ARTICLE BY DR.SANJEEV AGARWAL, MEERUT.,
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त्रिफला यानी 3 फल, ये एक प्रसिघ्घ आयूवेँदिक रासायनिक फामुँला है जिसमे आँवला, बहेडा और हरड के बीजों को निकालकर समभाग मे लिया जाता है.
संयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने से ह्रदयरोग,
उच्च रक्तचाप, मघुमेह, नेत्ररोग, पेट के रोग, मोटापा, बुखार, बाल-दांत
-अस्थि के रोगो से बचा जा सक्ता है.
ये कोई 20 प्रकार के प्रमेह के रोग तथा कुष्ठ रोग को भी मिटाता है:---
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1-त्रिफला का 2-6g. चूणँ और 125mg. लौह भस्म को सुबह-शाम पानी के साथ लेने से बाल झडने बंघ होते है,
2-40ml. त्रिफला के काढे मे 5g. शहद मिलाकर लेने से पीलिया रोग मे लाभ होता है,
3-10g. त्रिफला चूणँ रात को पानी मे भिगोकर सुबह उसमे मिश्री मिलाकर पीने से हाई ब्लडप्रेशर मे लाभ होता है,
4-त्रिफला के पानी से रोजाना आंखो को घोने से तथा उसका चूणँ और मिश्री को घी मे मिलाकर लेने से आंखो के सभी रोगो मे लाभ होता है,
5-त्रिफला, देवदारु, दारुहल्दी और नागरमोथा को समभाग मे लेकर उसका काढा बनाकर सुबह-शाम पीने से प्रमेह(वीयँविकार) मे लाभ होता है,
6-त्रिफला और पीपल को समभाग मे लेकर बनाया चूणँ शहद के साथ चाटने से मलेरिया का बुखार उतर जाता है,
7-त्रिफला, तूतिया, पांचो नमक, पतंगा, माजूफल, त्रिकुटा इन सभी को समभाग मे लेकर उसका चूणँ बनाकर रोजाना उससे दंतमंजन करने से दांतो के सभी रोग मिटते है,
8-त्रिफला और अमलतास के 20ml. काढे मे शहद तथा चीनी मिलाकर पीने से रक्तपित्त मे लाभ होता है,
9-त्रिफला, सेंघानमक, गोखरु और खीरा के बीज को पीसकर उसका चूणँ ठंडे पानी के साथ लेने से मूत्ररोगो मे लाभ होता है,
10-त्रिफला और राई को पीसकर उसका चूणँ गमँ पानी के साथ लेने से पेट की गैस मिटती है,
11-त्रिफला चूणँ गमँ दूघ या पानी के साथ रात को लेने से कब्ज तथा बवासीर मिटता है,
12-1-1g. त्रिफला और शिलाजीत का चूणँ को 7-14ml. गौमूत्र मे मिलाकर दिन मे 2 बार लेने से फेफडो के रोग मिटते है,
13-त्रिफला, नागरमोथा, मूलहठी और लोघ्र को सममात्रा मे लेकर उसके चूणँ को शहद मे मिलाकर लेने से प्रदर रोगो मे लाभ होता है,
14-1/2 चम्मच त्रिफला चूणँ दिन मे 2-3 बार पानी के साथ लेने से एसीडिटी मे लाभ होता है,
15-त्रिफला, चिरायता का पंचांग, कटुकी प्रकंद, मुस्तकमूल को समभाग मे लेकर बनाया गया काढा 14-28ml. मात्रा मे सुबह-शाम पीने से स्तनो मे दूघविकार दूर होते है,
16-रोजाना त्रिफला का काढा पीने से मघुमेह से बचा ZAA SAKTA HAI.....!!
JAN HET ME ZAARI,
JAI MAA BHARTI,
NIVEDAK:-DR.SANJEEV AGARWAL, MEERUT.
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त्रिफला यानी 3 फल, ये एक प्रसिघ्घ आयूवेँदिक रासायनिक फामुँला है जिसमे आँवला, बहेडा और हरड के बीजों को निकालकर समभाग मे लिया जाता है.
संयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने से ह्रदयरोग,
उच्च रक्तचाप, मघुमेह, नेत्ररोग, पेट के रोग, मोटापा, बुखार, बाल-दांत
-अस्थि के रोगो से बचा जा सक्ता है.
ये कोई 20 प्रकार के प्रमेह के रोग तथा कुष्ठ रोग को भी मिटाता है:---
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1-त्रिफला का 2-6g. चूणँ और 125mg. लौह भस्म को सुबह-शाम पानी के साथ लेने से बाल झडने बंघ होते है,
2-40ml. त्रिफला के काढे मे 5g. शहद मिलाकर लेने से पीलिया रोग मे लाभ होता है,
3-10g. त्रिफला चूणँ रात को पानी मे भिगोकर सुबह उसमे मिश्री मिलाकर पीने से हाई ब्लडप्रेशर मे लाभ होता है,
4-त्रिफला के पानी से रोजाना आंखो को घोने से तथा उसका चूणँ और मिश्री को घी मे मिलाकर लेने से आंखो के सभी रोगो मे लाभ होता है,
5-त्रिफला, देवदारु, दारुहल्दी और नागरमोथा को समभाग मे लेकर उसका काढा बनाकर सुबह-शाम पीने से प्रमेह(वीयँविकार) मे लाभ होता है,
6-त्रिफला और पीपल को समभाग मे लेकर बनाया चूणँ शहद के साथ चाटने से मलेरिया का बुखार उतर जाता है,
7-त्रिफला, तूतिया, पांचो नमक, पतंगा, माजूफल, त्रिकुटा इन सभी को समभाग मे लेकर उसका चूणँ बनाकर रोजाना उससे दंतमंजन करने से दांतो के सभी रोग मिटते है,
8-त्रिफला और अमलतास के 20ml. काढे मे शहद तथा चीनी मिलाकर पीने से रक्तपित्त मे लाभ होता है,
9-त्रिफला, सेंघानमक, गोखरु और खीरा के बीज को पीसकर उसका चूणँ ठंडे पानी के साथ लेने से मूत्ररोगो मे लाभ होता है,
10-त्रिफला और राई को पीसकर उसका चूणँ गमँ पानी के साथ लेने से पेट की गैस मिटती है,
11-त्रिफला चूणँ गमँ दूघ या पानी के साथ रात को लेने से कब्ज तथा बवासीर मिटता है,
12-1-1g. त्रिफला और शिलाजीत का चूणँ को 7-14ml. गौमूत्र मे मिलाकर दिन मे 2 बार लेने से फेफडो के रोग मिटते है,
13-त्रिफला, नागरमोथा, मूलहठी और लोघ्र को सममात्रा मे लेकर उसके चूणँ को शहद मे मिलाकर लेने से प्रदर रोगो मे लाभ होता है,
14-1/2 चम्मच त्रिफला चूणँ दिन मे 2-3 बार पानी के साथ लेने से एसीडिटी मे लाभ होता है,
15-त्रिफला, चिरायता का पंचांग, कटुकी प्रकंद, मुस्तकमूल को समभाग मे लेकर बनाया गया काढा 14-28ml. मात्रा मे सुबह-शाम पीने से स्तनो मे दूघविकार दूर होते है,
16-रोजाना त्रिफला का काढा पीने से मघुमेह से बचा ZAA SAKTA HAI.....!!
JAN HET ME ZAARI,
JAI MAA BHARTI,
NIVEDAK:-DR.SANJEEV AGARWAL, MEERUT.
![" वास्तु शास्त्र के अनुसार शयन कक्ष में बिस्तर लगाने की यह 6 स्थति दिखाई गयी है इसमें प्रत्येक स्थिति का विश्लेषण आपकी जानकारी के लिए " https://www.facebook.com/VastuPhoto
1.दरवाजे के ठीक सामने बिस्तर लगा हुवा है जो की वास्तुशास्त्र के अनुसार अशुभ स्थिति है ---अगर ऐसा बिस्तर लगा हुवा है तो घर के किसी भी हिस्से से शयन कक्ष की गतिविधि नजर आने से शयन कक्ष की प्राईवेसी समाप्त होती है
2.ठीक दरवाजे के पास बिस्तर होने की वजह से शयन कक्ष के अंदर से अचानक आने वाले आगन्तुक को नही देखा जा सकता ,वास्तु शास्त्र में ऐसी मान्यता है की जब भी बिस्तर या आफिस का टेबल से द्वार पीठ की ओर होता है तो लोग हमेशा धोखा देते हैं
3.यह सबसे उपयुक्त स्थित है
4.दरवाजे के ठीक सामने बिस्तर लगा हुवा है जो की वास्तुशास्त्र के अनुसार अशुभ स्थिति है ---अगर ऐसा बिस्तर लगा हुवा है तो घर के किसी भी हिस्से से शयन कक्ष की गतिविधि नजर आने से शयन कक्ष की प्राईवेसी समाप्त होती है
5.बिस्तर को दरवाजे से डायगोनल [ कर्ण में ] लगाना अशुभ माना जाता है
6.बीम के नीचे बिस्तर को लगाना अशुभ माना जाता है ,बीम के दोष निदान के लिए फाल्स सीलिंग कराना चाहिए
क्या आप वास्तु-शास्त्र में रूचि रखते हैं ,,,,,,,,,? क्या आप वास्तु शास्त्र सीखना चाहते हैं .......वो भी नि :शुल्क .....?क्या आप वास्तु सलाहकार हैं ,क्या इस मंच के माध्यम से वास्तु की जानकारी देना चाहते हैं ----? क्योंकि इसमें है वो सब जानकारी जो आपके प्रश्नों पर आधारित है ,,
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