Saturday, January 29, 2011

When to construct our own House?


भवन - निर्माण कब करवाएँ ? 

अपना स्वयं का मकान हो, यह हर व्यक्ति की चाह होती है। वास्तु शास्त्र में भवन निर्माण में संबंध में अनेक बातें बताई गई है। कहा गया है कि जब शनिवार, स्वाति नक्षत्र, श्रावण मास, शुभ योग, सिंह लग्न, शुक्ल पक्ष एवं सप्तमी तिथि का योग एकसाथ हो तो उस मुहूर्त में कार्य आरंभ करना सर्वोत्तम है। लेकिन ये सातों योग कभी - कभी ही घटित होते है।

किस माह में निर्माण आरंभ करने से क्या फल प्राप्त होता है, आइए देखते है - 

माह फल 
चैत्र (मार्च - अप्रैल) तनाव, रोग, पराजय, अवनति।
वैशाख (अप्रैल - मई) आर्थिक लाभ, शुभ
ज्येष्ठ (मई - जून) दारुण कष्ट।
आषाढ (जून - जुलाई) घोर विपत्ति।
श्रावण (जुलाई - अगस्त) परिजनों के लिए शुभ व वृद्धि।
भाद्रपद (अगस्त - सितम्बर) सामान्य, कोई अर्थ लाभ नहीं।
आद्गिवन (सितंबर - अक्टूबर) पारिवारिक कलह, संबंध विच्छेद।
कार्तिक (अक्टूबर - नवंबर) समस्याजनक।
मार्गशीर्ष (नवंबर - दिसंबर) उन्नति, संपन्नता और सुख।
पौष (दिसंबर - जनवरी) संपन्नता लेकिन चोरी का भय
माघ (जनवरी - फरवरी) अनेक लाभ, लेकिन अग्नि भय।
फाल्गुन (फरवरी - मार्च) सर्वोत्तम, सदैव लाभ।

मास सुनिश्चित कर लेने के बाद राशि सूर्य भी देखना चाहिए। यथा - 

  • मेष - शुभ एवं लाभकारी।
  • वृषभ - अति आर्थिक लाभ। 
  • मिथुन - अनहोनी संभव। 
  • कर्क - शुभ (प्रभाव) परिणाम। 
  • सिंह - कार्य निर्विघ्न पूर्ण। 
  • कन्या - स्वास्थ्य की चिंता। 
  • तुला - शांति एव ंनिरंतर कार्य।
  • वृश्चिक - संपत्ति में वृद्धि 
  • धनु - हानि संभव। 
  • मकर - आर्थिक लाभ। 
  • कुंभ - मूल्यवान आभूषण संग्रह।
  • मीन - स्वास्थ्य चिंता।
तिथि - भवन निर्माण में तिथि का भी महत्व है। 

कोई भी कार्य प्रतिपदा, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी एवं अमावस्या को कभी प्रारंभ नहीं करना चाहिये। 

लग्न - वृषभ, मिथुन, वृश्चिक और कुंभ का सूर्योदय उत्तम फलदायी रहता है। 
वार - सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार मान्य एवं अच्छे माने गए है।
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Thursday, January 27, 2011

Charge your main Entrance for better prosperity


प्रवेश द्वार की वास्तु



घर का निर्माण करवाते समय वास्तु नियमों का पालन न केवल घर के  कमरों या किचन के लिये किया जाता है, बल्कि वास्तु नियम जमीन खरीदने के समय पर से ही ध्यान देने योग्य होते है। शास्त्रों के अनुसार पूर्ण वास्तु सम्मत मकान उसमें रहने वाले  परिवार के लिये अत्यन्त शुभ होता है। तथा पूरे मकान में सकारात्मक उर्जा का प्रवाह बना रहता है। (संदर्भ हेतु यहा मकान से हमारा तात्पर्य भवन, फैक्ट्री, कारखाना, गोदाम, ऑफिस, मंदिर, अस्पताल आदि से भी है।)

प्राचीन वास्तुकारों ने मकान की आकृति तथा मकान में प्रवेश हेतू बनाये गये मुखय द्वार की वास्तु अनुरुप व्याखया निम्न प्रकार से की है।

१. प्रवेश द्वार अत्यन्त मजबूत एवं सुंदर होना चाहिये।
२. प्रवेश द्वारा बनवाते समय कितना स्थान छोडना चाहिये, किस दिद्गाा में पल्ला बंद या खुलना चाहिये इसका विशेष ध्यान रखना चाहिये।
३. प्रवेश द्वार खोलते या बंद करते समय किसी प्रकार की आवाज या अडचन नहीं होना चाहिये।
४. प्रवेश द्वार को मांगलिक प्रतीक चिन्हों जैसे :- गणेद्गा जी चित्र, स्वस्तिक, ऊँ, शुभ - लाभ, कलश चित्र आदि से सजाए रखना चाहिये।
५. घर में यदि मांगलिक कार्य हो तो प्रवेश द्वार को विशेष रुप से विभिन्न प्रकार की पुष्प मालाओं, आम के पत्ते की मालाओं से सजाना चाहिये।
६. प्रवेश द्वार की  प्रतिदिन साफ - सफाई व उचित रोशनी का प्रबंध होना चाहिये।
७. सामान्यतः मकान में एक ही मुखय द्वार शुभ माना गया है। यदि एक से अधिक द्वार हो, तो उत्तर या उत्तर - पश्चिम द्वार का प्रयोग करना चाहिये।
८. पूर्वमुखी भवन का प्रवेश द्वार पूर्व या उत्तर या उत्तर - पूर्व (ईशान कोण) में होना चाहिये।
९. मुखय द्वार का आकार घर के अन्य दरवाजों से बडा होना चाहिये।
१०. प्रवेश द्वार कभी  भी मध्य में नही होना चाहिये।
११. मकान के प्रवेश द्वार के ठीक सामने पेड, बिजली का खंभा, अस्पताल या मंदिर होना अशुभ माना गया है। इसके अलावा प्रवेश द्वार के ठीक सामने कूडा - कचरा इकट्‌ठा बिल्कुल नही होना चाहिये।
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Article by -Ashutosh Joshi (Vastu Consultant)

Know about our inner powers


हमारे भीतर की शक्तियाँ

हमारे शरीर में ईश्वर प्रदत्त मुखय रुप से ६ प्रकार की शक्तियाँ होती है। मनुष्य इन शक्तियों का उचित प्रयोग करके जीवन सार्थक कर सकता है। किन्तु अनुचित प्रयोग, मनुष्य को पाप के गर्त में ले जाता है। 

१. परा शक्ति - सब शक्तियों का मूल आधार 
२. ज्ञान शक्ति - इस शक्ति से मनुष्य की मन, व बुद्धि विकसित होती है। किन्तु साथ् में अहंकार बढ  सकता है। ज्ञान शक्ति दूरदृष्टि, अंर्तदृष्टि बढाती है। 
३. इच्छा शक्ति - यह शक्ति मनुष्य के मस्तिष्क के स्नायुतंत्र को प्रभावित करके कार्य की ओर प्रेरित करती है। 
४. क्रिया शक्ति - इच्छा शक्ति को प्रबल करके हम क्रिया शक्ति को प्रभावशाली बनाते है। 
५. कुण्डलिनी शक्ति - यह मनुष्य के भीतर सुषुप्तावस्था में रहती है। योगी पुरुष तपस्या से विधिपूर्वक इस शक्ति के तेज को जाग्रत करके सिद्ध पुरुष बन जाते है। कुण्डलिनी शक्ति से मन के संचालन में नियंत्रण बढता है। 
६. मातृका शक्ति - यह शक्ति अक्षर, विद्या, बिजाक्षर, शब्द व वाक्यों की शक्ति है। मंत्रों का प्रभाव इसी मातृका शक्ति के कारण होता है। 

प्रत्येक मनुष्य को अपनी जीवनशैली मे इन शक्तियों के बीच अपने सन्तुलन को बनाये रखते हुए कार्य करना चाहिये।

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Pranayam- A deep breathing exercise


प्राणायाम 

1- ''प्राणायाम'' हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है। प्राणयाम हमारे मानसिक विकारों को दूर करके आध्यात्मिक प्रवृति की ओर प्रेरित करता है।
2- ''प्राणायाम'' शान्त हवादार स्थान पर आसन बिछाकर, उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना चाहिये।
3- ''प्राणायाम'' किसी योग्य विशेषज्ञ के साथ सीखकर ही करना चाहिये। गलत विधि अपनाने से नुकसान भी हो सकता है।
4- ''प्राणायाम'' शुरुआत में पांच मिनिट तक करके धीरे - धीरे १५ मिनिट तक ले जा सकते है।
5- ''प्राणायाम'' के लिये बैठते समय रीढ की हड्‌डी सीधी हो तथा पूरे शरीर में किसी प्रकार का तनाव या खिचाव नहीं होना चाहिये।
6- ''प्राणायाम'' करते समय वस्त्र ढीलें व सुविधाजनक पहनने चाहिये।

प्राणायाम विधि 

7- प्राणयाम शुरु करने से पहले यह ध्यान रहे कि दो - ढाई घंटे तक कुछ भी खायां पिया न हो।
8- दोनों नेत्रों को बंद करके, श्वास - प्रक्रिया पर ध्यान केन्द्रित करें।
9- अब धीरे - धीरे श्वास अंदर ले। श्वास अंदर लेते समय हम अपने इष्ट देव का स्मरण करते रहे तो ध्यान व योग बेहतर परिणाम देंगे।
10- श्वास अंदर लेने के पश्च्यात कुछ समय तक (चाहें तो पूरी प्रक्रिया में गिनती करते रहें) श्वास को रोंके रहे। (समय प्रबंध हेतू श्वास अंदर लेते समय १ से ४ तक गिनती करें, रोकते समय १ से ८ तक गिनती करें व छोडते समय १ से १६ तक गिनती करें)
12- तत्‌पश्च्यात बहुत धीरें - धीरें श्वास को छोडे। यह अभ्यास सतत्‌ करें।
13- इस प्रकार '' प्राणयाम'' की गिनती व समय धीरे - धीरे बढाते जायें।
14- '' प्राणयाम'' युवावस्था में ३० से ४० बार, प्रौढ अवस्था में ४०  से ५० बार तथा वृद्धावस्था में अपनी क्षमता के अनुसार करना चाहिये।
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Wednesday, January 26, 2011

Vastu in your Office

अपने कार्य स्थल का वास्तु कैसा हो ?

  • आपका केबिन इस तरह हो कि कुर्सी पर बैठते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर कि तरफ़ हो.
  • आपको केबिन मै क्लॉक वाइस घूमकर बैठना चाहिए.
  • आपकी कुर्सी के पीछे दीवार होना चाहिये ना कि खिड़की.यदि खिड़की है तो उसे बंद रखना उचित रहेगा.
  • आपके ऑफिस मै हवा आने के लिए खुला खुला वातावरण होना चाहिए तथा किसी भी प्रकार कि बदबू नही आना चाहिए.
  • अपने ऑफिस मै जहा तक संभव हो व्यवहार में विनम्रता रखे और हँसते रहे.क्रोध आपको विचलित रखेगा और माहौल में नकारात्मकता फैलेगी.
  • ऑफिस में टेबल पर सामान सुविधाजनक रुप से रखा होना चाहिए तथा आवशक्ततानुसार लाइट का अच्छा प्रबंध होना चाहिए.
  • केबिन का दरवाजा आपकी तबालई के एकदम  सामने ना होकर right या left में होना उचित रहता है.
  • मशीन आदि इलेक्ट्रॉनिक या मेकेनिकल items दक्षिण-पश्चिम कोने में रखना उचित रहता है.
  • ऑफिस में कबूतर के घर होना या मधुमक्खी के छत्ते होना अशुभ माना गया है.
  • यदि आप ऑफिस में मायूस रहते है या आपके अपने बॉस से अनबन रहती है तो केबिन में अगरबर्त्ती  का प्रयोग करने से लाभ मिलता है.
  • ऑफिस में हमेशा जूते  पहन कर जाना चाहिये,चप्पल पहनने से नकारात्मक ऊर्जा आती है.
  • ऑफिस जाने से पहले अपने इष्ट देवता कि पूजा करना,माता पिता का आशीर्वाद लेना हमेशा शुभ रहता है.
  • यदि अशुभ समय चल रहा हो तो घर पर पूजा करते समय लौंग से हवन करके अपने मालिक की सुख व शांति हेतु प्रार्थना करने से लाभ मिलता है. 
  • टेबल के drawers या अल्मारी आदि में अनावश्यक सामान भरना,या अव्यवस्थित ऑफिस होना अशुभ माना गया है.
Article by Ashutosh Joshi (Vastu Consultant)