Thursday, June 12, 2014

परमात्मा ने जो हाथ दिया है वह बहुत हीं अद्भुत है l



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परमात्मा ने जो हाथ दिया है वह बहुत हीं अद्भुत है l 
हाथों की पाँचों उँगलियों को अगर हम दिव्य औषधालय (divine pharmacy) कहें तो अतिश्योक्ति नहीं होगी l 
पृथ्वी , जल , वायु , अग्नि , आकाश इन पाँचों तत्वों के स्विच हमारी उँगलियों में हैं l 
इन्हीं पाँचों तत्वों से पूरी श्रृष्टि बनी हुई है तथा हमारा शरीर भी l
इन पाँचों तत्वों का संतुलन हमारे शरीर में परम आवश्यक है lये पाँचों तत्व अगर शरीर में संतुलित रहें तो फिर शरीर बीमार नहीं होगा l 
अंगूठा अग्नि तत्व है अर्थात मंगल से जुड़ा हुआ , अनामिका पृथ्वी तत्व अर्थात सूर्य का प्रतीक है l
अंगूठा और अनामिका हर समय तेजस्वी विद्युत प्रवाह करते हैं l
पूजा-अर्चना तथा शुभ कार्य में हम अनामिका का हीं प्रयोग करते हैं यथा तिलक लगते समय l
अनामिका (ring finger ) तथा अंगुष्ठ (thumb) के शीर्ष को मिलाने से "पृथ्वी मुद्रा" बनती है (बाकी तीन उँगलियाँ सीधी रखनी हैं)
यह अत्यंत प्रभावशाली मुद्रा है l आंतरिक सूक्ष्म तत्वों में सार्थक प्रवाह लाती है , शरीर में स्फूर्ति , कान्ति एवं तेजस्व बढ़ता है l
यह सौन्दर्यवर्धक मुद्रा है l 45 मिनट इस मुद्रा को करने से जीवन शक्ति (Vital force) का विस्तार होता है l यह मुद्रा आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करती है l

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" बंगला खूब बना महाराज जिसमें नारायण बोले ।
इस बंगले में नौ दरवाजे, बीच पवन का खंभा ।
आवत-जावत कोइ ना देखा, सबसे बड़ा अचंभा ॥ "

यानि की आत्मा l

ईश्वर का सूक्ष्म रूप है आत्मा l सबकी आत्मा अलग है l
आपके अन्दर जो आत्मा है वो आपके भाई या बहन से अलग है l
उनकी आत्मा अलग जगह से आई है l आपकी अलग जगह से l
हर आदमी के बहुत से जन्म होते हैं और पिछले जन्म में आपने जो कर्म किये वो संस्कार बन कर आपके अगले जन्म तक भी साथ रहते हैं।

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हिंदू धर्म में भगवान श्री गणेश का अद्वितीय महत्व है । पूजा-पाठ हो या विधि-विधान, हर मांगलिक, वैदिक कार्यों को प्रारंभ करते समय सर्वप्रथम भगवान गणपति का सुमरन करते हैं ।
यह बुद्धि के अधिदेवता विघ्ननाशक हैं। गणेश शब्द का अर्थ है गणों का स्वामी। हमारे शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां तथा चार अंतःकरण हैं तथा इनके पीछे जो शक्तियां हैं उन्हीं को चौदह देवता कहते हैं ।
देवताओं के मूल प्रेरक यही हैं । शास्त्रों में भी कहा गया है कि गणपति सब देवताओं में अग्रणी हैं । उनके अलग-अलग नाम व अलग-अलग स्वरूप हैं, लेकिन वास्तु में गणेशजी का बहुत महत्व है । गणेशजी अपने आपमें संपूर्ण वास्तु हैं ।
उनके जप का मंत्र ॐ गं गणपतये नम: है ।
 

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आत्मा चार स्तरों में स्वयं के होने का अनुभव करती है -
(1) जाग्रत, (2) स्वप्न, (3) सुषुप्ति और (4) तुरीय अवस्था ।
जन्म एक जाग्रति है और जीवन एक स्वप्न तथा मृत्यु एक गहरी सुषुप्ति अवस्था में चले जाना है, लेकिन जिन लोगों ने जीवन में नियमित 'ध्यान' किया है उन्हें मृत्यु मार नहीं सकती ।
ध्यान की एक विशेष दशा में व्यक्ति 'तुरीय अवस्था' में चला जाता है ।
तुरीय अवस्था को हम समझने की दृष्टि से पूर्ण जागरण की अवस्था कह सकते हैं, लेकिन यह उससे कहीं अधिक बड़ी बात है ।
उक्त चारों स्तरों के उपस्तर भी होते हैं जैसे कोई व्यक्ति जागा हुआ होकर भी सोया-सोया-सा दिखाई देता है ।
आँखें खुली है किंतु कई लोग बेहोशी में जीते रहते हैं ।
जीवन कब गुजर गया उन्हें पता ही नहीं चलता तब जन्म और मृत्यु का क्या भान रखेंगे ।
 

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इस संसार का सृजन, पालन और संहार शिव ही करते हैं ।
शिव की महिमा अपार है । पूरा ब्रह्मांड शिव में समाया है ।
भगवान शिव को प्रसन्न करना सब देवों में आसान है ।
यह तो सिर्फ जलधारा और पुष्प से भी प्रसन्न हो जाते हैं l
शिव की पूजा भस्म से करना भी श्रेष्ठ माना गया है l
शिव की भक्ति करने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है।
शरीर के बाहरी हिस्से को कितना भी सजा लो, लेकिन यह एक दिन चिता की अग्नि में जलकर भस्म हो जाएगा ।
अर्थी के उठने से पहले ही जीवन के अर्थ को समझ लेने से मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं ।
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ईश्वर की कृपा बहुत शक्तिशाली होती है l
ईश्वर की कृपा द्वारा प्रारब्ध से भी पार पाया जा सकता है l
ईश्वर की कृपा भी तभी मिलती है जब सच्चा समर्पण होता है और मनुष्य पुरुषार्थ करता है l पुरुषार्थ तभी संभव है जब व्यक्ति का मन शुद्ध हो l व्यक्ति का मन तब शुद्ध होता है जब वह दया और करुणा से युक्त कार्य करता है l यदि मनुष्य पर ईश्वर का अनुग्रह हो तो प्रकृति के नीयम भी निष्क्रिय हो जाते हैं l हमारे सामने मार्कन्डेय ऋषि का उदहारण है, जिन्होंने अपने पुरुषार्थ और ईश्वर के प्रति सच्ची श्रद्धा और समर्पण से मृत्यु पर विजय पायी थी l प्रारब्धानुसार उनकी आयु अल्प थी, लेकिन जब उनपर परमपिता परमेश्वर का अनुग्रह हुआ तब यमराज की एक ना चली l
यह उदहारण सिद्ध करता है की कठिन पुरुषार्थ और समर्पण द्वारा प्रारब्ध पर भी विजय पाई जा सकती है l
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रामायण में कहा गया है 
" कर्म प्रधान विश्व करि राखा l
जो जस करहिं सो तस फल चाखा ll "

ईश्वर रचित विश्व कर्म प्रधान है l इस विश्व में कर्मों के अनुभव, कर्मों के प्रभाव, कर्मों की गति और स्वयं कर्म प्रधान माने गए हैं l
जो जैसा करता है, वैसा फल पाता है l पुरुषार्थ या यत्न जीवात्मा से मुक्त आत्मा में जाने का और मुक्त आत्मा बनकर परमात्मा का अनुभव प्राप्त करने का प्रयास है l इस प्रयास में शरीर और मन कहाँ तक काम देते हैं यह एक अलग विचारणीय प्रश्न है l

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Wednesday, June 11, 2014

ॐ श्री साईं नाथाय नमः



Onlineprasad

Sadguru Sai Nath
ॐ श्री साईं नाथाय नमः
साईं बाबा ने ना केवल अपनी सादगी और चमत्कारिक घटनाओसे सबका मन्न जीता है. बल्कि उनकी कही बाते भी शिक्षाप्रद है.
आज के योग में भी हम साईं के दिए सन्देश का पालन करे तोकिसी भी परिस्थिति का सामना करे सकते है. आज साईंवार के दिन आईए बाबा को नमन करते हुए उनके द्वारा कही गयी कुछ अमूल्य बातें पढ़े. 
सद्गुरु साईं नाथ महाराज की जय! इस जयकारे के साथ शिर्डी से उदी पाएं. यहाँ क्लिक करे
साईं कहते है -
  • मेरे रहते डर कैसा?
  • मैं निराकार हूँ और सर्वत्र हूँ.
  • मैं हर एक वस्तु में हूँ और उससे परे भी. मैं सभी रिक्त स्थान को भरता हूँ.
  • आप जो कुछ भी देखते हैं उसका संग्रह हूँ मैं.
  • मैं डगमगाता या हिलता नहीं हूँ.
  • यदि कोई अपना पूरा समय मुझमें लगाता है और मेरी शरण में आता है तो उसे अपने शरीर या आत्मा के लिए कोई भय नहीं होना चाहिए.
  • यदि कोई सिर्फ और सिर्फ मुझको देखता है और मेरी लीलाओं को सुनता है और खुद को सिर्फ मुझमें समर्पित करता है तो वह भगवान तक पंहुच जायेगा. 
बाबा की दी शिक्षा अपने घर लायें, साईं सत्चरित का पाठ करे

सालासर बालाजी भगवान हनुमान के भक्तों के लिए एक धार्मिक स्थल


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AN ARTICLE FROM - WWW.ONLINEPRASAD.COM


|| ओउम हं हनुमंते नमः ||



 
सालासर बालाजी भगवान हनुमान के भक्तों के लिए एक धार्मिक स्थल है| यह राजस्थान के चुरू जिले में स्थित है| साल भर में असंख्य भारतीय भक्त दर्शन के लिए सालासर धाम जाते हैं| सालासर हनुमान धाम राजस्थान के जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर सीकर से लगभग 57 किमी व सुजानगढ से लगभग 24 किमी दूर स्थित है। मान्यता है कि सालासर बालाजी सभी की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

सालासर बालाजी मंदिर इतिहास

श्रावण शुक्ल नवमी, संवत् 1811- शनिवार को एक चमत्कार हुआ| नागपुर जिले में असोटा गांव का एक गिन्थाला-जाट किसान अपने खेत को जोत रहा था| अचानक उसके हल से कोई पथरीली चीज़ टकराई और एक गूंजती हुई आवाज पैदा हुई. उसने उस जगह की मिट्टी को खोदा और उसे मिट्टी में सनी हुई दो मूर्तियां मिलीं| उसकी पत्नी उसके लिए भोजन लेकर वहां पहुंची| किसान ने अपनी पत्नी को मूर्ति दिखाई| उसने अपनी साड़ी (पोशाक) से मूर्ति को साफ़ किया. यह मूर्ति बालाजी भगवान श्री हनुमान की थी| उन्होंने समर्पण के साथ अपने सिर झुकाए और भगवान बालाजी की पूजा की. भगवान बालाजी के प्रकट होने का यह समाचार तुरन्त असोटा गांव में फ़ैल गया| असोटा के ठाकुर ने भी यह खबर सुनी| बालाजी ने उसके सपने में आकर उसे आदेश दिया कि इस मूर्ति को चुरू जिले में सालासर भेज दिया जाये| उसी रात भगवान हनुमान के एक भक्त, सालासर के मोहन दासजी महाराज ने भी अपने सपने में भगवान हनुमान या बालाजी को देखा| भगवान बालाजी ने उसे असोटा की मूर्ति के बारे में बताया| उन्होंने तुरन्त असोटा के ठाकुर के लिए एक सन्देश भेजा| जब ठाकुर को यह पता चला कि असोटा आये बिना ही मोहन दासजी को इस बारे में थोडा बहुत ज्ञान है, तो वे चकित हो गए| निश्चित रूप से, यह सब सर्वशक्तिमान भगवान बालाजी की कृपा से ही हो रहा था. मूर्ति को सालासर भेज दिया गया और इसी जगह को आज सालासर धाम के रूप में जाना जाता है| दूसरी मूर्ति को इस स्थान से 25 किलोमीटर दूर पाबोलाम (भरतगढ़) में स्थापित कर दिया गया| 

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Tuesday, May 27, 2014

इन 6 बुरी आदतों से दूर रहे

महाभारत धन संपन्नता या लक्ष्मी का साया सिर पर बनाए रखने की ऐसी ही चाहत पूरी करने के लिए व्यावहारिक जीवन में कर्म व स्वभाव में कुछ गलत आदतों को पूरी तरह से दूर रहने की ओर साफ इशारा करता है। जिसके रहते लक्ष्मी की प्रसन्नता कठिन मानी गई है। 
वैभवशाली, प्रतिष्ठित व सफल जीवन के लिए बेताब इंसान को बुरी आदतों से किनारा करना चाहिए - महाभारत में लिखा है कि - 

षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।


निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता।। 

इस श्लोक मे कर्म, स्वभाव व व्यवहार से जुड़ी इन छ: आदतों से यथासंभव मुक्त रहने की सीख है -

नींद - 

अधिक सोना समय को खोना माना जाता है, साथ ही यह दरिद्रता का कारण बनता है, इसलिए नींद भी संयमित, नियमित और वक्त के मुताबिक हो। यानी वक्त और कर्म को महत्व देने वाला धन पाने का पात्र बनता है। 
तन्द्रा 

तन्द्रा यानि ऊँघना निष्क्रियता की पहचान है। यह कर्म और कामयाबी में सबसे बड़ी बाधा है। कर्महीनता से लक्ष्मी तक पहुंच संभव नहीं। 
डर - भय व्यक्ति के आत्मविश्वास को कम करता है। जिसके बिना सफलता संभव नहीं। निर्भय व पावन चरित्र लक्ष्मी की प्रसन्नता का एक कारण है।
क्रोध 
- क्रोध व्यक्ति के स्वभाव, गुणों और चरित्र पर बुरा असर डालता है। यह दोष सभी पापों का मूल है, जिससे लक्ष्मी दूर रहती है।
आलस्य 
- आलस्य मकसद को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधा है। संकल्पों को पूरा करने के लिए जरूरी है आलस्य को दूर ही रखें। यह अलक्ष्मी का रूप है। 
दीर्घसूत्रता - जल्दी हो जाने वाले काम में अधिक देर करना, टालमटोल या विलंब करना।

अघोरी साधुओं के बारे में...

'ॐ अघोरेभ्यों अघोरेभ्यों नम:'
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 वेबदुनिया संदर्भ...
Aghori baba

शैव संप्रदाय में साधना की एक रहस्यमयी शाखा है अघोरपंथ। अघोरी की कल्पना की जाए तो श्मशान में तंत्र क्रिया करने वाले किसी ऐसे साधु की तस्वीर जेहन में उभरती है जिसकी वेशभूषा डरावनी होती है। अघोरियों के वेश में कोई ढोंगी आपको ठग सकता है लेकिन अघोरियों की पहचान यही है कि वे किसी से कुछ मांगते नहीं है और बड़ी बात यह कि तब ही संसार में दिखाई देते हैं जबकि वे पहले से नियुक्त श्मशान जा रहे हो या वहां से निकल रहे हों। दूसरा वे कुंभ में नजर आते हैं। 

अघोरी को कुछ लोग ओघड़ भी कहते हैं। अघोरियों को डरावना या खतरनाक साधु समझा जाता है लेकिन अघोर का अर्थ है अ+घोर यानी जो घोर नहीं हो, डरावना नहीं हो, जो सरल हो, जिसमें कोई भेदभाव नहीं हो। कहते हैं कि सरल बनना बड़ा ही कठिन होता है। सरल बनने के लिए ही अघोरी कठिन रास्ता अपनाते हैं। साधना पूर्ण होने के बाद अघोरी हमेशा- हमेशा के लिए हिमालय में लीन हो जाता है।

जिनसे समाज घृणा करता है अघोरी उन्हें अपनाता है। लोग श्मशान, लाश, मुर्दे के मांस व कफन आदि से घृणा करते हैं लेकिन अघोर इन्हें अपनाता है। अघोर विद्या व्यक्ति को ऐसा बनाती है जिसमें वह अपने-पराए का भाव भूलकर हर व्यक्ति को समान रूप से चाहता है, उसके भले के लिए अपनी विद्या का प्रयोग करता है।

अघोर विद्या सबसे कठिन लेकिन तत्काल फलित होने वाली विद्या है। साधना के पूर्व मोह-माया का त्याग जरूरी है। मूलत: अघोरी उसे कहते हैं जिसके भीतर से अच्छे-बुरे, सुगंध-दुर्गंध, प्रेम-नफरत, ईर्ष्या-मोह जैसे सारे भाव मिट जाएं। सभी तरह के वैराग्य को प्राप्त करने के लिए ये साधु श्मशान में कुछ दिन गुजारने के बाद पुन: हिमालय या जंगल में चले जाते हैं।

अघोरी खाने-पीने में किसी तरह का कोई परहेज नहीं नहीं करता। रोटी मिले तो रोटी खा लें, खीर मिले खीर खा लें, बकरा मिले तो बकरा और मानव शव मिले तो उससे भी परहेज नहीं। यह तो ठीक है अघोरी सड़ते पशु का मांस भी बिना किसी हिचकिचाहट के खा लेता है। अघोरी लोग गाय का मांस छोड़कर बाकी सभी चीजों का भक्षण करते हैं। मानव मल से लेकर मुर्दे का मांस तक।

घोरपंथ में श्मशान साधना का विशेष महत्व है। अघोरी जानना चाहता है कि मौत क्या होती है और वैराग्य क्या होता है। आत्मा मरने के बाद कहां चली जाती है? क्या आत्मा से बात की जा सकती है? ऐसे ढेर सारे प्रश्न है जिसके कारण अघोरी श्मशान में वास करना पसंद करते हैं। मान्यता है कि श्मशान में साधना करना शीघ्र ही फलदायक होता है। श्मशान में साधारण मानव जाता ही नहीं, इसीलिए साधना में विघ्न पड़ने का कोई प्रश्न नहीं।

अघोरी मानते हैं कि जो लोग दुनियादारी और गलत कामों के लिए तंत्र साधना करते हैं अंत में उनका अहित ही होता है। श्मशान में तो शिव का वास है उनकी उपासना हमें मोक्ष की ओर ले जाती है।

अघोरी श्‍मशान घाट में तीन तरह से साधना करते हैं- श्‍मशान साधना, शव साधना और शिव साधना।

शव साधना : मान्यता है कि इस साधना को करने के बाद मुर्दा बोल उठता है और आपकी इच्छाएं पूरी करता है।

आधी रात के बाद श्मशान साधना


शिव साधना में शव के ऊपर पैर रखकर खड़े रहकर साधना की जाती है। बाकी तरीके शव साधना की ही तरह होते हैं। इस साधना का मूल शिव की छाती पर पार्वती द्वारा रखा हुआ पांव है। ऐसी साधनाओं में मुर्दे को प्रसाद के रूप में मांस और मदिरा चढ़ाया जाता है।

शव और शिव साधना के अतिरिक्त तीसरी साधना होती है श्‍मशान साधना, जिसमें आम परिवारजनों को भी शामिल किया जा सकता है। इस साधना में मुर्दे की जगह शवपीठ की पूजा की जाती है। उस पर गंगा जल चढ़ाया जाता है। यहां प्रसाद के रूप में भी मांस-मंदिरा की जगह मावा चढ़ाया जाता है। 


अघोरियों के पास भूतों से बचने के लिए एक खास मंत्र रहता है। साधना के पूर्व अघोरी अगरबत्ती, धूप लगाकर दीपदान करता है और फिर उस मंत्र को जपते हुए वह चिता के और अपने चारों ओर लकीर खींच देता है। फिर तुतई बजाना शुरू करता है और साधना शुरू हो जाती है। ऐसा करके अघोरी अन्य प्रेत-पिशाचों को चिता की आत्मा और खुद को अपनी साधना में विघ्न डालने से रोकता है।

अघोरियों के बारे में मान्यता है कि वे बड़े ही जिद्दी होते हैं। अगर किसी से कुछ मांगेंगे, तो लेकर ही जाएंगे। क्रोधित हो जाएंगे तो अपना तांडव दिखाएंगे या भला-बुरा कहकर उसे शाप देकर चले जाएंगे। एक अघोरी बाबा की आंखें लाल सुर्ख होती हैं लेकिन अघोरी की आंखों में जितना क्रोध दिखाई देता हैं बातों में उतनी ही शीतलता होती है।

कफन के काले वस्त्रों में लिपटे अघोरी बाबा के गले में धातु की बनी नरमुंड की माला लटकी होती है। नरमुंड न हो तो वे प्रतीक रूप में उसी तरह की माला पहनते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध और पूरे शरीर पर राख मलकर रहते हैं ये साधु। ये साधु अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं।

अघोरपंथ के लोग चार स्थानों पर ही श्मशान साधना करते हैं। चार स्थानों के अलावा वे शक्तिपीठों, बगलामुखी, काली और भैरव के मुख्‍य स्थानों के पास के श्मशान में साधना करते हैं। यदि आपको पता चले कि इन स्थानों को छोड़कर अन्य स्थानों पर भी अघोरी साधना करते हैं तो यह कहना होगा कि वे अन्य श्मशान में साधना नहीं करते बल्कि यात्रा प्रवास के दौरान वे वहां विश्राम करने रुकते होंगे या फिर वे ढोंगी होंगे।

तीन प्रमुख स्थान : 

1. तारापीठ का श्‍मशान : कोलकाता से 180 किलोमीटर दूर स्थित तारापीठ धाम की खासियत यहां का महाश्मशान है। वीरभूम की तारापीठ (शक्तिपीठ) अघोर तांत्रिकों का तीर्थ है। यहां आपको हजारों की संख्‍या में अघोर तांत्रिक मिल जाएंगे। तंत्र साधना के लिए जानी-मानी जगह है तारापीठ, जहां की आराधना पीठ के निकट स्थित श्मशान में हवन किए बगैर पूरी नहीं मानी जाती। कालीघाट को तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है

कालीघाट में होती हैं अघोर तांत्रिक सिद्धियां 


2. कामाख्या पीठ के श्‍मशान : कामाख्या पीठ भारत का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जो असम प्रदेश में है। कामाख्या देवी का मंदिर गुवाहाटी रेलवे स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर नीलांचल पर्वत पर स्थित है। प्राचीनकाल से सतयुगीन तीर्थ कामाख्या वर्तमान में तंत्र-सिद्धि का सर्वोच्च स्थल है। कालिका पुराण तथा देवीपुराण में 'कामाख्या शक्तिपीठ' को सर्वोत्तम कहा गया है और यह भी तांत्रिकों का गढ़ है।

3. रजरप्पा का श्मशान : रजरप्पा में छिन्नमस्ता देवी का स्थान है। रजरप्पा की छिन्नमस्ता को 52 शक्तिपीठों में शुमार किया जाता है लेकिन जानकारों के अनुसार छिन्नमस्ता 10 महाविद्याओं में एक हैं। उनमें 5 तांत्रिक और 5 वैष्णवी हैं। तांत्रिक महाविद्याओं में कामरूप कामाख्या की षोडशी और तारापीठ की तारा के बाद इनका स्थान आता है। 

4. चक्रतीर्थ का श्‍मशान : मध्यप्रदेश के उज्जैन में चक्रतीर्थ नामक स्थान और गढ़कालिका का स्थान तांत्रिकों का गढ़ माना जाता है। उज्जैन में काल भैरव और विक्रांत भैरव भी तांत्रिकों का मुख्‍य स्थान माना जाता है।

मां गढ़कालिका के बारे में जानिए... 
कालिदास की आराध्य देव


सभी 52 शक्तिपीठ तो तांत्रिकों की सिद्धभूमि हैं ही इसके अलावा कालिका के सभी स्थान, बगलामुखी देवी के सभी स्थान और दस महाविद्या माता के सभी स्थान को तांत्रिकों का गढ़ माना गया है। कुछ कहते हैं कि त्र्यम्बकेश्वर भी तांत्रिकों का तीर्थ है।

तंत्र की मुख्य 10 देवियां हैं जिन्हें 10 महाविद्या कहा जाता है-
ये दस हैं- 1. काली, 2. तारा, 3. षोडशी, (त्रिपुरसुंदरी), 4. भुवनेश्वरी, 5. छिन्नमस्ता, 6. त्रिपुर भैरवी, 7. द्यूमावती, 8. बगलामुखी, 9. मातंगी और 10. कमला।

कालिका के तीन प्रमुख तीर्थस्थान... 
जय मां कालिका

भैरव : भगवान भैरव को शिव का अंश अवतार माना जाता है और ये तांत्रिकों के प्रमुख पूजनीय भगवान हैं। इन्हें शिव के 10 रुद्रावतारों में से एक माना गया है। भैरव के 8 रूप हैं-
1. असितांग भैरव, 2. चंड भैरव, 3. रूरू भैरव, 4. क्रोध भैरव, 5. उन्मत्त भैरव, 6. कपाल भैरव, 7. भीषण भैरव, 8. संहार भैरव।

भय को भगाए काल भैरव...

10 रुद्रावतार हैं- 1. महाकाल, 2. तार, 3. बाल भुवनेश, 4. षोडश श्रीविद्येश, 5. भैरव, 6. छिन्नमस्तक, 7. धूमवान, 8. बगलामुख, 9. मातंग और 10. कमल।