Sunday, October 21, 2012

विजय दशमी पर्व पर जीवन में उन्नति के लिए उपाय क्या करे

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BY SHREE ARVIND SINGH ON FACE BOOK


विजय दशमी पर्व की बहुत बहुत शुभ कामनाऍ............ विजयादशमी अथार्त दशहरा का पर्व इस बार २४ अक्तुबर २०१२, (बुधवार) को...... 

अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है, दशहरा हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. भगवान श्री राम चन्द्र जी ने इसी दिन रावण का वध किया था. इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है. दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा. ये अभूज मुहूर्त कहलाते है................

कथा : - इस दिन राम ने रावण का वध किया था. रामायण के अनुसार राम तथा सीता जी के वनवास के दौरान रावण, राम की पत्नी सीता का अपहरण कर लंका ले जाता है. तब भगवान श्री राम अपनी पत्नी सीता जी को रावण के बंधन से मुक्त कराने हेतु राम ने भाई लक्ष्मण, भक्त हनुमान एवं वानरों की सेना के साथ मिलकर रावण के साथ एक बड़ा युद्ध करते हैं.

युद्ध के दौरान श्री राम जी नौ दिनों तक युद्ध की देवी मां दुर्गा जी की पूजा करते हैं तथा दसवें अर्थात दशमी के दिन रावण का वध करते हैं और सीता जी को बंधन से मुक्त कराते हैं. इसलिए विजयदशमी एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण दिन है. इस दिन रावण, उसके भाई कुम्भकरण और पुत्र मेघनाद के पुतले जगह-जगह में जलाए जाते हैं.

उपाय क्या करे इस दिन ................

१. इस दिन काली गूंजा को गंगा जल और गौ माता के दूध से शुद्ध करके जो भी पास में रखता है, उसके काफी संकट दूर होते है..... ध्यान रखे की मुसीबत के समय इसका रंग अपने आप बदल जाएगा........

२. इस दिन नागकेशर के पौधा का रोपण करे और उसकी देखभाल करे.... जैसे - जैसे पौधा बढेगा आपकी उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त होगा.....

३. इसी तरह से बरगद में पेड़ के नीचे जो भी पौधा हो उससे जड़ समेत लेकर घर में लगाये और उसकी देखभाल करे तो भी उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है.....

४. इस दिन सूर्यास्त के समय आधा किलो दूध में ९ बूँद शुद्ध शहद की डाल कर (अगर घर बड़ा हो तो १ किलो दूध में १८ बूँद शहद की डाले) पुरे घर में छिडकाव करे. उसके बाद जो दूध बच जाए, वो चौराहे पर रख आये. ऐसा पुरे २१ दिन करना है. घर में कैसी भी नकारात्मक शक्ति होगी वो दूर होगी. सूर्यास्त जिस समय हो, उसके १२ मिनट पहले और अस्त होने के १२ मिनट बाद.... यानी की ये २४ मिनट के अन्दर ही ये उपाय करना है....... 

५. इस दिन यदि किस्मत से कोई हिंजड़ा मिल जाए तो उसे ज़रूर कुछ न कुछ दे और अगर वो आपको बदले में कुछ दे तो उसे संभाल कर अपने पास रख ले, बहुत ही शुभ होगा.......

६. इस दिन लाल रंग से २१०० बार राम लिखे और राम शब्द जिस कागज़ पर लिखा है वहा से सारे काट ले..... इन काटे हुए कागज़ को २१०० आटे की छोटी-छोटी गोलियों में भर कर ऐसी जगह पर जाए जहा पर मछलियाँ हो........ वह पर बैठ कर "ॐ जय श्री राम" कहते हुए, एक-एक करके गोलियों को खिला दे........ संकट दूर......

७. इस दिन किसी भी संकट को दूर करने के लिए, बाबा हनुमान जी की शरण में जाए. इस दिन उपवास रख कर बाबा जी को चोला अर्पित करे (सुबह के समय), गुड - चने का भोग लगाये और संध्या समय बाबा जी को लड्डू का भोग लगाकर, १०८ बार वही बैठ कर श्री हनुमान चालीसा का पाठ करे, ध्यान दे की जब तक पाठ समाप्त ना हो जाए धूप-दीपक जलता रहे. तत्पश्चात कपूर से आरती करके, गलतियों की माफ़ी मांग कर, अपने संकट दूर करने का निवेदन करे और घर वापस आ जाए...................... 

८. इस दिन धार्मिक स्थल में गुप्त दान विशेष रूप से सहायक होगा... जीवन में उन्नति के लिए......

९. इस दिन से शुरू करते हुए, ४३ दिन तक बेसन के लड्डू किसी भी कुत्ते को खिलाना शुरू करे तो घर में बरकत होनी शुरू हो जायेगी..... ध्यान रहे की प्रतिदिन एक ही कुत्ता न हो.... मतलब की.. एक ही कुत्ते को ना दे ये लड्डू........

१०. इस दिन सवा किलो जलेबी का भोग बाबा भैरव नाथ जी को लगाये, ५ तरह की मिठाई साथ में अर्पित करके धूप-दीप करे, फिर उस जलेबी में से थोड़ी सी ले कर किसी भी कुत्ते को खिला दे, ऐसा २१ बुधवार करने से, संकट दूर होने में, मदद बाबा जी के आशीर्वाद से मिलेगी....

११. इस दिन से शुरू करते हुए, भगवान् श्री गणेश जी को एक सुपारी अर्पित करे और एक कटोरी चावल का दान करे, पुरे वर्ष भर तक, कैसी भी नज़र दोष होगी घर पर या फिर कुछ भी अप्राकर्तिक होगा, सब श्री गणेश जी के आशीर्वाद से दूर होगा.....

Friday, October 19, 2012

श्रीसुदर्शन-कवच-----

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BY SHREE ASHU BAHUGUNA ON FACEBOOK


श्रीसुदर्शन-कवच-----

‘श्रीसुदर्शन-चक्र’ भगवान् विष्णु का प्रमुख आयुध है, जिसके माहात्म्य की कथाएँ पुराणों में स्थान-स्थान पर दिखाई देती है। ‘मत्स्य-पुराण’ के अनुसार एक दिन दिवाकर भगवान् ने विश्वकर्मा जी से निवेदन किया कि ‘कृपया मेरे प्रखर तेज को कुछ कम कर दें, क्योंकि अत्यधिक उग्र तेज के कारण प्रायः सभी प्राणी सन्तप्त हो जाते हैं।’ विश्वकर्मा जी ने सूर्य को ‘चक्र-भूमि’ पर चढ़ा कर उनका तेज कम कर दिया। उस समय सूर्य से निकले हुए तेज-पुञ्जों को ब्रह्माजी ने एकत्रित कर भगवान् विष्णु के ‘सुदर्शन-चक्र’ के रुप में, भगवान् शिव के ‘त्रिशूल′-रुप में तथा इन्द्र के ‘वज्र’ के रुप में परिणत कर दिया।

‘पद्म-पुराण’ के अनुसार भिन्न-भिन्न देवताओं के तेज से युक्त ‘सुदर्शन-चक्र’ को भगवान् शिव ने श्रीकृष्ण को दिया था। ‘वामन-पुराण’ के अनुसार भी इस कथा की पुष्टि होती है। ‘शिव-पुराण’ के अनुसार ‘खाण्डव-वन’ को जलाने के लिए भगवान् शंकर ने श्रीकृष्ण को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। इसके सम्मुख इन्द्र की शक्ति भी व्यर्थ थी।

‘वामन-पुराण’ के अनुसार दामासुर नामक भयंकर असुर को मारने के लिए भगवान् शंकर ने विष्णु को ‘सुदर्शन-चक्र’ प्रदान किया था। बताया है कि एक बार भगवान् विष्णु ने देवताओं से कहा था कि ‘आप लोगों के पास जो अस्त्र हैं, उनसे असुरों का वध नहीं किया जा सकता। आप सब अपना-अपना तेज दें।’ इस पर सभी देवताओं ने अपना-अपना तेज दिया। सब तेज एकत्र होने पर भगवान् विष्णु ने भी अपना तेज दिया। फिर महादेव शंकर ने इस एकत्रित तेज के द्वारा अत्युत्तम शस्त्र बनाया और उसका नाम ‘सुदर्शन-चक्र’ रखा। भगवान् शिव ने ‘सुदर्शन-चक्र’ को दुष्टों का संहार करने तथा साधुओं की रक्षा करने के लिए विष्णु को प्रदान किया।

‘हरि-भक्ति-विलास’ में लिखा है कि ‘सुदर्शन-चक्र’ बहुत पुज्य है। वैष्णव लोग इसे चिह्न के रुप में धारण करें। ‘गरुड़-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ का महत्त्व बताया गया है और इसकी पूजा-विधि दी गई है। ‘श्रीमद्-भागवत’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ की स्तुति इस प्रकार की गई है- ‘हे सुदर्शन! आपका आकार चक्र की तरह है। आपके किनारे का भाग प्रलय-कालीन अग्नि के समान अत्यन्त तीव्र है। आप भगवान् विष्णु की प्रेरणा से सभी ओर घूमते हैं। जिस प्रकार अग्नि वायु की सहायता से शुष्क तृण को जला डालती है, उसी प्रकार आप हमारी शत्रु-सेना को तत्काल जला दीजिए।’

‘विष्णु-धर्मोत्तर-पुराण’ में ‘सुदर्शन-चक्र’ का वर्णन एक पुरुष के रुप में हुआ है। इसकी दो आँखें तथा बड़ा-सा पेट है। चक्र का यह रुप अनेक अलंकारों से सुसज्जित तथा चामर से युक्त है


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Wednesday, October 10, 2012

प्रेतबाधा से मुक्ति के 10 सरल उपाय





BY ASTROLOGER SHREE MUKESH JI AGARWAL  ON FACE BOOK 

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हिन्दू धर्म में भूतों से बचने के अनेक उपाय बताए गए हैं। चरक संहिता में प्रेत बाधा से पीड़ित रोगी के लक्षण और निदान के उपाय विस्तार से मिलते हैं। 

ज्योतिष साहित्य के मूल ग्रंथों- प्रश्नमार्ग, वृहत्पराषर, होरा सार, फलदीपिका, मानसागरी आदि में ज्योतिषीय योग हैं जो प्रेत पीड़ा, पितृ दोष आदि बाधाओं से मुक्ति का उपाय बताते हैं।

अथर्ववेद में भूतों और दुष्ट आत्माओं को भगाने से संबंधित अनेक उपायों का वर्णन मिलता है। यहां प्रस्तुत है प्रेतबाधा से मुक्ति के 10 सरल उपाय।


1. ॐ या रुद्राक्ष का अभिमंत्रित लॉकेट गले में पहने और घर के बाहर एक त्रिशूल में जड़ा ॐ का प्रतीक दरवाजे के ऊपर लगाएं। सिर पर चंदन, केसर या भभूति का तिलक लगाएं। हाथ में मौली (नाड़ा) अवश्य बांध कर रखें।

2. दीपावली के दिन सरसों के तेल का या शुद्ध घी का दिया जलाकर काजल बना लें। यह काजल लगाने से भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी आदि से रक्षा होती है और बुरी नजर से भी रक्षा होती है।

3. घर में रात्रि को भोजन पश्चात सोने से पूर्व चांदी की कटोरी में देवस्थान या किसी अन्य पवित्र स्थल पर कपूर तथा लौंग जला दें। इससे आकस्मिक, दैहिक, दैविक एवं भौतिक संकटों से मुक्त मिलती है।

4. प्रेत बाधा दूर करने के लिए पुष्य नक्षत्र में चिड़चिटे अथवा धतूरे का पौधा जड़सहित उखाड़ कर उसे धरती में ऐसा दबाएं कि जड़ वाला भाग ऊपर रहे और पूरा पौधा धरती में समा जाएं। इस उपाय से घर में प्रेतबाधा नहीं रहती और व्यक्ति सुख-शांति का अनुभव करता है।

5. प्रेत बाधा निवारक हनुमत मंत्र - ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ऊँ नमो भगवते महाबल पराक्रमाय भूत-प्रेत पिशाच-शाकिनी-डाकिनी-यक्षणी-पूतना-मारी-महामारी, यक्ष राक्षस भैरव बेताल ग्रह राक्षसादिकम्‌ क्षणेन हन हन भंजय भंजय मारय मारय शिक्षय शिक्षय महामारेश्वर रुद्रावतार हुं फट् स्वाहा। 

इस हनुमान मंत्र का पांच बार जाप करने से भूत कभी भी निकट नहीं आ सकते।

6. अशोक वृक्ष के सात पत्ते मंदिर में रख कर पूजा करें। उनके सूखने पर नए पत्ते रखें और पुराने पत्ते पीपल के पेड़ के नीचे रख दें। यह क्रिया नियमित रूप से करें, आपका घर भूत-प्रेत बाधा, नजर दोष आदि से मुक्त रहेगा।

7. गणेश भगवान को एक पूरी सुपारी रोज चढ़ाएं और एक कटोरी चावल दान करें। यह क्रिया एक वर्ष तक करें, नजर दोष व भूत-प्रेत बाधा आदि के कारण बाधित सभी कार्य पूरे होंगे।

8. मां काली के लिए उनके नाम से प्रतिदिन अच्छी तरह से पवित्र ‍की हुई दो अगरबत्ती सुबह और दो दिन ढलने से पूर्व लगाएं और उनसे घर और शरीर की रक्षा करने की प्रार्थना करें।

9. हनुमान चालीसा और गजेंद्र मोक्ष का पाठ करें और हनुमान मंदिर में हनुमान जी का श्रृंगार करें व चोला चढ़ाएं।

10. मंगलवार या शनिवार के दिन बजरंग बाण का पाठ शुरू करें। यह डर और भय को भगाने का सबसे अच्छा उपाय है। 

इस तरह यह कुछ सरल और प्रभावशाली टोटके हैं, जिनका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं होता। ध्यान रहें, नजर दोष, भूत-प्रेत बाधा आदि से मुक्ति हेतु उपाय ही करने चाहिए टोना या टोटके नहीं।

सावधानी : सदा हनुमानजी का स्मरण करें। चतुर्थी, तेरस, चौदस और अमावस्या को पवि‍त्रता का पालन करें। शराब न पीएं और न ही मांस का सेवन करें।


Monday, October 8, 2012

शाबर मन्त्र साधना” के तथ्य


BY ASTROLOGER SHREE ASHU BAHUGUNA ON FACE BOOK 

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शाबर मन्त्र साधना” के तथ्य

१॰ इस साधना को किसी भी जाति, वर्ण, आयु का पुरुष या स्त्री कर सकती है।

२॰ इन मन्त्रों की साधना में गुरु की इतनी आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि इनके प्रवर्तक स्वयं सिद्ध साधक रहे हैं। इतने पर भी कोई निष्ठावान् साधक गुरु बन जाए, तो कोई आपत्ति नहीं क्योंकि किसी होनेवाले विक्षेप से वह बचा सकता है।

३॰ साधना करते समय किसी भी रंग की धुली हुई धोती पहनी जा सकती है तथा किसी भी रंग का आसन उपयोग में लिया जा सकता है।

४॰ साधना में जब तक मन्त्र-जप चले घी या मीठे तेल का दीपक प्रज्वलित रखना चाहिए। एक ही दीपक के सामने कई मन्त्रों की साधना की जा सकती है।

५॰ अगरबत्ती या धूप किसी भी प्रकार की प्रयुक्त हो सकती है, किन्तु शाबर-मन्त्र-साधना में गूगल तथा लोबान की अगरबत्ती या धूप की विशेष महत्ता मानी गई है।

६॰ जहाँ ‘दिशा’ का निर्देश न हो, वहाँ पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके साधना करनी चाहिए। मारण, उच्चाटन आदि दक्षिणाभिमुख होकर करें। मुसलमानी मन्त्रों की साधना पश्चिमाभिमुख होकर करें।

७॰ जहाँ ‘माला’ का निर्देश न हो, वहाँ कोई भी ‘माला’ प्रयोग में ला सकते हैं। ‘रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम होती है। वैष्णव देवताओं के विषय में ‘तुलसी’ की माला तथा मुसलमानी मन्त्रों में ‘हकीक’ की माला प्रयोग करें। माला संस्कार आवश्यक नहीं है। एक ही माला पर कई मन्त्रों का जप किया जा सकता है।

८॰ शाबर मन्त्रों की साधना में ग्रहण काल का अत्यधिक महत्त्व है। अपने सभी मन्त्रों से ग्रहण काल में कम से कम एक बार हवन अवश्य करना चाहिए। इससे वे जाग्रत रहते हैं।

९॰ हवन के लिये मन्त्र के अन्त में ‘स्वाहा’ लगाने की आवश्यकता नहीं होती। जैसा भी मन्त्र हो, पढ़कर अन्त में आहुति दें।

१०॰ ‘शाबर’ मन्त्रों पर पूर्ण श्रद्धा होनी आवश्यक है। अधूरा विश्वास या मन्त्रों पर अश्रद्धा होने पर फल नहीं मिलता।

११॰ साधना काल में एक समय भोजन करें और ब्रह्मचर्य-पालन करें। मन्त्र-जप करते समय स्वच्छता का ध्यान रखें।

१२॰ साधना दिन या रात्रि किसी भी समय कर सकते हैं।

१३॰ ‘मन्त्र’ का जप जैसा-का-तैसा करं। उच्चारण शुद्ध रुप से होना चाहिए।

१४॰ साधना-काल में हजामत बनवा सकते हैं। अपने सभी कार्य-व्यापार या नौकरी आदि सम्पन्न कर सकते हैं।

१५॰ मन्त्र-जप घर में एकान्त कमरे में या मन्दिर में या नदी के तट- कहीं भी किया जा सकता है।

१६॰ ‘शाबर-मन्त्र’ की साधना यदि अधूरी छूट जाए या साधना में कोई कमी रह जाए, तो किसी प्रकार की हानि नहीं होती।

१७॰ शाबर मन्त्र के छः प्रकार बतलाये गये हैं- (क) सवैया, (ख) अढ़ैया, (ग) झुमरी, (घ) यमराज, (ड़) गरुड़ा, तथा (च) गोपाल शाबर।.................................

शाबर मन्त्रों का आशयः-
स्व॰ वामन शिवराम आप्टे ने सन् १९४२ ई॰ में अपने ‘संस्कृत-कोष’ में ‘शाबर’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है;‘शब (व)-र-अण्-शाबरः, शावरः, शाबरी।’

अर्थ में ‘जंगली जाति’ या ‘पर्वतीय’ लोगों द्वारा बोली जानीवाली ‘भाषा’ बताया गया है। वह एक प्रकार का मन्त्र भी है, इसका वहँ कोई उल्लेख नहीं है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘श्रीरानचरितमानस’ (संवत् १६३१) में शाबर मन्त्रों का महत्त्व स्वीकार किया है, यह भी रहस्योद्घाटन भी किया है कि इस ‘साबर-मन्त्र-जाल’ के स्रष्टा भी शिव-पार्वती ही हैं।

कलि बिलोकि जग-हित हर गिरिजा, ‘साबर-मन्त्र-जाल’ जिन्ह सिरिजा।
अनमिल आखर अरथ न जापू, प्रगट प्रभाव महेश प्रतापू।।

आधुनिक काल में महा-महोपाध्याय स्व॰ पण्डित गोपीनाथ कविराज जी ने अपने प्रसिद्ध ‘तान्त्रिक-साहित्य’ ग्रन्थ के पृष्ठ ६२३-२४ में ‘शाबर’- सम्बन्धी पाँच पाण्डुलिपियों का उल्लेख किया हैः

१॰ शाबर-चिन्तामणि पार्वती-पुत्र आदिनाथ विरचित, २॰ शाबर तन्त्र गोरखनाथ विरचित, ३॰ शाबर तन्त्र सर्वस्व, शाबर मन्त्र, तथा ५॰ शाबर मन्त्र चिन्तामणि।

उक्त पाँच पाण्डुलिपियों में सा प्रथम पाण्डुलिपि एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के सूचीपत्र में संख्या ६१०० से सम्बन्धित है। द्वितीय पाण्डुलिपि की चार प्रतियों का उल्लेख कविराज जी ने किया है। पहली उक्त सोसाइटी की सूची-पत्र ६०९९ से सम्बन्धित है, दूसरी म॰म॰ हरप्रसाद शास्त्री के विवरण की सं॰ १।३५९ है। तीसरी प्रति डेकन कालेज, पूना सूचीपत्र ५८० है। चौथी प्रति की तीन पाण्डुलिपियों का उल्लेख है, जो संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के सूचीपत्र की संख्या २३८६७, २४८१५ और २४५७९ पर वर्णित है। ये तीनों अपूर्ण है। तृतीय पाण्डुलिपि ‘शाबर-तन्त्र-सर्वस्व’ के सम्बन्ध में अपुष्ट कथन लिखा है।

चतुर्थ पाण्डुलिपि की तीन प्रतियों का उल्लेख हुआ है। पहली प्रति एशियाटिक सोसाइटी के सूचीपत्र की संख्या ६५५८ है। दूसरी प्रति बड़ौदा पुस्तकालय के अकारादि सूचीपत्र की संख्या ५६१४ पर है। तीसरी प्रति की दो पाण्डुलिपियां संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के सूचीपत्र की संख्या २३८५६ और २६२३२ से सम्बद्ध है। पञ्चम पाण्डुलिपि एशियाटिक सोसाइटी के सूचीपत्र की संख्या ६१०० पर उल्लिखित है।

‘उ॰प्र॰ हिन्दी संस्थान’ द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दू धर्म कोश’ में सम्पादक डा‌॰ चन्द्रबली पाण्डेय ने ‘शाबर’ शब्द को अपने ‘कोश’ में स्थान तक नहीं दिया है-जबकि ‘शबर-शंकर-विलास’, ‘शबर-स्वामी’, ‘शाबर-भाष्य’ जैसे शब्दों को उन्होनें सम्मिलित किया है।

श्रीतारानाथ तर्क-वाचस्पति भट्टाचार्य द्वारा संकलित एवं चौखम्भा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी द्वारा प्रकाशित प्रख्यात ‘वृहत् संस्कृताभिधानम्’ (कोश) में भी ‘शबर’ या ‘शाबर’ शब्द का उल्लेख नहीं है।

उक्त विश्लेषण के पश्चात भी शाबर विद्या सर्वत्र भारत में अपना एक विशिष्ट अस्तित्व तथा प्रभाव रखती है। वस्तुतः देखा जाये तो समस्त विश्व में शाबर विद्या या समानार्थी विद्या प्रचलन में है। ज्ञान की संज्ञा भले ही बदल जाये मूल भावना तथा क्रिया वही रहती है।......................................

सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र-

ॐ गं गणपतये नमः। सर्व-विघ्न-विनाशनाय, सर्वारिष्ट निवारणाय, सर्व-सौख्य-प्रदाय, बालानां बुद्धि-प्रदाय, नाना-प्रकार-धन-वाहन-भूमि-प्रदाय, मनोवांछित-फल-प्रदाय रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ गुरवे नमः, ॐ श्रीकृष्णाय नमः, ॐ बलभद्राय नमः, ॐ श्रीरामाय नमः, ॐ हनुमते नमः, ॐ शिवाय नमः, ॐ जगन्नाथाय नमः, ॐ बदरीनारायणाय नमः, ॐ श्री दुर्गा-देव्यै नमः।।
ॐ सूर्याय नमः, ॐ चन्द्राय नमः, ॐ भौमाय नमः, ॐ बुधाय नमः, ॐ गुरवे नमः, ॐ भृगवे नमः, ॐ शनिश्चराय नमः, ॐ राहवे नमः, ॐ पुच्छानयकाय नमः, ॐ नव-ग्रह रक्षा कुरू कुरू नमः।।

ॐ मन्येवरं हरिहरादय एव दृष्ट्वा द्रष्टेषु येषु हृदयस्थं त्वयं तोषमेति विविक्षते न भवता भुवि येन नान्य कश्विन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि। ॐ नमो मणिभद्रे। जय-विजय-पराजिते ! भद्रे ! लभ्यं कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्-सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।। सर्व विघ्नं शांन्तं कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीबटुक-भैरवाय आपदुद्धारणाय महान्-श्याम-स्वरूपाय दिर्घारिष्ट-विनाशाय नाना प्रकार भोग प्रदाय मम (यजमानस्य वा) सर्वरिष्टं हन हन, पच पच, हर हर, कच कच, राज-द्वारे जयं कुरू कुरू, व्यवहारे लाभं वृद्धिं वृद्धिं, रणे शत्रुन् विनाशय विनाशय, पूर्णा आयुः कुरू कुरू, स्त्री-प्राप्तिं कुरू कुरू, हुम् फट् स्वाहा।।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ नमो भगवते, विश्व-मूर्तये, नारायणाय, श्रीपुरूषोत्तमाय। रक्ष रक्ष, युग्मदधिकं प्रत्यक्षं परोक्षं वा अजीर्णं पच पच, विश्व-मूर्तिकान् हन हन, ऐकाह्निकं द्वाह्निकं त्राह्निकं चतुरह्निकं ज्वरं नाशय नाशय, चतुरग्नि वातान् अष्टादष-क्षयान् रांगान्, अष्टादश-कुष्ठान् हन हन, सर्व दोषं भंजय-भंजय, तत्-सर्वं नाशय-नाशय, शोषय-शोषय, आकर्षय-आकर्षय, मम शत्रुं मारय-मारय, उच्चाटय-उच्चाटय, विद्वेषय-विद्वेषय, स्तम्भय-स्तम्भय, निवारय-निवारय, विघ्नं हन हन, दह दह, पच पच, मथ मथ, विध्वंसय-विध्वंसय, विद्रावय-विद्रावय, चक्रं गृहीत्वा शीघ्रमागच्छागच्छ, चक्रेण हन हन, पा-विद्यां छेदय-छेदय, चौरासी-चेटकान् विस्फोटान् नाशय-नाशय, वात-शुष्क-दृष्टि-सर्प-सिंह-व्याघ्र-द्विपद-चतुष्पद अपरे बाह्यं ताराभिः भव्यन्तरिक्षं अन्यान्य-व्यापि-केचिद् देश-काल-स्थान सर्वान् हन हन, विद्युन्मेघ-नदी-पर्वत, अष्ट-व्याधि, सर्व-स्थानानि, रात्रि-दिनं, चौरान् वशय-वशय, सर्वोपद्रव-नाशनाय, पर-सैन्यं विदारय-विदारय, पर-चक्रं निवारय-निवारय, दह दह, रक्षां कुरू कुरू, ॐ नमो भगवते, ॐ नमो नारायणाय, हुं फट् स्वाहा।।

ठः ठः ॐ ह्रीं ह्रीं। ॐ ह्रीं क्लीं भुवनेश्वर्याः श्रीं ॐ भैरवाय नमः। हरि ॐ उच्छिष्ट-देव्यै नमः। डाकिनी-सुमुखी-देव्यै, महा-पिशाचिनी ॐ ऐं ठः ठः। ॐ चक्रिण्या अहं रक्षां कुरू कुरू, सर्व-व्याधि-हरणी-देव्यै नमो नमः। सर्व प्रकार बाधा शमनमरिष्ट निवारणं कुरू कुरू फट्। श्रीं ॐ कुब्जिका देव्यै ह्रीं ठः स्वाहा।।
शीघ्रमरिष्ट निवारणं कुरू कुरू शाम्बरी क्रीं ठः स्वाहा।।

शारिका भेदा महामाया पूर्णं आयुः कुरू। हेमवती मूलं रक्षा कुरू। चामुण्डायै देव्यै शीघ्रं विध्नं सर्वं वायु कफ पित्त रक्षां कुरू। मन्त्र तन्त्र यन्त्र कवच ग्रह पीडा नडतर, पूर्व जन्म दोष नडतर, यस्य जन्म दोष नडतर, मातृदोष नडतर, पितृ दोष नडतर, मारण मोहन उच्चाटन वशीकरण स्तम्भन उन्मूलनं भूत प्रेत पिशाच जात जादू टोना शमनं कुरू। सन्ति सरस्वत्यै कण्ठिका देव्यै गल विस्फोटकायै विक्षिप्त शमनं महान् ज्वर क्षयं कुरू स्वाहा।।

सर्व सामग्री भोगं सप्त दिवसं देहि देहि, रक्षां कुरू क्षण क्षण अरिष्ट निवारणं, दिवस प्रति दिवस दुःख हरणं मंगल करणं कार्य सिद्धिं कुरू कुरू। हरि ॐ श्रीरामचन्द्राय नमः। हरि ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्र तारा नव ग्रह शेषनाग पृथ्वी देव्यै आकाशस्य सर्वारिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीवासुदेवाय नमः, बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीविष्णु भगवान् मम अपराध क्षमा कुरू कुरू, सर्व विघ्नं विनाशय, मम कामना पूर्णं कुरू कुरू स्वाहा।।

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीबटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं ॐ श्रीदुर्गा देवी रूद्राणी सहिता, रूद्र देवता काल भैरव सह, बटुक भैरवाय, हनुमान सह मकर ध्वजाय, आपदुद्धारणाय मम सर्व दोषक्षमाय कुरू कुरू सकल विघ्न विनाशाय मम शुभ मांगलिक कार्य सिद्धिं कुरू कुरू स्वाहा।।

एष विद्या माहात्म्यं च, पुरा मया प्रोक्तं ध्रुवं। शम क्रतो तु हन्त्येतान्, सर्वाश्च बलि दानवाः।। य पुमान् पठते नित्यं, एतत् स्तोत्रं नित्यात्मना। तस्य सर्वान् हि सन्ति, यत्र दृष्टि गतं विषं।। अन्य दृष्टि विषं चैव, न देयं संक्रमे ध्रुवम्। संग्रामे धारयेत्यम्बे, उत्पाता च विसंशयः।। सौभाग्यं जायते तस्य, परमं नात्र संशयः। द्रुतं सद्यं जयस्तस्य, विघ्नस्तस्य न जायते।। किमत्र बहुनोक्तेन, सर्व सौभाग्य सम्पदा। लभते नात्र सन्देहो, नान्यथा वचनं भवेत्।। ग्रहीतो यदि वा यत्नं, बालानां विविधैरपि। शीतं समुष्णतां याति, उष्णः शीत मयो भवेत्।। नान्यथा श्रुतये विद्या, पठति कथितं मया। भोज पत्रे लिखेद् यन्त्रं, गोरोचन मयेन च।। इमां विद्यां शिरो बध्वा, सर्व रक्षा करोतु मे। पुरूषस्याथवा नारी, हस्ते बध्वा विचक्षणः।। विद्रवन्ति प्रणश्यन्ति, धर्मस्तिष्ठति नित्यशः। सर्वशत्रुरधो यान्ति, शीघ्रं ते च पलायनम्।।

‘श्रीभृगु संहिता’ के सर्वारिष्ट निवारण खण्ड में इस अनुभूत स्तोत्र के 40 पाठ करने की विधि बताई गई है। इस पाठ से सभी बाधाओं का निवारण होता है।

किसी भी देवता या देवी की प्रतिमा या यन्त्र के सामने बैठकर धूप दीपादि से पूजन कर इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिये। विशेष लाभ के लिये ‘स्वाहा’ और ‘नमः’ का उच्चारण करते हुए ‘घृत मिश्रित गुग्गुल’ से आहुतियाँ दे सकते हैं।......................................

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Saturday, October 6, 2012

पितृ दोष -निवारण -अन्य उपाय

READ MORE ABOUT PITRA-DOSH- AN ARTICLE BY RAMKISHAN SHARMA POSTED ON FACE BOOK BY MR. SUBHASH MALHOTRA -


निवारण - पितृ दोष के बारे में मनीषियों का मत है कि पूर्व जन्म के पापों के कारण या पितरो के शाप के कारण यह दोष कुंडली में प्रकट होता है । अत: पित्र का निवारण पितृ पक्ष में शास्त्रोक्त विधि से किया जाता है ।

अन्य उपाय -
(1) प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा वस्त्र भेंट करने से पितृ दोष कम होता है ।

(2) प्रत्येक अमावस्या को कंडे की धूनी लगाकर उसमें खीर का भोग लगाकर दक्षिण दिशा में पितरों का आव्हान करने व उनसे अपने कर्मों के लिये क्षमायाचना करने से भी लाभ मिलता है ।

(3) पिता का आदर करने, उनके चरण स्पर्श करने, पितातुल्य सभी मनुष्यों को आदर देने से सूर्य मजबूत होता है ।

(4) सूर्योदय के समय किसी आसन पर खड़े होकर सूर्य को निहारने, उससे शक्ति देने की प्रार्थना करने और गायत्री मंत्र का जाप करने से भी सूर्य मजबूत होता है ।

(5) सूर्य को मजबूत करने के लिए माणिक भी पहना जाता है, मगर यह कूंडली में सूर्य की स्थिति पर निर्भर करता है ।

यह तय है कि पितृदोष होने से जातक को श्रम अधिक करना पड़ता है, फल कम व देर से मिलता है । अत: इस हेतु मानसिक तैयरी करना व परिश्रम की आदत डालना श्रेयस्कर रहता है ।


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