Friday, February 4, 2011

Spiritual & Medicinal Importance of trees and plants


हमारी भारतीय संस्कृति में वृक्षों की पूजा विभिन्न त्योंहारों व मुहुर्त में प्राचीनकाल से चली आ रही है। नव - ग्रहों की अशुभता को दूर करने के लिये भी उपयुक्त वृक्षों को जल देना, पूजा करना आदि हिन्दू धर्म में लाभदायक माना जाता है। वैसे भी वृक्ष प्रकृति का अभिन्न अंग है और प्रकृति से ही मानव जीवन विद्यमान है। पंचतत्वों (प्‌ृथ्वी, जल, आकाश, वायु व अग्नि) के अभाव में हम इस संसार में जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते । वृक्षों की कुछ मुखय प्रजातियों का संबंध शास्त्रों में वर्णित विभिन्न आध्यात्मिक कथाओं में मिलता रहा है तथा प्रदृषण दूर करने में भी इन्हीं प्रजातियों के विशेष गुणों का महत्व रहा है। इसके अलावा वृक्षों की अनेक प्रजातियाँ कई असाध्य रोगो को दूर करने में सक्षम होती है। वृक्षों में उनकी जडों, पत्रों, तनों, फलों आदि सभी का अपना गुण होता है। जिसका उपयोग मानव कई वर्षो से करता रहा है। प्राचीन काल में वृक्षों के कंद - मूल खाकर ही महान्‌ तपस्वियों ने प्रकृति की गोद में रहकर साधना की है। आज यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम वृक्षों को काटकर, प्रकृति को नष्ट कर रहे है। प्रकृति के साथ अनावश्यक खिलवाड करके हम पर्यावरण के असंतुलन को बढा रहे है। जिसका भविष्य में खतरनाक परिणाम आने वाला है। इसके अलावा दिन  - प्रतिदिन प्रदूषण बढता जा रहा है। सडकों पर हजारों नये वाहन रोज बढ जाते है और हम सब आंखे मूंदकर यह अनर्थ होता देख रहे है। मनुष्य के निजी स्वार्थ की महत्ता इतनी अधिक है कि भविष्य में प्रकृति के असंतुलन का भयावह प्रकोप किसी को भी महसूस नहीं हो रहा है


आराध्य वृक्ष एवं पौधे
ग्रह                                  उपयुक्त वृक्ष
सूर्य                                    मंदार
चन्द्र                                   पलाश
मंगल                                 खेर
बुध                                    अपामार्ग
गुरु                                    पीपल
शुक्र                                   गूलर
शनि                                  शमी, पीपल
राहु                                    दूर्वा/चन्दन

वृक्षों की पूजा अर्चना व उनसे लाभ

खेर का पेड -                          मानसिक शांति/धैर्य
आंवला का पेड -                     वंश वृद्धि/सौभाग्य वृद्धि
जामुन का पेड -                     शारीरिक सुख/रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि
कदंम का पेड -                       बाधाएं दूर/प्रगति
आम/अशोक   -                      मानसिक बल/स्वास्थय
सुपारी का पेड -                      गृह कलह से शांति/पारिवारिक प्रेम
बिल्व पत्री का पेड -                 समद्धि में वृद्धि।
नीम का पेड -                          व्यक्तित्व के प्रभाव में वृद्धि
पलाश का पेड -                       संतान सुख में वृद्धि व नवीन कार्य में सफलता
बाँस का वृक्ष -                         विवेक का विकास

By - Ashutosh Joshi
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Tuesday, February 1, 2011

Gomad (Zircon) - A Stone for Rahu planet


Zircon -  (गोमेद)

हिन्दी नाम - गोमेद
अंग्रेजी नाम - Zircon
उपयुक्त ग्रह-  राहु
उपयुक्त दिन- शनिवार
उपयुक्त अंगुली -  मध्यमा
उपयुक्त धातु- पंचधातु और चांदी
उपयुक्त वजन- ज्योतिष सलाह के अनुसार
उपयुक्त मंत्र-         ऊँ रां राहुवे नमः


1- गोमेद मुखय रुप से राहु ग्रह का रत्न है। राहु ग्रह को शुभ बनाने के लिये चांदी की अंगुठी में गोमेद मध्यमा उंगली में पहना जाता है।

2- गोमेद हरे, काले रंग का सफेद धारियों वाला रत्न होता है। किन्तु सफेद या भूरे रंग का  (सूखे पत्ते के रंग के जैसा) भी मिलता है।

3- गोमेद मुखय रुप से गहरे, भूरे व आसमानी रंग का अपारर्दशी रत्न होता है। शुद्ध व श्रेष्ठ गोमेद चमकदार , सुन्दर और चिकना होता है।



4- बेरंगी, धब्बेवाला, लाल रंग लिये हुए जालों वाला सफेद बिंदु वाला या दो रंग का गोमेद अशुभ होता है।

5- गोमेद के साथ माणिक, मूंगा, मोती और पीला पुखराज कभी धारण नहीं करना चाहिए।

6- गोमेद की भस्म बल व बुद्धि बढाती हैं। मिरगी, बवासीर, और वायु प्रकोप में गोमेद की भस्म दूध में लेने से लाभ होता है।

7- रत्नों से रोग उपचार करने के पहले उचित जानकार वैद्य या ज्योतिष ये सलाह ले लेना चाहिए.



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Cat's Eye - Precious Stone for Ketu Planet


Cat's Eye - लहसुनिया/वैदुर्य

हिन्दी नाम - लहसुनिया/वैदुर्य
अंग्रेजी नाम - Cat's Eye
उपयुक्त ग्रह  - केतु
उपयुक्त दिन - शनिवार
उपयुक्त अंगुली- मध्यमा
उपयुक्त धातु - पंचधातु और चांदी
उपयुक्त वजन - ज्योतिष सलाह के अनुसार
उपयुक्त मंत्र -  ऊँ कें केतवे नमः


1-लहसुनिया मुखय रुप से केतु ग्रह का रत्न है। केतु ग्रह को शुभ बनाने के लिये चांदी की अंगुठी में लहसुनिया मध्यमा उंगली में पहना जाता है।

2- लहसुनिया मुखय रुप से हरे, काले रंग का सफेद धारियों वाला रत्न होता है। किन्तु सफेद या भूरे रंग का  (सूखे पत्ते के रंग के जैसा) लहसुनिया भी मिलता है।

3- लहसुनिया को यदि अंधेर में रख दिया जाए तो इसमें से हल्का प्रकाश निकलता दिखाई देता है।

4- बहुत अधिक सफेद धारियों वाला लहसुनिया अशुभ होता है। अच्छे रत्न में एक या दो सफेद धारी ही पायी जाती है। सफेद धब्बों वाला, खुरदुरा, रत्न नहीं लेना चाहिए।

5- लहसुनिया के साथ माणिक, मूंगा, मोती व पीला पुखराज नहीं पहनना चाहिए।

6- घी में लहसुनिया मिलाकर खाने से पौरुष शक्ति बढती है। लहसुनिया धारण करने अजीर्ण, मधुमेह आदि रोगों में लाभ मिलता है।

7- पीतल व लहसुनिया की भस्म को खाने से आंखों के रोग दूर हो जाते है।

8- रत्नों से रोग उपचार करने के पहले उचित जानकार वैद्य या ज्योतिष ये सलाह ले लेना चाहिए.

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Blue Sapphire (Neelam) Precious Stone for Shani


नीलम ( Blue Sapphire )

हिन्दी नाम - नीलम 
अंग्रेजी नाम - Blue Sapphire  
उपयुक्त ग्रह -         शनि 
उपयुक्त दिन - शनिवार 
उपयुक्त अंगुली -      कनिष्का 
उपयुक्त रंग-         नीला 
उपयुक्त धातु-      पंचधातु और चांदी 
उपयुक्त वजन - ज्योतिष सलाह के अनुसार 
उपयुक्त मंत्र -      ऊँ शं शनेश्चराय नमः


१. नीलम शनि ग्रह का प्रतिनिधि रत्न है तथा अन्य रत्नों की अपेक्षा इसका प्रभाव तुरंत होता है।
२. नीलम पहनने के बाद यदि चौबीस घंटे के अंदर कुछ अशुभ  घटना हो जाये, तो रत्न को तुरंत उतार देना चाहिए। 
३. यदि शनि ग्रह  जन्म पत्रिका में शुभ स्थिति में हो, तो नीलम लाभदायक रहता है। 
४. नीलम एक खनिज रत्न हैं तथा पत्थर की कुरुंदम श्रेणी का रत्न माना जाता है। 
५. असली नीलम दिखने में सुंदर, पारदर्शी नीला रंग लिये होता है। नीलम को सफेद कपडे पर रखने के बाद उसके आस - पास नीले रंग की किरणें फैल जाती है। 

६. इसके अलावा दूध में या पानी में रखने पर भी नीले रंग की किरणें असली नीलम में दिखाई देती है। 
७. धब्बेदार, दरार वाला, गड्‌ढे वाला, धुंधला, बहुत अधिक जालों वाला नीलम अशुभ  होता है।
८. यदि नीलम पहना हैं तो माणिक, पुखराज, मोती या मूंगा नही ंपहनना चाहिए। 
९. असली नीलम एक बहुमूल्य रत्न हैं तथा इसकी कीमत अन्य रत्नों की अपेक्षा अधिक होती हैं। अतः यदि नीलम नहीं खरीद सकतें हों, तो नीलम का उपरत्न ''नीली '' या कटैला (Amethyst) या लाजावर्त (Lapis Lazuli) को भी पहना जा सकता है। 
१०. नीलम शनि ग्रह को शुभ करने के अलावा कई रोगो में लाभदायक होता है। जैसे :- कफ, पित्त, वायु रोग, आंखों के रोग, खांसी, रक्त विकार आदि रोगों में नीलम की भस्म या पानी का प्रयोग किया जाता है। (रत्नों से रोग उपचार करने के पहले उचित जानकार वैद्य या ज्योतिष ये सलाह ले लेना चाहिए)

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Saturday, January 29, 2011

When to construct our own House?


भवन - निर्माण कब करवाएँ ? 

अपना स्वयं का मकान हो, यह हर व्यक्ति की चाह होती है। वास्तु शास्त्र में भवन निर्माण में संबंध में अनेक बातें बताई गई है। कहा गया है कि जब शनिवार, स्वाति नक्षत्र, श्रावण मास, शुभ योग, सिंह लग्न, शुक्ल पक्ष एवं सप्तमी तिथि का योग एकसाथ हो तो उस मुहूर्त में कार्य आरंभ करना सर्वोत्तम है। लेकिन ये सातों योग कभी - कभी ही घटित होते है।

किस माह में निर्माण आरंभ करने से क्या फल प्राप्त होता है, आइए देखते है - 

माह फल 
चैत्र (मार्च - अप्रैल) तनाव, रोग, पराजय, अवनति।
वैशाख (अप्रैल - मई) आर्थिक लाभ, शुभ
ज्येष्ठ (मई - जून) दारुण कष्ट।
आषाढ (जून - जुलाई) घोर विपत्ति।
श्रावण (जुलाई - अगस्त) परिजनों के लिए शुभ व वृद्धि।
भाद्रपद (अगस्त - सितम्बर) सामान्य, कोई अर्थ लाभ नहीं।
आद्गिवन (सितंबर - अक्टूबर) पारिवारिक कलह, संबंध विच्छेद।
कार्तिक (अक्टूबर - नवंबर) समस्याजनक।
मार्गशीर्ष (नवंबर - दिसंबर) उन्नति, संपन्नता और सुख।
पौष (दिसंबर - जनवरी) संपन्नता लेकिन चोरी का भय
माघ (जनवरी - फरवरी) अनेक लाभ, लेकिन अग्नि भय।
फाल्गुन (फरवरी - मार्च) सर्वोत्तम, सदैव लाभ।

मास सुनिश्चित कर लेने के बाद राशि सूर्य भी देखना चाहिए। यथा - 

  • मेष - शुभ एवं लाभकारी।
  • वृषभ - अति आर्थिक लाभ। 
  • मिथुन - अनहोनी संभव। 
  • कर्क - शुभ (प्रभाव) परिणाम। 
  • सिंह - कार्य निर्विघ्न पूर्ण। 
  • कन्या - स्वास्थ्य की चिंता। 
  • तुला - शांति एव ंनिरंतर कार्य।
  • वृश्चिक - संपत्ति में वृद्धि 
  • धनु - हानि संभव। 
  • मकर - आर्थिक लाभ। 
  • कुंभ - मूल्यवान आभूषण संग्रह।
  • मीन - स्वास्थ्य चिंता।
तिथि - भवन निर्माण में तिथि का भी महत्व है। 

कोई भी कार्य प्रतिपदा, चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी एवं अमावस्या को कभी प्रारंभ नहीं करना चाहिये। 

लग्न - वृषभ, मिथुन, वृश्चिक और कुंभ का सूर्योदय उत्तम फलदायी रहता है। 
वार - सोमवार, बुधवार, गुरुवार और शुक्रवार मान्य एवं अच्छे माने गए है।
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