Thursday, May 21, 2015

यदि आप अपना घर बनवा रहे हैं तो अपनी कुंडली जरूर देखें।



भवन-निर्माण से पहले , ज्योतिष शास्त्र के  कुछ उपाय आप की समस्या को हल कर सकतें हैं। 

यदि आप  अपना घर बनवा रहे हैं तो अपनी कुंडली जरूर देखें। 



  • यदि आपकी कुंडली के दसवें घर में केतु हो तो निर्माण से पहले केतु को दान करें। इससे निवास के निर्माण में कोई समस्या नही आएगी और आप वहाँ पर सुखी भी रहेंगे।
  • भवन निर्माण से पहले अर्चना-पूजन करने के बाद अपने कारीगरों को मिष्ठान अवश्य खिलाएँ। इस उपाय से भी आप अपने घर में सदैव सुखी रहेंगे।
  • यदि आपकी जन्मकुंडली के ग्यारहवें घर में शनि हो तो आप निर्माण से पहले मुख्य द्वार की चौखट के नीचे चदंन की लकड़ी  अवश्य दबा दें।
  • यदि शनि  जन्मकुंडली के छठे भाव में हो तो निर्माण से  पहले भूमि पर हवन तथा वास्तु पूजन अवश्य करवाएँ।
  • यदि जन्मकुंडली में शनि की अशुभ स्थिति हो तो भवन निर्माण से  पहले गोदान अव्शय करें।
  • यदि शनि जन्मकुंडली के चतुर्थ भाव में हो, तो पैत्रक भूमि अथवा मकान पर निर्माण नहीं करवाना चाहिए।
  • भवन की नीव भरते समय शहद का एक पात्र, नाग-नागिन का जोड़ा, चांदी की पादुकाएं तथा अभिमंत्रित श्रीयंत्र अवश्य रखना चाहिए। इससे आप अपने निवास में  सदैव सम्रधि की ओर अग्रसर रहेगें।
  • आप जब भी भवन निर्माण करवाएँ, उसे अधूरा न छोड़ें। जितना आप का बजट हो, उतने में ही निर्माण हो जाएगा। -


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Wednesday, May 20, 2015

पीपल की पूजा से दरिद्रता दूर होती है, सुख, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है

जीवन मंत्र डेस्क के सौजन्य से

श्रीमद्भगवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने पीपल को स्वयं का स्वरूप बताया है। इसी वजह से मान्यता है कि पीपल की पूजा से दरिद्रता दूर होती है, सुख, ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। नियमित रूप से विशेष शुभ मुहूर्त में पीपल की पूजा करनी चाहिए।

पीपल के पूजन की सामान्य विधि

जिस दिन पीपल का पूजन करना है, उस दिन सूर्योदय के पहले जागकर स्नान आदि नित्य कर्मों से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद सफेद कपड़े पहनकर किसी ऐसे स्थान पर जाएं जहां पीपल स्थित हो। पीपल की जड़ में गाय का दूध, तिल और चंदन मिला हुआ पवित्र जल अर्पित करें।

जल अर्पित करने के बाद जनेऊ फूल व प्रसाद चढ़ाएं। धूप-बत्ती व दीप जलाएं। आसन पर बैठकर या खड़े होकर मंत्र जप करें या इष्ट देवी-देवताओं का स्मरण करें।

मंत्र

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे।
अग्रत: शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नम:।।

आयु: प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम्।
देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गत:।।

मंत्र जपने के बाद आरती करें। प्रसाद ग्रहण करें। पीपल की जड़ में अर्पित थोड़ा सा जल घर में लाकर छिड़कें। इस प्रकार पीपल की पूजा करने पर घर में सुख-समृद्धि और शांति बनी रहती है।

पीपल के कुछ और उपाय

1. ज्योतिष में बताया गया है कि पीपल का एक पौधा लगाने और उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति की कुंडली के सभी ग्रह दोष शांत हो जाते हैं। जैसे-जैसे यह वृक्ष बड़ा होगा आपके घर-परिवार में सुख-समृद्धि बढ़ती जाएगी।

2. यदि कोई व्यक्ति किसी पीपल के नीचे शिवलिंग स्थापित करता है और नियमित रूप से उस शिवलिंग का पूजन करता है तो इस उपाय से बुरा समय धीरे-धीरे दूर हो सकता है।

3. शनि दोष, शनि की साढ़ेसाती और ढय्या के बुरे प्रभावों को दूर करने के लिए प्रत्येक शनिवार पीपल पर जल चढ़ाकर सात परिक्रमा करनी चाहिए।

4. शाम के समय पीपल के वृक्ष के नीचे दीपक लगाना चाहिए।

5. कलयुग में हनुमानजी शीघ्र प्रसन्न होने वाले देवता माने गए हैं। यदि पीपल के नीचे बैठकर हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तो यह उपाय शुभ फल प्रदान करने वाला है।


Thursday, April 16, 2015

महाभारत में १८ (अठारह) संख्या का महत्त्व



महाभारत कथा में १८ (अठारह) संख्या का बड़ा महत्त्व है. महाभारत की कई घटनाएँ १८ संख्या से सम्बंधित है. 
  • महाभारत का युद्ध कुल १८ दिनों तक हुआ था.
  • कौरवों (११ अक्षोहिनी) और पांडवों (९ अक्षोहिनी) की सेना भी कुल १८ अक्षोहिनी थी.
  • महाभारत में कुल १८ पर्व हैं (आदि पर्व, सभा पर्व, वन पर्व, विराट वरव, उद्योग पर्व, भीष्म पर्व, द्रोण पर्व, अश्वमेधिक पर्व, महाप्रस्थानिक पर्व, सौप्तिक पर्व, स्त्री पर्व, शांति पर्व, अनुशाशन पर्व, मौसल पर्व, कर्ण पर्व, शल्य पर्व, स्वर्गारोहण पर्व तथा आश्रम्वासिक पर्व).
  • गीता उपदेश में भी कुल १८ अध्याय हैं.
  • इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी १८ हैं (ध्रितराष्ट्र, दुर्योधन, दुह्शासन, कर्ण, शकुनी, भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य, अश्वस्थामा, कृतवर्मा, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, द्रौपदी एवं विदुर).
  • महाभारत के युद्ध के पश्चात् कौरवों के तरफ से तीन और पांडवों के तरफ से १५ यानि कुल १८ योद्धा ही जीवित बचे.
  • महाभारत को पुराणों के जितना सम्मान दिया जाता है और पुराणों की संख्या भी १८ है.


Friday, April 3, 2015

आज शनिवार, 4 अप्रैल से वैशाख मास प्रारंभ हो रहा है।


4 अप्रैल से सुबह जल्दी नहाएं और करें ये उपाय, दूर होगी दरिद्रता

GOOD ARTICLE FROM DAINIK BHASKAR DOT COM

http://religion.bhaskar.com/news/JM-JYO-RAN-importance-of-vaishakh-month-4951974-PHO.html?seq=2

हिन्दी पंचांग के अनुसार शनिवार, 4 अप्रैल से वैशाख मास प्रारंभ हो रहा है। ये माह 4 मई तक रहेगा। इस माह में भगवान विष्णु का पूजन विशेष रूप से किया जाता है। वैशाख मास स्नान आरंभ हो जाता है। स्कंद पुराण में वैशाख मास को सभी मासों में उत्तम बताया गया है। पुराणों में कहा गया है कि जो व्यक्ति वैशाख मास में सूर्योदय से पहले स्नान करता है तथा व्रत रखता है, वह भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करता है। श्रीहरि की कृपा से घर की दरिद्रता दूर हो सकती है। सभी दुखों से मुक्ति मिलती है और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं और इस मास में जल दान का विशेष महत्व है।
स्कंदपुराण में उल्लेख है कि महीरथ नामक राजा ने केवल वैशाख स्नान से ही वैकुण्ठधाम प्राप्त किया था। इस मास में व्रत करने व्यक्ति को प्रतिदिन सूर्योदय से पहले किसी तीर्थ स्थान, सरोवर, नदी या कुएं पर जाकर या घर पर ही स्नान करना चाहिए। घर स्नान करते समय पवित्र नदियों का नाम जपना चाहिए। स्नान के बाद सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें।
अर्घ्य देते समय इस मंत्र का जप करें-
वैशाखे मेषगे भानौ प्रात: स्नानपरायण:।
अध्यं तेहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।
वैशाख मास में करना चाहिए ये उपाय
1. वैशाख व्रत की कथा सुनना चाहिए।
2. ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम: मंत्र का जप करना चाहिए।
3. व्रत करने वाले व्यक्ति को एक समय भोजन करना चाहिए।
4. वैशाख मास में जल दान का विशेष महत्व है। यदि संभव हो तो इस माह में प्याऊ की स्थापना करवाएं या किसी प्याऊ में मटके का दान करें।
5. किसी जरुरतमंद व्यक्ति को पंखा, खरबूजा, अन्य फल, अन्न आदि का दान करना चाहिए।


हिन्दी पंचांग के अनुसार दूसरा माह है वैशाख
हिन्दी पंचांग के अनुसार चैत्र मास के बाद दूसरा वैशाख मास है। इस माह को बहुत पवित्र और पूजन कर्म के लिए श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इसका संबंध कई देव अवतारों से है। प्राचीन काल में इस माह के शुक्ल पक्ष की अक्षय तृतीया तिथि पर भगवान विष्णु के नर-नारायण, परशुराम, नृसिंह और ह्ययग्रीव अवतार हुए हैं। शुक्ल पक्ष की नवमी को माता सीता धरती से प्रकट हुई थीं। चार धाम में से एक बद्रीनाथ धाम के कपाट वैशाख माह की अक्षय तृतीया से ही खुलते हैं। वैशाख के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी निकलती है। वैशाख मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या पर देववृक्ष वट की पूजा की जाती है। इस माह में किए गए दान, स्नान, जप, यज्ञ आदि शुभ कर्मों से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है।

भगवान विष्णु के पूजन की सामान्य विधि...
वैशाख माह में भगवान विष्णु की पूजा का विशेष महत्व है। किसी ब्राह्मण की मदद से विधि-विधान से भगवान विष्णु का पूजन किया जा सकता है। यदि आप स्वयं पूजन करना चाहते हैं तो ये है भगवान विष्णु पूजन की सामान्य विधि...
हर रोज सुबह स्नान आदि कर्मों से निवृत्त होकर पीले वस्त्र धारण करें। इसके बाद घर के मंदिर में ही भगवान विष्णु की पूजा करें। मिठाई का नैवेद्य, चावल, पीले फूल व धूप, दीप आदि पूजन सामग्रियों का उपयोग करते हुए पूजा करें।
पूजन में मंत्र ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नमः का जप करें। मंत्र का जप कम से कम 108 बार करें।

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Sunday, March 29, 2015

शिव प्रदोष व्रत - 1/4/2015



यह ज्ञानवर्धक आलेख फेसबुक से साभार  लिया गया ही जिसका लिंक भी नीचे दिया जा रहा है --

https://www.facebook.com/shivthepure?fref=nf




शिव प्रदोष व्रत :
पूजा : त्रयोदशी तिथि
समय : संध्या काल ( गोधूली कल )
देवता : भगवान् शंकर

भवाय भवनाशाय महादेवाय धीमते |
रुद्राय नीलकंठाय शर्वाय शशि मौलिने ||
उग्रयोग्राघनाशाय भीमाय भय हारिने ईशानाय |
नमस्तुभ्यं पशुनाम पतये नमः ||



सृष्टि की प्रत्येक वस्तु प्रकृति के विशेष सनातन नियमानुसार ही क्रियाशील है | प्रत्येक कर्म के साथ उसका फल जुड़ा होता है | परन्तु मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने तक ही सीमित है, फल पर मानव का कोई अधिकार नहीं है | समय आने पर कर्म का फल अवश्य प्राप्त होता है... यही प्रकृति का सनातन नियम है| ऐसा ही एक नियम है व्रत | व्रत से ज्ञानशक्ति, विचारशक्ति, बुद्धि, श्रद्धा, मेधा, भक्ति और पवित्रता की वृद्धि होती है और अंतरात्मा शुद्ध होती है |
प्रदोष व्रत में त्रयोदशी तिथि की शाम को गौरीशंकर की पूजा का अत्यधिक महत्व होता है | यह वह समय होता है जब माँ गौरा और भगवान् शंकर अत्यंत शुभ अनुकूल अवस्था में होते हैं | इस समय भगवान् महादेव से प्रत्येक कार्य में विजय और सफलता की प्राप्ति हेतु और सकल मनोकामनाओं की पूर्ती हेतु प्रार्थना के पूजा की जाती है | इस समय प्रभु माँ गौरी के साथ अत्यंत प्रसन्न अवस्था में होते हैं...अतः इस समय की गयी उनकी पूजा, अर्चना और प्रार्थना अवश्य फलीभूत होती है |


स्कन्द पुराण में इसका विवरण मिलता है कि किस प्रकार शांडिल्य मुनि ने इस व्रत की महिमा एक ब्राह्मण महिला से कही | वह ब्राह्मण स्त्री मुनि के पास दो बालको के साथ आई थी, एक उसका अपना पुत्र, सुचिव्रत, और एक अनाथ राजकुमार, धर्मगुप्त, जिसके पिता की युद्ध भूमि में हत्या कर दी गयी थी और शत्रु पक्ष द्वारा राज्य पर कब्ज़ा कर लिया गया था | मुनि के निर्देशानुसार उस ब्राह्मणी और दोनों बालको ने अत्यंत भक्ति और श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत आरम्भ किये | जब आठवा प्रदोष था, तो सुचिव्रत को अमृत कलश की प्राप्ति हुयी और धर्मगुप्त को उसका खोया राज्य भी प्राप्त हो गया और वह तीनो सुखपूर्वक निवास करने लगे |
एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य इस व्रत पूजा से सम्बंधित यह है की इस पूजा के समय समस्त देवता अपने अपने सूक्ष्म रूप में आकर उपस्थित होते हैं इस पूजा में... जिस से इसकी महत्ता और भी अधिक बढ़ जाती है |
शास्त्रों में इस पूजा की महिमा का विस्तृत व्याखान मिलता है | महादेव के मंदिर में प्रभु के यदि केवल दर्शन ही कर लिए जाएँ तो अनेको जन्मो के पाप ताप नष्ट हो जाते हैं और कई गुना सुख सौभाग्य की प्राप्ति होती है | इस अत्यंत दुर्लभ शुभ समय में मात्र एक बिल्वपत्र तक चढ़ाना अनेको महापूजाओ के समान फलदायी होता है | इस समय शिव मंदिर में दीपक प्रज्वलित करने का बहुत अधिक महत्व है | संध्या काल में यदि इस दिन एक भी दीपक प्रज्वलित कर दिया जाय तो यह अनेको पुण्यो को प्रदान करने वाला कहा गया है , जिससे सकल सांसारिक और आध्यात्मिक शुभ फलो की प्राप्ति होती है | इस समय हम प्रभि से सीधा सम्बन्ध जोड़ सकते हैं | अत्यंत भाग्यशाली होते हैं प्रभु के वह भक्त जो इस व्रत को करते हैं... महादेव शीघ्र ही उनके सकल मनोरथो को अवश्य ही पूर्ण करते हैं | सूत जी के कथानुसार इस व्रत से सौ गौदान जितना फल प्राप्त होता है |
प्रदोष पांच प्रकार के होते हैं :
१) नित्य प्रदोष : प्रत्येक दिवस का गोधूली काल (शाम का समय) सूर्यास्त से ३ घटी (७२ मिन.) पहले जब आकाश में तारे दिखने लगते हैं |
२) पक्ष प्रदोष : शुक्ल पक्ष की चतुर्थी का संध्या काल
३) मास प्रदोष : प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी की संध्या
४) महा प्रदोष : प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी की संध्या और जिस दिन शनिवार का भी संयोग हो (अर्थात शुक्ल पक्ष का शनि प्रदोष )
५) प्रलय प्रदोष : वह समय जब सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड शिव में विलीन हो शिव से ही एक हो जाता है (अर्थात महाप्रलय काल ) |
त्रयोदशी तिथि एक माह में दो बार पड़ती है | एक शुक्ल पक्ष में और एक कृष्ण पक्ष में | कुछ भक्त जन केवल शुक्ल पक्ष में ही इस व्रत को करते हैं , तो कुछ भक्त जन दोनों पक्षों की त्रयोदशी को | इस तिथि को संध्या समय सभी देव गण कैलाश पर एकत्रित होते हैं और शिव आराधन करते हैं , जिससे साधक को समस्त सुखो और ऐश्वर्यों की प्राप्ति होती है | 

वार के अनुसार यह व्रत विशेष फलदायी कहा गया है :
रवि (अर्क अथवा सूर्य ) प्रदोष - आरोग्य प्राप्ति और आयु वृद्धि
सोम प्रदोष व्रत- मन: शान्ति और सुरक्षा, सकल मनोरथ सफल
भौम (मंगल ) प्रदोष- ऋण मोचन
बुद्ध प्रदोष - सर्व मनोकामना पूर्ण
गुरु प्रदोष - शत्रु विनाशक, पित्र तृप्ति, भक्ति वृद्धि
शुक्र प्रदोष - अभीष्ट सिद्धि, चारो पदार्थो (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) प्राप्ति
शनि प्रदोष- संतान प्राप्ति
शनि प्रदोष व्रत की महिमा अपार है | यह संतान प्राप्ति हेतु संजीवनी का कार्य करता है |
त्रयोदशी तिथि के देवता कामदेव हैं और अगले दिन पड़ने वाली चतुर्थदशी के देवता भगवान् रूद्र (शिव) स्वयं हैं | और कृष्ण पक्ष की चतुर्थदशी को मासिक शिवरात्री होती है | माघ मास की शिवरात्री महाशिवरात्री कहाती है | शिव ने कामदेव को भस्म अवश्य किया था... परन्तु देवादि देव महादेव समस्त कामनाओ को पूर्ण कर प्रत्येक सुख प्रदान करने वाले देव हैं जो अत्यंत शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं | अत: त्रयोदशी और चतुर्थदशी के योग के समय अर्थात त्रोदाशी को संध्या समय जब सूर्यास्त होने को होता है... तब भगवान् शंकर की पूजा का महत्व और भी अधिक हो जाता है |
इस व्रत को प्रत्येक नर नारी कर सकते हैं | जिन नियमो का पालन इन व्रत को करना होता है, वह हैं :
- अहिंसा
- सत्य वाचन
- ब्रह्मचर्य (दैहिक और मानसिक दोनों प्रकार से )
- दया
- क्षमा
- निंदा और इर्ष्या न करना
कुछ भक्त रात्री जागरण करते हैं... तो कुछ भक्त जन यह व्रत निर्जल निराहार रखते हैं... तो कुछ भक्त फलाहार सहित यह व्रत रखते हैं ... अपनी अपनी सामर्थ्य अनुसार | २४, १४ अथवा १२ वर्ष तक इस व्रत को रखने का संकल्प कुछ भक्त जन लेते हैं ... तो कुछ एक वर्ष तक यह पावन व्रत करते हैं... कुछ भक्त केवल ८ प्रदोष रखते हैं... तो कुछ १६ प्रदोष... |
इस दिन व्रती को प्रात: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत हो शिव मंदिर में
सर्वप्रथम नंदी जी, फिर गणपति, कुमार कार्तिकेय, माँ गौरा की पूजा और नाग पूजन के उपरान्त दीप प्रज्वलित कर पंचामृत ( कच्चा दूध, दही, शहद, देसी घी और शक्कर) से शिवाभिषेक करना चाहिए | भगवान् शिव को अभिषेक अत्यंत प्रिय है | पूजा के समय पवित्र भस्म से स्वयं को पहले त्रिपुंड लगाना अत्यंत शुभ होता है | यदि पवित्र भस्म न उपलभध हो, तो मात्र जल से भी त्रिपुंड धारण किया जा सकता है | अथवा तो धूप से बनी भस्म से भी त्रिपुंड लगाया जाता है | और फिर इसी प्रकार की पूजा शाम के समय, सूर्यास्त से घंटा पहले, पुन: स्नान उपरान्त, की जाती है जिसका महत्व अधिक होता है और शिवालय में दीप प्रज्वलित किये जाते हैं | कुछ भक्त पूजा के समय कलश पूजन भी करते हैं | फिर शिव को अत्यंत प्रिय मृत्युंजय मंत्र की एक माला का जप करने का विधान है इस व्रत में |
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टि वर्धनम |
उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्युर्मुक्षीय माम्रतात ||

फिर प्रभु को भोग लगा कर प्रसाद ग्रहण किया जाता है और भक्त व्रत खोल लेते हैं और रात्री को अन्न ग्रहण कर लेते हैं | परन्तु कुछ भक्त अगले दिन ही अन्न ग्रहण करते हैं |
महादेव शंकर कृपा निधान हैं... अत: उनकी पूजा सेवा से सभी लौकिक, पारलौकिक अथवा आध्यात्मिक मनोवांछित फल प्राप्त किये जा सकते हैं |
*************हर हर महादेव... ॐ नम: शिवाय*************