकादशीआश्विनशुक्ल
रमा एकादशीकार्तिककृष्ण
देव प्रबोधिनी एकादशीकार्तिकशुक्ल
उत्पन्ना एकादशीमार्गशीर्षकृष्ण
मोक्षदा एकादशीमार्गशीर्षशुक्ल
सफला एकादशीपौषकृष्ण
पुत्रदा एकादशीपौषशुक्ल
षटतिला एकादशीमाघकृष्ण
जया एकादशीमाघशुक्ल
विजया एकादशीफाल्गुनकृष्ण
आमलकी एकादशीफाल्गुनशुक्ल
पापमोचिनी एकादशीचैत्रकृष्ण
पद्मिनी एकादशीअधिकमासशुक्ल
परमा एकादशीअधिकमासकृष्ण

एकादशी व्रत करने की इच्छा रखने वाले मनुष्य को दशमी के दिन से कुछ अनिवार्य नियमों का पालन करना पड़ेगा। इस दिन मांस, प्याज, मसूर की दाल आदि का निषेध वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए। रात्रि को पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए तथा भोग-विलास से दूर रहना चाहिए।
एकादशी के दिन प्रात: लकड़ी का दातुन न करें, नींबू, जामुन या आम के पत्ते लेकर चबा लें और उँगली से कंठ साफ कर लें, वृक्ष से पत्ता तोड़ना भी ‍वर्जित है। अत: स्वयं गिरा हुआ पत्ता लेकर सेवन करें। यदि यह संभव न हो तो पानी से बारह बार कुल्ले कर लें। फिर स्नानादि कर मंदिर में जाकर गीता पाठ करें या पुरोहितजी से गीता पाठ का श्रवण करें। प्रभु के सामने इस प्रकार प्रण करना चाहिए कि 'आज मैं चोर, पाखंडी और दुराचारी मनुष्यों से बात नहीं करूँगा और न ही किसी का दिल दुखाऊँगा। रात्रि को जागरण कर कीर्तन करूँगा।'
'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' इस द्वादश मंत्र का जाप करें। राम, कृष्ण, नारायण आदि विष्णु के सहस्रनाम को कंठ का भूषण बनाएँ। भगवान विष्णु का स्मरण कर प्रार्थना करें कि- हे त्रिलोकीनाथ! मेरी लाज आपके हाथ है, अत: मुझे इस प्रण को पूरा करने की शक्ति प्रदान करना।

यदि भूलवश किसी निंदक से बात कर भी ली तो भगवान सूर्यनारायण के दर्शन कर धूप-दीप से श्री‍हरि की पूजा कर क्षमा माँग लेना चाहिए। एकादशी के दिन घर में झाड़ू नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि चींटी आदि सूक्ष्म जीवों की मृत्यु का भय रहता है। इस दिन बाल नहीं कटवाना चाहिए। न नही अधिक बोलना चाहिए। अधिक बोलने से मुख से न बोलने वाले शब्द भी निकल जाते हैं।
इस दिन यथा‍शक्ति दान करना चाहिए। किंतु स्वयं किसी का दिया हुआ अन्न आदि कदापि ग्रहण न करें। दशमी के साथ मिली हुई एकादशी वृद्ध मानी जाती है। वैष्णवों को योग्य द्वादशी मिली हुई एकादशी का व्रत करना चाहिए। त्रयोदशी आने से पूर्व व्रत का पारण करें।
फलाहारी को गाजर, शलजम, गोभी, पालक, कुलफा का साग इत्यादि का सेवन नहीं करना चाहिए। केला, आम, अंगूर, बादाम, पिस्ता इत्यादि अमृत फलों का सेवन करें। प्रत्येक वस्तु प्रभु को भोग लगाकर तथा तुलसीदल छोड़कर ग्रहण करना चाहिए। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को मिष्ठान्न, दक्षिणा देना चाहिए। क्रोध नहीं करते हुए मधुर वचन बोलना चाहिए।
इस व्रत में स्वाध्याय की सहज वृत्ति अपनाकर ईश आराधना में लगना और दिन-रात केवल ईश चितंन की स्थिति में रहने का यत्न एकादशी का व्रत करना माना जाता है। स्वर्ण दान, भूमि दान, अन्नदान, गौ दान, कन्यादान आदि करने से जो पुण्य प्राप्त होता है एवं ग्रहण के समय स्नान-दान करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, कठिन तपस्या, तीर्थयात्रा एवं अश्वमेधादि यज्ञ करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, इन सबसे अधिक पुण्य एकादशी व्रत रखने से प्राप्त होता है।

तथ्य

  • सूर्य से चन्द्र का अन्तर जब 121° से 132° तक होता है, तब शुक्ल पक्ष की एकादशी और 301° से 312° तक कृष्ण एकादशी रहती है।
  • एकादशी को ‘ग्यारस या ग्यास’ भी कहते हैं।
  • एकादशी के स्वामी विश्वेदेवा हैं।
  • एकादशी का विशेष नाम ‘नन्दा’ है।
  • एकादशी सोमवार को होने से 'क्रकच योग' तथा 'दग्ध योग' का निर्माण करती है, जो शुभ कार्यों (व्रत उपवास को छोड़कर) में वर्जित है।
  • रविवार तथा मंगलवार को एकादशी मृत्युदा तथा शुक्रवार को सिद्धिदा होती है।
  • एकादशी की दिशा आग्नेय है।
  • चन्द्रमा की इस ग्यारहवीं कला के अमृत का पान उमा देवी करती है।
  • भविष्य पुराण के अनुसार एकादशी को विश्वेदेवा की पूजा करने से धन-धान्य, सन्तति, वाहन, पशु तथा आवास आदि की प्राप्ति होती है।

पद्म पुराण के अनुसार

देवाधिदेव महादेव ने नारद को उपदेश देते हुए कहा- 'एकादशी महान पुण्य देने वाली है। श्रेष्ठ मुनियों को भी इसका अनुष्ठान करना चाहिए।' विशेष नक्षत्रों के योग से यह तिथि जया, विजया, जयन्ती तथा पापनाशिनी नाम से जानी जाती है। शुक्ल पक्ष की एकादशी यदि पुनर्वसु नक्षत्र के सुयोग से हो तो 'जया' कहलाती है। उसी प्रकार शुक्ल पक्ष की ही द्वादशी को श्रवण नक्षत्र हो तो 'विजया' कहलाती है और रोहिणी नक्षत्र होने पर तिथि 'जयन्ती' कहलाती है। पुष्य नक्षत्र का सुयोग होने पर 'पापनाशिनी' तिथि बनती है। एकादशी व्रतों का जहाँ ज्योतिष गणना के अनुसार समय-दिन निर्धारित होता है, वहीं उनका नक्षत्र आगे-पीछे आने वाली अन्य तिथियों के साथ संबध व्रत की महत्ता बढ़ाता है।

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Wednesday, March 26, 2014

रमल से जानें अपने अभीष्ट प्रश्नों का हल

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स्नानादि से निवृत्त होकर अपने इष्टदेव का ध्यान करें तथा निम्न मन्त्र का यथासंभव या १०८ बार जप करें- 
“ॐ नमो भगवति देवी कूष्माण्डिनि सर्वकार्यप्रसाधिनि सर्वनिमित्तप्रकाशिनि एहि एहि त्वर त्वर वरं देहि लिहि मातंगिनि लिहि सत्यं ब्रूहि ब्रूहि स्वाहा।।”

मन्त्र जप के पश्चात अपने अभीष्ट प्रश्न का विचार करें तथा १६ कोष्ठकों वाले यंत्र के किसी एक कोष्ठक पर 
अपनी अंगुली रख दें। तथा सम्बन्धित प्रश्न का उत्तर प्राप्त करें।

१॰ लह्यान (खारिज) २ कब्जुल (दाखिल) ३॰ कब्जुल (खारिज़) ४॰ जमात (साबित)

५॰ फरहा (मुंकलिब) ६॰ उक़ला (मुंकलिब) ७॰ अंकीस (दाखिल) ८॰ हुमरा (साबित)

९॰ बयाज (साबित) १० नस्त्रुल (खारिज़) ११॰ नस्त्रुल (दाखिल) १२॰ अतवे (खारिज)

१३॰ नकी (मुंकलिब) १४॰ अवते (दाखिल) १५इज्जतमा (साबित) १६॰ तरीक (मुंकलिब)
दाम्पत्य जीवन कैसा रहेगा?

१॰ लह्यान (खारिज)-जीवनसाथी प्रेम का दिखावा करेगा, वास्तविक प्रेम नहीं।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-जीवनसाथी बहुत प्यार करेगा।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-जीवनसाथी प्रेम का दिखावा करेगा, वास्तविक प्रेम नहीं।
४॰ जमात (साबित)-परेशानियों एवं दिक्कतों के बाद दाम्पत्य सुख मिलेगा।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-दाम्पत्य जीवन उतार-चढ़ावपूर्ण होगा।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-दाम्पत्य जीवन उतार-चढ़ावपूर्ण होगा।
७॰ अंकीस (दाखिल)-जीवनसाथी बहुत प्यार करेगा।
८॰ हुमरा (साबित)-विवाह के काफी समय बाद सुख मिलेगा। स्थायित्व है।
९॰ बयाज (साबित)-विवाह के काफी समय बाद सुख मिलेगा। स्थायित्व है।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-जीवनसाथी प्रेम का दिखावा करेगा, वास्तविक प्रेम नहीं।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-जीवनसाथी बहुत प्यार करेगा।
१२॰ अतवे (खारिज)-जीवनसाथी प्रेम का दिखावा करेगा, वास्तविक प्रेम नहीं।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-दाम्पत्य जीवन उतार-चढ़ावपूर्ण होगा।
१४॰ अवते (दाखिल)-जीवनसाथी बहुत प्यार करेगा।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-विवाह के काफी समय बाद सुख मिलेगा। स्थायित्व है।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-दाम्पत्य जीवन उतार-चढ़ावपूर्ण होगा।
विवाह होगा या नहीं?

१॰ लह्यान (खारिज)-विवाह शीघ्र तथा अवश्य होगा एवं दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-विवाह शीघ्र तथा अवश्य होगा एवं दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-विवाह विघ्न एवं परेशानियों के उपरान्त ही संभव होगा।
४॰ जमात (साबित)-विवाह में अभी विलम्ब है।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-अनेक विवाह प्रस्तावों के आने के बाद विवाह तय होगा।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-विवाह तय होते ही टूटेगा तथा दूसरा विवाह सफल होगा।
७॰ अंकीस (दाखिल)-विवाह शीघ्र तथा अवश्य होगा एवं दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा।
८॰ हुमरा (साबित)-विवाह विलम्ब से होने की सम्भावना है।
९॰ बयाज (साबित)-विवाह में अभी विलम्ब है।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-विवाह शीघ्र तथा अवश्य होगा एवं दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-विवाह शीघ्र होने वाला है।
१२॰ अतवे (खारिज)-विवाह इसी वर्ष होने वाला है।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-विवाह होना असंभव है।
१४॰ अवते (दाखिल)-विवाह शीघ्र तथा अवश्य होगा एवं दाम्पत्य जीवन सुखमय रहेगा।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-विवाह में अभी विलम्ब है।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-अनेक विवाह प्रस्तावों के आने के बाद विवाह तय होगा।
लड़का होगा या लड़की?

१॰ लह्यान (खारिज)-गर्भ में लड़का है।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-गर्भ में लड़की है।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-गर्भ में लड़का है।
४॰ जमात (साबित)-गर्भ में लड़की है।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-गर्भ में लड़का है।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-गर्भपात आदि से संतान हानि संभव है।
७॰ अंकीस (दाखिल)-गर्भ में लड़की है।
८॰ हुमरा (साबित)-गर्भ में लड़का है।
९॰ बयाज (साबित)-गर्भ में लड़की है।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-गर्भ में लड़का है।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-गर्भ में लड़की है।
१२॰ अतवे (खारिज)-गर्भ में लड़का है।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-गर्भपात आदि से संतान हानि संभव है।
१४॰ अवते (दाखिल)-गर्भ में लड़की है।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-गर्भ में लड़का है।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-गर्भ में लड़की है।
अमुक व्यक्ति मुझसे प्रेम करता है या नहीं?

१॰ लह्यान (खारिज)-प्रेम कम करता है।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-बहुत प्रेम करता है।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-प्रेम दिखावा है।
४॰ जमात (साबित)-बहुत समय के बाद प्रेम करेगा।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-प्रेम स्थायी नहीं है।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-प्रेम दिखावा है।
७॰ अंकीस (दाखिल)-नहीं करता है।
८॰ हुमरा (साबित)-बहुत समय के बाद प्रेम करेगा।
९॰ बयाज (साबित)-बहुत समय के बाद प्रेम करेगा।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-प्रेम कम करता है।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-बहुत प्रेम करता है।
१२॰ अतवे (खारिज)-प्रेम दिखावा है।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-नहीं करता है।
१४॰ अवते (दाखिल)-बहुत प्रेम करता है।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-बहुत समय के बाद प्रेम करेगा।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-प्रेम स्थायी नहीं है।
चोरी गया धन वापस मिलेगा या नहीं?

१॰ लह्यान (खारिज)-वापस नहीं मिलेगा।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-चोर से भी दूर जा चुका है।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-वापस नहीं मिलेगा।
४॰ जमात (साबित)-वापस शीघ्र मिलेगा।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-वापस कुछ मात्रा में ही मिलेगा।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-वापस नहीं मिलेगा।
७॰ अंकीस (दाखिल)-वापस कुछ मात्रा में ही मिलेगा।
८॰ हुमरा (साबित)-वापस कुछ मात्रा में ही मिलेगा।
९॰ बयाज (साबित)-वापस शीघ्र मिलेगा।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-वापस नहीं मिलेगा।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-वापस शीघ्र मिलेगा।
१२॰ अतवे (खारिज)-चोर से भी दूर जा चुका है।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-वापस कुछ मात्रा में ही मिलेगा।
१४॰ अवते (दाखिल)-वापस शीघ्र मिलेगा।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-वापस शीघ्र मिलेगा।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-वापस कुछ मात्रा में ही मिलेगा।
मुझे किस व्यवसाय से लाभ होगा?

१॰ लह्यान (खारिज)-धोखेबाजी, चोरी एवं अनैतिक व्यक्तियों की सहायता से।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-वस्त्र, सौन्दर्यप्रसाधन एवं कृषि आदि से।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-धोखेबाजी, चोरी एवं अनैतिक व्यक्तियों की सहायता से।
४॰ जमात (साबित)-पशुपालन तथा चिकित्सा से जुड़े कार्यों से।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-कलाकारी, पंसारी, जड़ी-बूटी तथा विनोदपूर्ण कार्यों से।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-ठगी विद्या, धोखेबाजी, चोरी जानवरों के क्रय-विक्रय से।
७॰ अंकीस (दाखिल)-सोना-चाँदी, वकालत एवं वस्तुओं को कूटने-पीसने के कार्य से।
८॰ हुमरा (साबित)-पत्रवाहक के कार्य तथा भिक्षावृत्ति से।
९॰ बयाज (साबित)-पत्रवाहक के कार्य तथा भिक्षावृत्ति से।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-धोखेबाजी, चोरी एवं अनैतिक व्यक्तियों की सहायता से।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-विद्या के द्वारा।
१२॰ अतवे (खारिज)-कृषि कार्य, दलाली, दुकानदारी से।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-वस्त्र-विक्रेता, ज्योतिष, क्रय-विक्रय से।
१४॰ अवते (दाखिल)-वस्त्र, सौन्दर्यप्रसाधन एवं कृषि आदि से।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-संगीत, गायन, वादन, किसी विद्या के प्रशिक्षण से।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-ड्राइक्लीनर्स, मेवा व्यवसाय एवं गुप्तचरी से।
मुझे विदेश यात्रा से लाभ होगा या हानि?
१॰ लह्यान (खारिज)-विदेश जाने का कोई लाभ नहीं होगा।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-विदेश यात्रा से लाभ होगा।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-विदेश यात्रा से शारीरिक कष्ट होगा।
४॰ जमात (साबित)-विदेश जाने का कोई लाभ नहीं होगा।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-विदेश में मित्र से लाभ होगा।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-विदेश यात्रा से शारीरिक कष्ट होगा।
७॰ अंकीस (दाखिल)-विदेश में मित्र से लाभ होगा।
८॰ हुमरा (साबित)-विदेश यात्रा से शारीरिक कष्ट होगा।
९॰ बयाज (साबित)-विदेश यात्रा से लाभ होगा।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-विदेश में मित्र से लाभ होगा।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-विदेश यात्रा से लाभ होगा।
१२॰ अतवे (खारिज)-विदेश यात्रा से शारीरिक कष्ट होगा।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-विदेश में मित्र से लाभ होगा।
१४॰ अवते (दाखिल)-विदेश जाने का कोई लाभ नहीं होगा।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-विदेश यात्रा से लाभ होगा।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-विदेश में मित्र से लाभ होगा।
अमुक कैदी छूटेगा या नहीं?

१॰ लह्यान (खारिज)-कैदी बन्धन से मुक्त हो जायेगा।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-कैदी मुक्त नहीं होगा।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-कैदी बन्धन से मुक्त हो जायेगा।
४॰ जमात (साबित)-काफी समय तक बंधन में कष्ट भोगने के बाद छूटेगा।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-कैदी बंधन में अत्यधिक कष्ट भोगेगा तथा अधिक विलम्ब से छूटने की सम्भावना है।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-कैदी बंधन में अत्यधिक कष्ट भोगेगा तथा अधिक विलम्ब से छूटने की सम्भावना है।
७॰ अंकीस (दाखिल)-कैदी मुक्त नहीं होगा।
८॰ हुमरा (साबित)-काफी समय तक बंधन में कष्ट भोगने के बाद छूटेगा।
९॰ बयाज (साबित)-काफी समय तक बंधन में कष्ट भोगने के बाद छूटेगा।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-कैदी बन्धन से मुक्त हो जायेगा।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-कैदी मुक्त नहीं होगा।
१२॰ अतवे (खारिज)-कैदी बन्धन से मुक्त हो जायेगा।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-कैदी बंधन में अत्यधिक कष्ट भोगेगा तथा अधिक विलम्ब से छूटने की सम्भावना है।
१४॰ अवते (दाखिल)-कैदी मुक्त नहीं होगा।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-काफी समय तक बंधन में कष्ट भोगने के बाद छूटेगा।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-कैदी बंधन में अत्यधिक कष्ट भोगेगा तथा अधिक विलम्ब से छूटने की सम्भावना है।
अमुक स्थान पर गड़ा धन है या नहीं ?

१॰ लह्यान (खारिज)-नहीं है।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-है।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-नहीं है।
४॰ जमात (साबित)-मेहनत व्यर्थ जाएगी।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-थोड़ा है।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-है।
७॰ अंकीस (दाखिल)-है।
८॰ हुमरा (साबित)-मेहनत व्यर्थ जाएगी।
९॰ बयाज (साबित)-मेहनत व्यर्थ जाएगी।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-नहीं है।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-है।
१२॰ अतवे (खारिज)-नहीं है।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-होना चाहिए।
१४॰ अवते (दाखिल)-है।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-मेहनत व्यर्थ जाएगी।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-होना चाहिए।
मुकदमे में हार होगी या जीत?

१॰ लह्यान (खारिज)-जीत अवश्य होगी।
२॰ कब्जुल (दाखिल)-जीत अवश्य होगी।
३॰ कब्जुल (खारिज़)-विरोधी पक्ष प्रबल है।
४॰ जमात (साबित)-विरोधी से समझौता करना होगा।
५॰ फरहा (मुंकलिब)-जीत अवश्य होगी।
६॰ उक़ला (मुंकलिब)-विरोधी पक्ष प्रबल है।
७॰ अंकीस (दाखिल)-विरोधी पक्ष प्रबल है।
८॰ हुमरा (साबित)-विरोधी पक्ष प्रबल है। जीत नहीं होगी।
९॰ बयाज (साबित)-जीत अवश्य होगी।
१०॰ नस्त्रुल (खारिज़)-जीत अवश्य होगी।
११॰ नस्त्रुल (दाखिल)-जीत अवश्य होगी।
१२॰ अतवे (खारिज)-विरोधी पक्ष प्रबल है।
१३॰ नकी (मुंकलिब)-विरोधी पक्ष प्रबल है।
१४॰ अवते (दाखिल)-जीत अवश्य होगी।
१५॰ इज्जतमा (साबित)-विरोधी से समझौता होगा।
१६॰ तरीक (मुंकलिब)-जीत अवश्य होगी।
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