Sunday, February 13, 2011

Make your life better (PART-1)


सुखी जीवन के सरल उपाय 

1-प्रतिदिन अगर तवे पर रोटी सेंकने से पहले दूध के छींटे मारें, तो  घर में बीमारी का प्रकोप कम होगा। 
2-प्रत्येक गुरुवार को तुलसी के पौधें को थोडा - सा दूध चढाने से घर में लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। 
3-प्रतिदिन संवेरे पानी में थोडा - सा नमक मिलाकर घर में पोंछा करें, मानसिक शांति मिलेगी। 
4-प्रतिदिन सवेरे थोडा - सा दूध और पानी मिलाकर मुखय द्वार के दोनों ओर डाले, सुख - शांति मिलेगी। 
5-मुखय द्वार के परदे के नीचे कुछ घुंघरु बांध दे, इसके संगीत से घर में प्रसन्नता का वातावरण बनेगा। 
6-प्रतिदिन शाम को पीपल के पेड को थोडा - सा दूध - पानी मिलाकर चढाएं, दीपक जलाएं तथा मनोकामना के साथ पांच परिक्रमा करें। शीघ्र मनोकामना पूरी होगी। 
7-प्रतिदिन सवेरे पहली रोटी गाय को, दूसरी रोटी कुत्ते को एवं तीसरी रोटी छत पर पक्षियों को डालें। इससे पितृदोष से मुक्ति मिलती है तथा पितृदोष के कारण प्राप्त कष्ट समाप्त होते हैं 
8-किसी भी दिन शुभ - चौघडिये में पांच किलो साबूत नमक एक थैली में लाकर अपने घर में ऐसी जगह रखें जहां पानी नहीं लगे। यदि अपने आप पानी लग जाए तो इसे काम में नहीं ले, फेंक दे तथा नया नमक लाकर रख दें। यह घर के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है एवं सकारात्मक प्रभाव को बढाता हैं


Compiled & Edited by - Ashutosh Joshi
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Wednesday, February 9, 2011

Spiritual & Medicinal Importance of trees and plants - PART- 3


पीपल - वृक्षराजः नमोस्तुते !

भारतीय संस्कृति में पीपल वृक्ष प्राचीन काल से भारतीय जनमानस में विशेष रुप से पूजनीय रहा है। ग्रंथों में पीपल को प्रत्यक्ष देवता की संज्ञा दी गई है। स्कन्दपुराण में वर्णित है कि अश्वथ ( पीपल) के मूल में विष्णु, तने मे केशव, शाखाओं में नारायण, निवास करते है। इसका आश्रय मानव के सभी पाप -ताप का शमन करता है। भगवान श्री कृष्ण कहते है - अश्वथ: सर्ववृक्षां -अर्थात समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व  और  दिव्यत्व को व्यक्त किया है।
शास्त्रों में पीपल के पूजन के समय निम्न श्लोक से प्रार्थना करना बताया गया है।

''ब्रह्म रुपेण, विष्णु रुपेण, शिव रुपेण,
वृक्षराजः नमोस्तुते।

अर्थात्‌- ब्रह्मा समान, विष्णु समान, महादेव शिव समान वृक्षराज आपको नमस्कार है।

शास्त्रों में वर्णित है कि -

अश्वथ: पूजितोयत्र पूजिताः सर्व देवताः अर्थात पीपल की सविधि पूजा - अर्चना करने से संपूर्ण देवता स्वयं ही पूजित हो जाते है। 

  1. पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढाने पर दरिद्रता, दुख और दुर्भाग्य का विनाश होता है। पीपल के दर्शन - पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है।
  2. पीपल का वृक्ष आध्यात्म की दृष्टि से उतना ही महत्वपूर्ण है जितना हमारा सांस लेना। पीपल को शास्त्रों में ''वृक्षराज'' कहा गया है जिसके अन्दर ३३ करोड देवी - देवताओं का वास होता है।
  3. अश्वथ-व्रत-अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है।  शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष के पूजन और सात परिक्रमा करने से शनि की पीडा का शमन होता है।नवग्रहों में मुखय रुप से गुरु व शनि ग्रहों की अशुभता को दूर करने के लिये पीपल के वृक्षों को मंदिर में लगाना व जल द्वारा सींचना विशेष लाभदायक माना गया है। 
  4. शनि - दृष्टि से राहत पाने के लिये हर शनिवार पीपल के वृक्ष की जड में सरसों का तेल समर्पित करके प्रार्थना करना अचूक उपाय है। 
  5. अनुराधा ऩक्षत्र से युक्त शनिवार की अमावस्या में पूजा करने से बडे संकट से मुक्ति मिल जाती है। श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान जी की पूजा करना संकट-मुक्ति का  अचूक उपाय है। 
  6. पीपल वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान करना  शुभ होता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ही ध्यान में लीन  हुए थे। अशुभ गुरु के कुप्रभावों को दूर करने के लिये तथा गुरु की प्रसन्नता के लिये पीपल उगाना र्स्वोत्तम उपाय है। 
  7. पीपल का पेड घर में नहीं उगाना चाहिए,क्योकि पीपल कि जड़ें मकान कि नीव को कमजोर कर सकती है । बल्कि मंदिर के बगीचे में पीपल का पेड गुरुवार के दिन रोपकर , उसकी नियमित देखभाल करने से धन -वैभव व उच्च ज्ञान का लाभ जरुर मिलता है। 
  8. घर के बाहर पीपल का पेड पश्चिम दिशा में ही शुभ होता है।यदि कोई वृद्ध व्यक्ति ज्यादा बीमार है तो शमशान में पीपल का पेड रोपना चाहिए।
'विष्णुप्रिया'' तुलसी

हमारी भारतीय संस्कृति में विशेषकर हिंदू धर्म में तुलसी का महत्व सबसे अधिक है। तुलसी का पौधा दिन व रात दोनों समय लगातार ऑक्सीजन अर्थात्‌ प्राणवायु  प्रवाहित करता रहता है। तुलसी के पत्ते, बीज, तना, जड आदि सभी विभिन्न प्रकार से उपयोग में लायी जाती है। रोगो को दूर करने के लिए भी तुलसी के पौधे का उपयोग होता है।

तुलसी के पौधे को ''विष्णुप्रिया'' भी कहा जाता है। इसीलिये विष्णु जी को प्रसन्न करने के लिए तुलसी का पौधा घर में लगाया जाता है। जहां तुलसी का पौधा होता हैं वहॉ मच्छरों का प्रकोप कम हो जाता है। अतः मलेरिया के रोकथाम में भी तुलसी का विशेष महत्व है। 

ब्रह्म मुहूर्त में तुलसी जी के दर्द्गान करने से स्वर्ण दान का फल मिलता है । शास्त्रों के अनुसार तुलसी जी का पौधा यदि घर में लगा है, तो पौधे की नियमित पूजा अर्चना अवश्य करना चाहिए। वास्तु शास्त्र के अनुसार भवन के दक्षिण भाग में तुलसी का पौधा नहीं लगाना चाहिए।

प्रत्येक घर में तुलसी का पौधा होना हमेशा शुभ रहता है। तुलसी का पौधा हमेशा आक्सीजन (प्राणवायु) विसर्जित करता है अतः वातावरण में सदा सकारात्मक उर्जा प्रवाहित होती रहती है। 

तुलसी जी का पौधा घर के ब्रह्मस्थान पर (यदि खुला हो) लगाना अतिशुभ होता है। 

तुलसी के पौधे के प्रातः व सांयकाल पूजा - अर्चना करना आवश्यक होता है।
Compiled & Edited by - Ashutosh Joshi
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Tuesday, February 8, 2011

Spiritual & Medicinal Importance of trees and plants - PART- 2


वृक्षों के महत्व को ध्यान में रखकर , किसी भी शुभ दिन साल में दो बार वृक्षारोंपण पर विशेष ध्यान देना चाहिए। 

वृक्षों को हमारे घर में स्थित बगीचे में लगाने से विभिन्न प्रकार के वास्तुदोष दूर हो जाते है तथा व्यक्ति व परिवार निरोगी रह सकता है। किन्तु वास्तु के नियामों के अनुसार कौन सा वृक्ष लगाना चाहिए, या कौन सा नहीं, इसकी जानकारी होना आवश्यक है।

1-  घर में या आसपास दूधवाले (अर्क/द्गवेतार्क) कांटेदार वृक्ष नहीं होना चाहिए। 
2- नागकेसर, अशोक, नीम, मौलश्री या शाल के वृक्ष शुभ होते है। इसी प्रकार अनार, चमेली, गुलाब, केतकी, केसर, चंदन, महुआ, दालचीनी, नागर या नारियल के पौधे शुभ होते है। 
3- अष्टमी के दिन अशोक के पेड की पूजा की जाती है। 
4- वटसावित्री के दिन बरगद के वृक्ष की पूजा की जाती है। 
5- कार्तिक मास के दिन आवले के वृक्ष की पूजा की जाती है। आंवलों के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास स्थान माना गया है। 
6- तुलसी जी के पेड की पूजा नित्य - प्रतिदिन करना चाहिए।
7- ''ऋषि वराहमिहिर'' शास्त्र के अनुसार घर में या आसपास, औषधि - युक्त पेड/पौघें, सुगन्धित व सुन्दर फूल वाले पेड - पौधे लगाने से लक्ष्मीजी प्रसन्न होती है।
8- घर के आसपास के पेडो की छाया घर पर नहीं पडना चाहिए। 
9- घर में यदि पीपल या बिल्व वृक्ष स्वयं ऊग आये हो तो उन्हें काटना शुभ नहीं होता है। पीपल के वृक्ष पीपल के वृक्ष कि पूजा करके व प्रार्थना करके घर से जडसहित निकालकर मंदिर में स्थापित कर देना चाहिए। 
10- बिल्ववृक्ष के पेड को भी मंदिर में स्थापित कर देना चाहिए या फिर संभव हो तो उचित पूजा - अर्चना व देखभाल करते रहना चाहिए। 
11- दूध देने वाले पौधे घर के बाहर हो सकते है। यदि आंकडे का वृक्ष स्वयं ऊग आता है तो उसकी पूजा करने से लाभ होता है। 
12 - पूर्व - दक्षिण व दक्षिण - पश्चिम दिशाओ में पेडो को नहीं लगाना चाहिए। यजुर्वेद में कहा गया है कि पेडो को  नक्षत्र के अनुसार पूजन करना लाभदायक रहता है। जैसे गूलर, पीपल, नागचंपा, शमी, बड (बरगद) आदि वृक्ष नक्षत्रों के आराध्य वृक्ष है और इनकी नियम से उपासना करने से निश्चित लाभ मिलता है। 
13- शास्त्रों के अनुसार रत्नों द्वारा जिस तरह ग्रह व नक्षत्र की अशुभता को दूर किया जाता है उसी तरह वनस्पतियों के पूजन से भी इसी प्रकार ग्रह शांति की जा सकती है।
14- भील व गौड जाति के आदिवासी लोग अपनी रक्षा हेतु वृक्षों की जडो या तने को अपने साथ रखते है।
15- वनस्पतियों को प्रयोग से पहले प्रार्थना करके व सिद्ध करके ही धारण करना चाहिए।
16- ग्रहों के अनुसार उपयुक्त वनस्पति कि लकड़ी द्वारा हवन करके हवन का धुँआ पूरे घर में घुमाना चाहिये जिससे ग्रह की अशुभता कम होती है।
17- शनि देवता को प्रसन्न करने के लिये - पीपल, खजूर, आक, कीक, अमलतास, आदि पौधों को रोपकर व उनकी उचित देखभाल करना उत्तम माना गया है।
18- आम, पीपल, अर्जुन आदि पौधे कर्म क्षेत्र की बाधाएं दूर करते है। रोजगार में आने वाली परेशनियों को दूर करने के लिए इन पौधों  की लगाकर देखभाल करना चाहिए। 
19- घर में या आसपास हरियाली होना घर की सुख, समृद्धि व शांति हेतु अति आवश्यक है। हरियाली से बुध ग्रह प्रसन्न होते है अतः बुध ग्रह की प्रसन्नता हेतु गाय को हरी घास या हरी सब्जी खिलाना अति - शुभ होता है।

Writer&Editor -Ashutosh Joshi
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Friday, February 4, 2011

Spiritual & Medicinal Importance of trees and plants


हमारी भारतीय संस्कृति में वृक्षों की पूजा विभिन्न त्योंहारों व मुहुर्त में प्राचीनकाल से चली आ रही है। नव - ग्रहों की अशुभता को दूर करने के लिये भी उपयुक्त वृक्षों को जल देना, पूजा करना आदि हिन्दू धर्म में लाभदायक माना जाता है। वैसे भी वृक्ष प्रकृति का अभिन्न अंग है और प्रकृति से ही मानव जीवन विद्यमान है। पंचतत्वों (प्‌ृथ्वी, जल, आकाश, वायु व अग्नि) के अभाव में हम इस संसार में जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते । वृक्षों की कुछ मुखय प्रजातियों का संबंध शास्त्रों में वर्णित विभिन्न आध्यात्मिक कथाओं में मिलता रहा है तथा प्रदृषण दूर करने में भी इन्हीं प्रजातियों के विशेष गुणों का महत्व रहा है। इसके अलावा वृक्षों की अनेक प्रजातियाँ कई असाध्य रोगो को दूर करने में सक्षम होती है। वृक्षों में उनकी जडों, पत्रों, तनों, फलों आदि सभी का अपना गुण होता है। जिसका उपयोग मानव कई वर्षो से करता रहा है। प्राचीन काल में वृक्षों के कंद - मूल खाकर ही महान्‌ तपस्वियों ने प्रकृति की गोद में रहकर साधना की है। आज यह हमारा दुर्भाग्य है कि हम वृक्षों को काटकर, प्रकृति को नष्ट कर रहे है। प्रकृति के साथ अनावश्यक खिलवाड करके हम पर्यावरण के असंतुलन को बढा रहे है। जिसका भविष्य में खतरनाक परिणाम आने वाला है। इसके अलावा दिन  - प्रतिदिन प्रदूषण बढता जा रहा है। सडकों पर हजारों नये वाहन रोज बढ जाते है और हम सब आंखे मूंदकर यह अनर्थ होता देख रहे है। मनुष्य के निजी स्वार्थ की महत्ता इतनी अधिक है कि भविष्य में प्रकृति के असंतुलन का भयावह प्रकोप किसी को भी महसूस नहीं हो रहा है


आराध्य वृक्ष एवं पौधे
ग्रह                                  उपयुक्त वृक्ष
सूर्य                                    मंदार
चन्द्र                                   पलाश
मंगल                                 खेर
बुध                                    अपामार्ग
गुरु                                    पीपल
शुक्र                                   गूलर
शनि                                  शमी, पीपल
राहु                                    दूर्वा/चन्दन

वृक्षों की पूजा अर्चना व उनसे लाभ

खेर का पेड -                          मानसिक शांति/धैर्य
आंवला का पेड -                     वंश वृद्धि/सौभाग्य वृद्धि
जामुन का पेड -                     शारीरिक सुख/रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि
कदंम का पेड -                       बाधाएं दूर/प्रगति
आम/अशोक   -                      मानसिक बल/स्वास्थय
सुपारी का पेड -                      गृह कलह से शांति/पारिवारिक प्रेम
बिल्व पत्री का पेड -                 समद्धि में वृद्धि।
नीम का पेड -                          व्यक्तित्व के प्रभाव में वृद्धि
पलाश का पेड -                       संतान सुख में वृद्धि व नवीन कार्य में सफलता
बाँस का वृक्ष -                         विवेक का विकास

By - Ashutosh Joshi
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Tuesday, February 1, 2011

Gomad (Zircon) - A Stone for Rahu planet


Zircon -  (गोमेद)

हिन्दी नाम - गोमेद
अंग्रेजी नाम - Zircon
उपयुक्त ग्रह-  राहु
उपयुक्त दिन- शनिवार
उपयुक्त अंगुली -  मध्यमा
उपयुक्त धातु- पंचधातु और चांदी
उपयुक्त वजन- ज्योतिष सलाह के अनुसार
उपयुक्त मंत्र-         ऊँ रां राहुवे नमः


1- गोमेद मुखय रुप से राहु ग्रह का रत्न है। राहु ग्रह को शुभ बनाने के लिये चांदी की अंगुठी में गोमेद मध्यमा उंगली में पहना जाता है।

2- गोमेद हरे, काले रंग का सफेद धारियों वाला रत्न होता है। किन्तु सफेद या भूरे रंग का  (सूखे पत्ते के रंग के जैसा) भी मिलता है।

3- गोमेद मुखय रुप से गहरे, भूरे व आसमानी रंग का अपारर्दशी रत्न होता है। शुद्ध व श्रेष्ठ गोमेद चमकदार , सुन्दर और चिकना होता है।



4- बेरंगी, धब्बेवाला, लाल रंग लिये हुए जालों वाला सफेद बिंदु वाला या दो रंग का गोमेद अशुभ होता है।

5- गोमेद के साथ माणिक, मूंगा, मोती और पीला पुखराज कभी धारण नहीं करना चाहिए।

6- गोमेद की भस्म बल व बुद्धि बढाती हैं। मिरगी, बवासीर, और वायु प्रकोप में गोमेद की भस्म दूध में लेने से लाभ होता है।

7- रत्नों से रोग उपचार करने के पहले उचित जानकार वैद्य या ज्योतिष ये सलाह ले लेना चाहिए.



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