Tuesday, November 12, 2013

A critical study of the work "Vaimanika Shastra"

An excellent Article picked up from -

http://www.indiadivine.org/news/science-and-nature/a-critical-study-of-the-work-vaimanika-shastra-r625




SUMMARY – A study of the work “Vymanika Shastra” is presented. First, the historical aspects and authenticity of the work are discussed. Subsequently, the work is critically reviewed in respect of its technical content. It appears that his work cannot be dated earlier than 1904 and contains details which, on the basis of our present knowledge, force us to conclude the non feasibility of heavier‐than-air craft of earlier times. Some peripheral questions concerning dimensions have also been touched upon.
1. Historical Aspects

1.1 ORIGIN

A book titled “Brihad Vimana Shastra” by Shri Bramhamuni Parivrajaka was published in the year 1959 [1]. It contains verses in Sanskrit (describing aircraft) with their Hindi translation.

Recently, another book titled “Vymanika Shastra” by Shri G.R. Josyer has appeared [2], which contains the same Sanskrit verses with their English translation. One notable feature of this English version is that it contains drawings of some crafts too, something not to be found in the Hindi version. Also, the English work by Josyer makes no mention whatsoever of the earlier work in Hindi.

Our main concern in this report will be with the above two works.

These books contain verses which, according to their texts, are supposed to form only part (about a fortieth) of “Yantra Sarvaswa” by sage Bharadwaja, which is devoted to a summary of the work on vimana vigyana by a number of other sages and is said to be for the benefit of all mankind.
For more reading, go to .......http://www.indiadivine.org/news/science-and-nature/a-critical-study-of-the-work-vaimanika-shastra-r625

Wednesday, November 6, 2013

आधुनिक समय वास्तु शास्त्र के पुर्नजागरण का समय

आचार्य अनुज जैन

वास्तु जो पंच तत्वों का भारतीय वैदिक विज्ञान है विभिन्न नियम, शोध एवं वस्तु की गुणवत्ता पर आधारित होता है। मानव शरीर,भूमि एवं भवन निर्माण से संबधित विज्ञान है जिसकी नींव हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने रखी थी। उनकी वर्षों की निरंतर तपस्या,शोध एव प्रयोगों का नतीजा ही है कि हमारे मंदिर, पुरातन महल आदि जो वास्तु नियमो पर बने ते। समय के बदलते प्रभाव के बाद आज भी अपनी महत्ता बनाए हुए हैं। आधुनिक समय वास्तु शास्त्र के पुर्नजागरण का समय है। तंत्र आगम, मानसार प्रभावमंजरी,अपराजित पुच्छ, विश्वकर्मा वास्तु शास्त्र समरागण सूत्रधार, राज वल्लभ-मणडनम, मयमतम आदि वास्तु के ग्रंथ आज भी वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य. का विषय बने हुए हैं। वे यह सोच कर ही हैरान है कि लाखों वर्ष पूर्व किन उपकरण,ज्ञान शोध के उपरातं इतने सटीक नियम प्रतिपादित किए गए हैं जबकि वे तो अभी भी प्रारंभिक अवस्था में ही है। भारत में तो वास्तुकारों को ऋषियों का सम्मान प्राप्त है।

वास्तु यानी भारतीय भवन निर्माण की कला दो उर्जा स्रोत पर आधारित है सूर्य से प्राप्त उर्जा और पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति। इन दोनों ऊर्जा रेखाओं के चयन के पीछे उद्देशय बहुत ही स्पष्ट था। सौर उर्जा और गुरुत्वाकर्षण के प्राकृतिक सामंजस्य प्रयोग और परिवर्तन के द्वारा सही दिशाओं का पता लगाना ताकि ऊर्जा के सही बहाव की जानकारी प्राप्त हो सके। भू ऊर्जा जो उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है और प्राणिक ऊर्जा जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है उसका उपयोग भवन में किस प्रकार हो, कैसे शरीर, कर्म और वातावरण का संतुलन बनाया जाए इसकी जानकारी वास्तु शास्त्र में हजारों वर्षों से हमारे पास है। वास्तु शास्तर इस बात पर आधारित है कि प्रकृति में पांच महाभूतों ( पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि और वायु) आदि में ऐसा संतुलन कायम किया जाए जिससे बनाए गए भवन में सुख समृद्धि हो, और व्यक्ति अपने जीवन उद्देश्य को प्राप्त करे।

वास्तु के मूलभूत सिद्दांतों में सर्वप्रथम आता है भूमि परिक्षण। भूमि परिक्षण के जो विभिन्न सूत्र वास्तु शास्त्रों में बताए गए हैं वे आज भी वैज्ञानिक कसौटियों पर खरे उतरते हैं वास्तु में प्रतिपादित भूमि की गंध, स्वाद, रंग, स्पर्श आदि की परिक्षण विधियां वैज्ञानिक विश्लेषणों को मात भी दे रहा है । भूमि पर मकान बनाने से पूर्व, चुनाव की अगली विधि होती है भूमि का आकार। वर्गाकार आयातकार, वृत्ताकार, त्रिकोणकार,अण्डाकार, सिंहमुखी, गोमी आदि, शुभ अशुभ इस प्रकार की भूमि के चयन का नियम वास्तु शास्त्र में प्रतिपादित है जो वहां रहने वाले व्यक्ति पर शुभ- अशुभ असर डालते हैं। आज विज्ञान ने भी आकार के महत्व को समझ लिया है और बड़े-बड़े आकार परियोजनाएं ही बनाए जा रहे हैं।

भूमि का चारो दिशाओ की ओर से ऊंचा नीचा होना भी वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार भवन और भवन स्वामी पर व्यापक प्रभाव डालता है। आज फ्रांस जर्मनी, अमेरिका में बायो बायलॉजी के नियम भी इन सूत्रों को अपना रहे हैं उनके द्वारा 25 सूत्री नियमावली में भूमि के स्तर को सौर ऊर्जा के परिवर्तन के साथ जोडा़ जा रहा है ताकि सौर ऊर्जा और गुरुत्वाकर्षण का संपूर्ण उपयोग किया जा सके।

वास्तु शास्त्र में दिशाओं का बहुत ही बड़ा महत्व होता है वास्तु शास्त्र के अनुसार आठ दिशाएं न केवल पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति और अदृश्य उर्जा रेखाओं का प्रतिनिधित्व करती है बल्कि पंच तत्वों का केन्द्र भी है जैसे उत्तर दिशा में पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से चुंबकीय शक्ति निकलती है। अतः भवन के इस चुंबकीय क्षेत्र में खुला बरामदा रखने, भूमि एवं भवन का स्तर नीचा रखना बताया गया है। भू वैज्ञानिक भी इस सिद्धांत पर सहमति जताते है कि इस प्रकार की संरचना से भूमि और भवन के वाष्प स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है।

वास्तु शास्त्र में भवन की बनावट,भव्यता, आकार और उपयोग के अनुसार 32 प्रकार के वास्तु पद मण्डल का विधान है। इस प्रकार हम सरलता से ऊर्जा के केन्द्र माप सकते हैं जिन्हे हम ब्रहम स्थान, मर्मस्थान, अथि मर्मस्थान पर देख सकते हैं जिस प्रकार मानव शरीर में ऊर्जा के सात स्रोत होते हैं जिन्हें हम चक्र कहते हैं उसी प्रकार भूमि और भवन में भी ऊर्जा के सातों चक्र होते हैं जिन्हे हम तीन विभागों में विभाजित कर सकते हैं- उत्तर-पूर्व,मध्यस्थान एवं दक्षिण-पश्चिम। उत्तर-पूर्व में आकाशीय ऊर्जा विद्यमान रहती है,  मध्य भाग में ब्रहमाणीय उर्जा विराजमान रहती है और दक्षिण-पश्चिम में पृथ्वी ऊर्जा का वास होता है। वास्तु शास्त्र का पूरा आधार इन्ही तीनों ऊर्जा रेखाओं पर रखा हुआ है।

वास्तु प्राचीन समय का भवन निर्माण का विज्ञान है जो आज भी अपने तर्क शोध और सत्यता के बल पर अपना महत्व बनाए हुए है आधुनिक जीवन शैली प्रदूषण, प्रतिस्पर्धा और गलत रहन सहन के कराण हमें या तो स्वयं को बदलना होगा या वैज्ञानिक दृष्टि से वैदिक सूत्रों को लागू करने की शैली विकसित करनी होगी। जब हम ज्ञान और विज्ञान को पुनः मिलाएंगे तो हम एक बार फिर सुख शांति समृद्धि का जीवन जी पाएंगे।





Tuesday, October 22, 2013

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Friday, October 11, 2013

रावण को बैठा देखकर हनुमानजी भी मोहित हो गए थे


An article from Dainik Bhaskar - ( Dainik Bhaskar se sabhaar )



श्रीरामचरित मानस में कुल 7 कांड बताए गए हैं। इसमें पहला है बालकांड, दूसरा है अयोध्या कांड, फिर अरण्य कांड, इसके बाद किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंका कांड और अंत में है उत्तरकांड।
रावण की मां का नाम कैकसी था और पिता ऋषि विशर्वा थे। कैकसी दैत्य कन्या थीं। रावण के भाई विभिषण, कुंभकर्ण और बहन सूर्पणखा के साथ ही देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर देव भी रावण के भाई हैं।

एक बार रावण ने अपनी शक्ति के मद में शिवजी के कैलाश पर्वत को ही उठा लिया था। उस समय भोलेनाथ ने 
मात्र अपने पैर के अंगूठे से ही कैलाश पर्वत का भार बढ़ा दिया और रावण उसे अधिक समय तक उठा नहीं सका। इस दौरान रावण का हाथ पर्वत के नीचे फंस गया। बहुत प्रयत्न के बाद भी रावण अपना हाथ वहां से नहीं निकाल सका। तब रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए उसी समय शिव तांडव स्रोत रच दिया। शिवजी इस स्रोत से बहुत प्रसन्न हो गए।

लंका में प्रवेश करते हुए हनुमानजी ने लंका की भव्यता और सुंदरता देखी, जो कि आश्चर्यचकित करने वाली थी। रात्रि के समय पर बजरंग बली रावण के अंत:पुर में गए तो वहां रावण और रावण की रानियों का सौंदर्य देखते ही बनता था।
लंका में सीता को खोजते हुए हनुमानजी ने पूरी लंका का भ्रमण कर लिया था। अंत में वे अशोक वाटिका पहुंचे जहां सीता को देखकर वे प्रसन्न हो गए। वाटिका में सीता से वार्तालाप करने के बाद हनुमानजी ने रावण की एक वाटिका उजाड़ दी।
रावण को सूचना प्राप्त हुई की एक वानर उनकी वाटिका उजाड़ दी है। जिसके बाद लंकेश ने कई असूर हनुमानजी को पकडऩे के लिए भेजें। सभी असूरों को बजरंग बली ने हरा दिया। अंत में इंद्रजीत हनुमानजी को पकडऩे आया। इंद्रजीत ने दिव्यास्त्र की मदद से हनुमानजी को बंदी बना दिया। बंदी बनाए जाने के बाद जब हनुमानजी लंका के दरबार में पहुंचे तो वे हतप्रभ हो गए।

रावण का दरबार भव्य और सुंदर था, जहां रावण को बैठा देखकर हनुमानजी भी मोहित हो गए थे। रामायण में लिखा है हनुमानजी ने रावण के वैभव को देखते हुए कहा था कि...

अहो रूपमहो धैर्यमहोत्सवमहो द्युति:।
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता।।

इस श्लोक का अर्थ यह है कि - रावण रूप-रंग, सौंदर्य, धैर्य, कांति तथा सर्वलक्षणों से युक्त है। यदि रावण में अधर्म अधिक बलवान न होता तो यह देवलोक का भी स्वामी बन सकता था।
बलशाली दशानन ने अपने तप से ब्रह्मा, शिव समेत   अनेक देवों को प्रसन्न किया था। वह पराक्रमी  और ज्ञानी भी था। परंतु प्रकांड विद्वान लंकापति के सारे गुण अहंकार रूपी बुराई में जाकर गुम हो गए।
रावण द्वारा सीता हरण की घटना के पीछे मुख्य रूप से शूर्पणखा का हाथ माना जाता है। बहन शूर्पणखा के प्रति रावण के मन में अगाध प्रेम था।

लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक न काटी होती और शूर्पणखा ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए रावण को न उकसाया होता, तो शायद ही सीता हरण का ख्याल रावण के मन में न आता।
रावण बहुत विद्वान, चारों वेदों का ज्ञाता और ज्योतिष विद्या में पारंगत था। उसके जैसी तीक्ष्ण बुद्धि वाला कोई भी प्राणी पृथ्वी पर नहीं हुआ। इंसान के मस्तिष्क में बुद्धि और ज्ञान का भंडार होता है, जिसके बल पर वह जो चाहे हासिल कर सकता है। रावण के तो दस सिर यानी दस मस्तिष्क थे। कहते हैं, रावण की विद्वता से प्रभावित होकर भगवान शंकर ने अपने घर की वास्तुशांति हेतु आचार्य पंडित के रूप में दशानन को निमंत्रण दिया था।

रावण भगवान शंकर का उपासक था। तुलसीदास रचित श्रीरामचरितमानस के अनुसार- सेतु निर्माण के समय रामेश्वरम में शिवलिंग की स्थापना की गई, तो उसके पूजन के लिए किसी विद्वान की खोज शुरू हुई। उस वक्त सबसे योग्य विद्वान रावण ही था, इसलिए उससे शिवलिंग पूजन का आग्रह किया गया और शिवभक्त रावण ने शत्रुओं के आमंत्रण को स्वीकारा था। 

रावण महातपस्वी था। अपने तप के बल पर ही उसने सभी देवों और ग्रहों को अपने पक्ष में कर लिया था। कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने रावण को अमरता और विद्वता का वरदान दिया था।
रावण को रसायन शास्त्र का ज्ञान था। उसे कई अचूक शक्तियां हासिल थीं, जिनके बल पर उसने अनेक चमत्कारिक कार्य सम्पन्न किए। अग्निबाण, ब्रह्मास्त्र आदि इनमें गिने जा सकते हैं।

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