Wednesday, April 30, 2014

-ये होते हें कुंडली में अकाल मृत्यु के योग :—पंडित"विशाल"दयानंद शास्त्री–09024390067 -


http://vinayakvaastutimes.wordpress.com/2011/11/02/%E0%A4%AF%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A1%E0%A4%B2%E0%A5%80-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%85%E0%A4%95%E0%A4%BE/

पंडित"विशाल"दयानंद शास्त्री–09024390067 -


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मौत का नाम सुनते ही शरीर में अचानक सिहरन दौड़ जाती है। मृत्यु एक अटल सत्य है, जिसे कोई बदल नहीं सकता। कब, किस कारण से, किस की मौत होगी, यह कोई भी नहीं कह सकता। कुछ लोगों की अल्पायु में ही मौत हो जाती है। ऐसी मौत को अकाल मृत्यु कहते हैं। जातक की कुंडली के आधार पर अकाल मृत्यु के संबंध में जाना जा सकता है।
1- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो जातक को शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।
2- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु आग से होती है।
3- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।
4- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो जातक की मृत्यु अस्वभाविक होती है।
5- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।
6- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का समसप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।
7- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो दुर्घटना होने का भय रहता है।
अष्टम भाव और लग्न भाव के स्वामी बलहीन हो और मंगल ६ घर के साथ बैठा हो तो ये योग बनता है..
क्षीण चन्द्र ८ भाव में हो तो भी योग बनता है या लग्न में शनि हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि न हो तथा उसके साथ सूर्य, चन्द्र , या सूर्य राहू हो तो भी योग बनता है..
ऐसे योंगों में मृत्यु के निम्न कारण होते है जैसे—-
१– शस्त्र से , २- विष से, ३- फांसी लगाने से , आग में जलने से , पानी में डूबने से या मोटर -वाहन दुर्घटना से .
1- यदि जातक की कुंडली के लग्न में मंगल स्थित हो और उस पर सूर्य या शनि की अथवा दोनों की दृष्टि हो तो दुर्घटना में मृत्यु होने की आशंका रहती है।
2- राहु-मंगल की युति अथवा दोनों का समसप्तक होकर एक-दूसरे से दृष्ट होना भी दुर्घटना का कारण हो सकता है।
3- षष्ठ भाव का स्वामी पापग्रह से युक्त होकर षष्ठ अथवा अष्टम भाव में हो तो दुर्घटना होने का भय रहता है।
4- लग्न, द्वितीय भाव तथा बारहवें भाव में क्रूर ग्रह की स्थिति हत्या का कारण बनती है।
5- दशम भाव की नवांश राशि का स्वामी राहु अथवा केतु के साथ स्थित हो तो जातक की मृत्यु अस्वभाविक होती है।
6- लग्नेश तथा मंगल की युति छठे, आठवें या बारहवें भाव में हो तो जातक क शस्त्र से घाव होता है। इसी प्रकार का फल इन भावों में शनि और मंगल के होने से मिलता है।
7- यदि मंगल जन्मपत्रिका में द्वितीय भाव, सप्तम भाव अथवा अष्टम भाव में स्थित हो और उस पर सूर्य की पूर्ण दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु आग से होती है।
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निवारण —

लग्नेश को मजबूत करे उपाय के द्वारा और रत्ना के द्वारा और इसके बाद भी यदि दुर्घटना होती है तो सर महाम्रिन्त्युन्जय का जाप या मृत्संजनी का जाप ही ऐसे जातक को
बचा सकता है…
उदारहण के लिए श्रीमती इंदिरा गाँधी के कुंडली देखे जिनके लग्न में कर्क राशी का शनि है और ६ भाव में राहू और शुक्र …और लग्न का स्वामी चन्द्र ७ भाव में है..
क्या आप दीर्घायु होना चाहते है तो निम्न मंत्रो का ११ बार जाप करें और चमत्कार अपने आप देख्ने…..
” अश्वथामा बलीर व्यासो हनुमानाश च विभिशाना कृपाचार्य च परशुरामम सप्तैता चिरंजीवानाम “
१ अस्वधामा २- राजा बलि ३ व्यास ऋषि , ४-अनजानी नंदन श्री राम भक्त हनुमान ५- लंका के राजा विभीषण
६- महा तपश्वी परशुराम , ७- क्रिपाचार्य .. ये सात नाम है जो अजर अमर है और आज भी पृथ्वी पर विराजमान है…
अद्भुत कवच: सफलता का मंत्र, समस्याओं का निदान—
बग्लामुखी कवच :— 
यह समय घोर प्रतिस्पर्धा का है। आज व्यक्ति खुद के दुखों से ज्यादा दूसरों के सुख से दु:खी है। ऎसे में मनुष्य के कई शत्रु बन जाते हैं। दूसरों से आगे निकलने की होड में व्यक्ति एक-दूसरे का दुश्मन बनता चला जाता है। यहां तक की तांत्रिक प्रयोग करवाने से भी नहीं चूकते। इसलिए हमारे ग्रन्थों में शत्रुबाधा, मुकदमा, कलह, डर इत्यादि से रक्षा करने के लिए बग्लामुखी कवच धारण करना बताया गया है। बग्लामुखी कवच धारण करने के बाद व्यक्ति पर शत्रु द्वारा किया गए सभी तांत्रिक प्रयोग विफल हो जाते हैं। इस कवच को धारण करने से शत्रु भय दूर होता है व मुकदमों में विजय होती है।
अभेद्य महामृत्युंजय कवच : —
जब जन्म कुंडली में मृत्यु का योग न हो लेकिन फिर भी व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त हो जाए तो इसे अकाल मृत्यु कहा जाता है। हर समय किसी अनहोनी का डर लगा रहता है। इन्हीं कारणों से बचाव के लिए मां भगवती ने भगवान शिव से पूछा कि प्रभू अकाल मृत्यु से रक्षा करने और सभी प्रकार के अशुभों से रक्षा का कोई उपाय बताइए। तब भगवान शिव ने महामृत्युंजय कवच के बारे में बताया। महामृंत्युजय कवच को धारण करके मनुष्य सभी प्रकार के अशुभो से बच सकता है और अकाल मृत्यु को भी टाल सकता है।
सर्वजन वशीकरण कवच : —
आकर्षण, व्यक्तित्व, मधुरता, मोहकता ये सब शब्द किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए बहुत मायने रखते हैं। आज के युग में हमें कई लोगों से मिलना पडता है जिसमें पुरूष, स्त्री, अधिकारी व अन्य तरह के लोग होते हैं। उन सब पर प्रभाव जमाने के लिए आवश्यक है कि हमारे व्यक्तित्व में कोई विशेष बात हो या हमारे चेहरे पर चुम्बकीय आर्कषण हो जिसे देखते ही सामने वाला प्रभावित हो जाए। सर्वजन वशीकरण कवच धारण करके आप महसूस करेंगे कि आपके व्यक्तित्व में एक अनोखा आर्कषण आ जाएगा। इसे धारण करने के बाद आप आर्कषण, शांति और सुकून महसूस करेंगे। साथ ही अपने आर्कषक व्यक्तित्व का परिणाम भी देखेंगे।
सौंदर्य कवच :— 
हर स्त्री की सदैव यही सोच बनी रहती है कि उसमें यौवन, रूप लावण्य, आर्कषण सदैव बना रहे। लेकिन कई लडकियों में विवाह योग्य उम्र हो जाने के बाद भी यौवन, रूप लावण्यता नहीं रहती है। ब्यूटी पार्लर अथवा सौंदर्य प्रसाधनों का इस्तेमाल करके बढती उम्र को छुपाने की कोशिश की जाती है। तंत्र में ऎसी औरते अनंग मरू साधना द्वारा काम संतुष्टी प्राप्त कर सकती हैं। लेकिन जो औरते नौकरी या व्यवसाय में है अथवा जो मंत्र जाप या पूजा नहीं कर सकती वे सौंदर्य कवच को धारण कर अपने जीवन में यौवन व रूप लावण्यता प्राप्त कर सकती हैं। इस कवच को धारण करने से शारीरिक ही नहीं अपितु आत्मिक सुंदरता का भी विकास होता है।
अकाल मृत्यु का भय नाश करतें हैं महामृत्युञ्जय—–

ग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ती आसानी से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।
सावन में शिवशंकर की पूजा :—–
सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।
क्यों किया जाता है महादेव का अभिषेक ????

महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्चि्छत हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।

‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’


इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-

‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।

पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥

ध्यान के पश्चात ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ के अलावा जन साधारण को महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । अत: शिव-पार्वती जी का षोडशोपचार पूजन कर राशियों के अनुसार दिये मंत्र से अलग-अलग प्रकार से पुष्प अर्पित करें।

राशियों के अनुसार क्या चढ़ावें भगवान शिव को..????
भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 88 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।

मेष:-ऊँ ह्रौं जूं स:, इस त्र्यक्षरी महामृत्युछञ्जय मंत्र बोलते हुए 11 बेलपत्र चढ़ावें।

वृषभ: ऊँ शशीशेषराय नम: इस मंत्र से 84 शमीपत्र चढ़ावें।
मिथुन: ऊँ महा कालेश्वराय नम: (बेलपत्र 51)।
कर्क: ऊँ त्र्यम्बकाय नम: (नील कमल 61)।
सिंह: ऊँ व्योमाय पाय्र्याय नम: (मंदार पुष्प 108)
कन्या: ऊँ नम: कैलाश वासिने नंदिकेश्वराय नम:(शमी पत्र 41)
तुला: ऊँ शशिमौलिने नम: (बेलपत्र 81) वृश्चिक:
ऊँ महाकालेश्वराय नम: ( नील कमल 11 फूल)
धनु: ऊँ कपालिक भैरवाय नम: (जंवाफूल कनेर108)
मकर : ऊँ भव्याय मयोभवाय नम: (गन्ना रस और बेल पत्र 108)
कुम्भ: ऊँ कृत्सनाय नम: (शमी पत्र 108)
मीन: पिंङगलाय नम: (बेलपत्र में पीला चंदन से राम नाम लिख कर 108)
सावन सोमवार व्रत नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती की अनुकम्पा बनी रहती है।जीवन धन-धान्य से भर जाता है।
सभी अनिष्टों का भगवान शिव हरण कर भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं।
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Saturday, April 26, 2014

क्या है ग्रहों की महादशा?


ज्योतिषाचार्य डॉ.दत्तात्रेय होस्केरे-

http://navabharat.org/jyotish/

आज के इस आलेख में बदलते समय और उसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव का विश्लेषण किया गया है जो इस प्रकार है. यदि हम सूर्य की, चन्द्र और पृथ्वी की सापेक्ष खगोलीय स्थिति का अध्ययन करें तो पता लगता है, कि इनमें प्रतिपल कुछ न कुछ आंशिक परिवर्तन होता है. हो सकता है ये अत्यंत सूक्ष्म हो और इससे ज्यादा सूक्ष्म सापेक्ष परिवर्तन अन्य ग्रहों का भी हो सकता है. हम सभी अवगत हैं कि, मनुष्य पर प्रकाश, उसकी उष्मा और जल इत्यादि का प्रभाव पड़ता है. किसी को गर्मी अच्छी लगती है तो किसी को ठंडी. कोई शीत ऋतु में ज्यादा ऊर्जावान महसूस करता है तो कोई ग्रीष्म ऋतु में ज्यादा अच्छी मानसिक स्थिति में रहता है. हम ये कह सकते हैं कि मनुष्य पर प्रत्येक ग्रह का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता है. जिस तरह सूर्य की तासीर गर्म करने की, चन्द्र की शीतलता प्रदान करने की है उसी तरह अन्य सभी ग्रहों के भी निश्चित प्रभाव हैं और इन सभी का असर समान रूप से सभी पर पड़ता है.

क्या है ग्रहों की महादशा? 

प्रत्येक मनुष्य को अपने निश्चित जीवन काल में लगभग प्रत्येक ग्रह की महादशा से होकर गुजरना पड़ता है. इसे कुछ इस तरह से समझाया जा सकता है: जैसे हम हर कक्षा में विभिन्न विषय पढ़ते है. हर विषय की एक किताब होती है, उस किताब में अध्याय होते हैं और प्रत्येक अध्याय के अंतर्गत अलग अलग टॉपिक्स होते हैं. ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन एक कक्षा है जिसमें विभिन्न ग्रहों की अलग अलग किताबें हैं. जिन्हें पढ़ना आवश्यक है. इन किताबों को महादशा कह सकते हैं.  प्रत्येक ग्रह की किताब कम या ज्यादा पन्नों की है. जैसे शुक्र की किताब सबसे ज्यादा मोटी है, क्योंकि उसकी महादशा भी सबसे ज्यादा  20 वर्ष की है. प्रत्येक ग्रह की किताब में शेष सभी ग्रहों के छोटे-छोटे अध्याय हैं जिन्हे हम प्रत्यंतर दशा कहते है. इसी तरह और भी विभक्तिकरण हम कर सकते हैं. आइये जानते हैं किस ग्रह की मह दशा कितने वर्षों की है: सूर्य:6 वर्ष, चन्द्र:10वर्ष, मंगल और केतु:7 वर्ष, बुध:17वर्ष, गुरु:16 वर्ष, शुक्र:20 वर्ष, शनि:19वर्ष, राहु: 18वर्ष.
हर मनुष्य पर विभिन्न ग्रह दशाओं का प्रभाव, उसकी लग्न कुंडली में उस ग्रह की स्थिति के अनुसार पड़ता है. उदाहरण के लिये यदि किसी व्यक्ति की लग्न कुंडली में चन्द्र उच्च का है या कारक भाव में है, तो चन्द्र की महदशा में उसे लाभ होगा. आइये जानते हैं, विभिन्न ग्रहों की दशाओं में कैसा प्रभाव पड़ता है:

1.सूर्य की महादशा: 

सूर्य आत्मा,शक्ति और लक्ष्मी का कारक ग्रह है. इसे पिता के रूप में भी देखा जाता है. यदि लग्न  कुंडली में सूर्य उच्च का होकर मेष राशि में हो, लग्नस्थ या नवम भाव में हो तो अनुकूल प्रभाव देता है. सिंह और धनु राशि के जातकों के लिये लाभदायक है और तुला तथा कुम्भ राशि के जातकों को कुछ कष्ट हो सकता है. वैसे सूर्य की महादशा में मनुष्य की आदतों में अवश्य परिवर्तन आता है. चूंकि सूर्य तुला राशि में नीच का होता है इसलिये इस राशि के जातकों को सूर्य की महादशा प्रारम्भ होते ही अपनी आदतों और संगति दोनो पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी चाहिये. अधिकतम लाभ के लिये बेल के वृक्ष की प्रतिदिन पूजा करें. सूर्य को जल दें.

2.चन्द्र की महादशा: 

चन्द्रमा मन, माता,राज्य कृपा इत्यादि का कारक ग्रह है. यदि आपकी कुंडली में चन्द्र उच्च का होकर वृषभ राशि में है या चतुर्थ भाव में है तो चन्द्र की महादशा में आपको सकारात्मक परिणाम मिलेंगे. वृश्चिक राशि के जातकों को सर्वाधिक लाभ हो सकता है. वैसे तो चन्द्र की महादशा किसी के लिये भी कष्टकारक नही होती. लेकिन यदि आपकी कुंडली में चन्द्र राहु या शनि द्वारा दृष्ट है या उनकी युति में है तो भावनात्मक कष्ट हो सकते हैं. लाभ के लिये शिव जी की आराधना करें. चाँदी का एक सिक्का अपने पास रखें.

3.मंगल की महादशा: 

मंगल को वीरता, छोटा भाई, शत्रु और भूमि का कारक माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में मंगल उच्च का होकर मकर राशि में है या तीसरे या छठवें भाव में है तो आपको मंगल के दशा में लाभ होगा. कर्क और मीन राशी के जातकों के लिये मंगल की महादशा लाभदायक होती है. वृषभ,कन्या और मकर राशि के जातकों को मंगल की महादशा में अत्याधिक क्रोध के कारण हानि हो सकती है. मंगल की महादशा में भूमि,स्वास्थ्य और रोजगार सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिये हनुमत आराधना कर एक ताँबे का सिक्का अपने पास हमेशा रखें.

4.बुध की महादशा: 

बुध को विद्या,बुद्धि, विवेक और कार्य क्षमता का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में बुध कन्या राशि में अवस्थित उच्च का है या चौथे अथवा दशम भाव में है तो बुध की महादशा आपके लिये विकास के बहुत सारे अवसर लेकर आयेगी. वैसे तो बुध की महादशा सभी के लिये सामान्य होती है लेकिन कन्या व मिथुन राशि के जातकों के लिये उत्तम होती है. मीन राशि के जातकों के निर्णय बुध की महादशा में गलत हो सकते हैं. विद्या प्राप्ति और कार्य क्षमता बढ़ाने के लिये बुध की महदशा में विधारा की जड़ धारण करें. गणेश जी का प्रतिदिन पूजन करें.

5.गुरु की महादशा:  

गुरु को गुरु, संतान,देह और सौन्दर्य का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में गुरु दूसरे, पाँचवे,नवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में है तो आपको गुरु की महादशा में लाभ होगा. यदि गुरु मकर राशि में पड़कर नीच का है या राहु अथवा शनि द्वारा दृष्ट है तो हानि भी हो सकती है. मेष राशि के जातकों को व्यवसायिक उन्नति   और प्रमोशन जैसे लाभ गुरु की महादशा में ही होते हैं. कन्या राशि के जातकों को गुरु की महादशा में राज्य से सम्बन्धित हानि हो सकती है. समग्र उन्नति के लिये गुरु की महादशा में केले के पेड़ का पूजन कर विष्णु मंत्रों का जप करें.

6. शुक्र की महादशा:

शुक्र को शास्त्रों में पत्नि सुख, वाहन,प्रेम, सौन्दर्य इत्यादि का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी कुंडली में शुक्र सप्तम भाव में है या मीन राशि में अवस्थित उच्च का है तो आपको शुक्र की महादशा में अद्वितीय लाभ होगा. शुक्र यदि कन्या राशि में है, तो आर्थिक हानि हो सकती है. मिथुन मकर और कुम्भ राशि के जातकों के लिये शुक्र की महादशा अत्यंत लाभदयक हो सकती है. कर्क और वृश्चिक राशि के जातकों को आर्थिक निर्णय सोच समझ कर लेने होंगे. शुक्र की महादशा में अधिकतम लाभ के लिये श्वेत अश्व का दर्शन प्रतिदिन करें. लक्ष्मी जी की आराधना करें.

7.शनि की महादशा: 

शनि को आयु, जीविका, नौकरी इत्यादि का कारण माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में शनि तुला में होकर उच्च का है अथवा छठवें,आठवें,दसवें या बारहवें भाव में है तो आपको सम्पन्नता की राह दिखाता है. वृषभ और कन्या राशि के जातकों के लिये शनि की महादशा लाभदायक होती है. मेष, सिंह और धनु राशि के जातकों को न्याय सम्बन्धी समस्याएं आ सकती है. वैसे तो शनि की महादशा में सभी को हर तरह की परिस्थियों से दो चार होना पड़ता है, क्योंकि शनि की महादशा 19 वर्ष की एक लम्बी अवधि होती है. अधिकतम लाभ के लिये पीपल के पेड़ की छाँव में बैठ कर शनि मंत्रों का जाप करना या लोहे का एक छल्ला मध्यिका में पहनें.

8.राहु की महादशा: 

राहु एक छाया ग्रह है और दादा और पूर्वजों का कारक ग्रह है. मनुष्य के जीवन में जब भी कोई अवस्था ऐसी हो जब उसे कुछ सूझ न रहा हो तो समझना चाहिये कि राहु का प्रभाव है.  राहु अस्थिरता का कारक ग्रह है. यदि आपकी कुंडली में मिथुन राशि में है तो अपनी महादशा में सकारात्मक प्रभाव देगा. आपकी कुंडली में राहु यदि दशम भावस्थ है तो अपनी महादशा में व्यवसायिक प्रगति दे सकता है. राहु की महादशा में शिव जी की आराधना अवश्य करें. चन्दन का एक टुकड़ा कंठ में धारण करें. लाभ के लिये अच्छे लोगों से मित्रता करें.

9.केतु की महादशा: 

राहु के तरह केतु भी एक छाया ग्रह है जो धनु राशि में उच्च का होता है. ये नाना और अन्य पितरों का कारक ग्रह है. केतु की महा दशा में अनचाहे कार्यों को करने के स्थिति आ सकती है. मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में फंस सकता है. यदि आपकी कुंडली में लग्नस्थ केतु सूर्य की युति में है तो अपनी दशा में आपको आर्थिक लभ दे सकता है. लाभ के लिये मत्स्यावतार का पूजन करें. पानी से भरा एक बर्तन सदैव अपने आसपास रखें.
वैसे यह आम धारणा है कि राहु, केतु और शनि अपनी महादशा में मनुष्य का अहित करते हैं, जो कि गलत है. 

हमारे पुरातन आध्यात्म में स्थिरता, नेकनियती और सत्कर्म को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है. जो भी इन सभी नियमों का पालन कर दृढ़ता से अपने  कार्य को सम्पादित करता है, उसे ये तीनो ही ग्रह अत्याधिक लाभ देते हैं. सभी ग्रहों की महादशा मनुष्य को एक सन्देश देती है कि प्रत्येक मनुष्य को विभिन्न समय चक्र से गुजर कर ही अपने आप को सफल साबित करना है, अत: किसे भी ग्रह की महादशा अपनी नैतिकता को न खोयें. प्रत्येक ग्रह की महादशा आपके लिये सफलता का एक पायदान है




Wednesday, April 23, 2014

MAKE YOUR LIFE BETTER


Saturday, April 19, 2014

जनेऊ का धार्मिक महत्व


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आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ का धार्मिक दृष्टि से बड़ा महत्व है।

जनेऊ का निर्माण दो तूड़ियों से किया जाता है जिसमें तीन -तीन लपेट होते हैं। तीनों लपेट क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों देवताओं के प्रतीक माने गए हैं। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है।

जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से जनेऊ स्वास्थ्य और पौरुष के लिए बहुत ही लाभकारी होता है। यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ा होता है।

मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्र की रक्षा होती है। जिन पुरुषों को बार-बार बुरे स्वप्न आते हैं उन्हें सोते समय कान पर जनेऊ लपेट कर सोना चाहिए। माना जाता है कि इससे बुरे स्वप्न की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है।

यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।


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Wednesday, April 16, 2014

खाटूश्यामजी कलियुग मे कृष्ण का अवतार है,


http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%82%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9C%E0%A5%80

FROM WIKI PEDIA 

हिन्दू धर्म के अनुसार, खाटूश्यामजी कलियुग मे कृष्ण का अवतार है, जिन्होनें श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था कि वे कलियुग में उनके नाम से पूजे जायेंगे। कृष्ण बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि जैसे जैसे कलियुग का अवतरण होगा, तुम श्याम के नाम से पूजे जाओगे। तुम्हारे भक्तों का केवल तुम्हारे नाम का सच्चे दिल से उच्चराण मात्र से ही उद्धार होगा। यदि वे तुम्हारी सच्चे मन और प्रेमभाव रखकर पूजा करेंगे तो उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होगी और सभी कार्य सफ़ल होंगे।

श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे महान पान्डव भीम के पुत्रघटोतकच्छ और नाग कन्या मौरवी के पुत्र है। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान यौद्धा थे। उन्होने युद्ध कला अपनी माँ से सीखी। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेध्य बाण प्राप्त किये और तीन बाणधारी का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनो लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।
महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुये तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जाग्रत हुयी। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे तब माँ को हारे हुये पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने लीले घोडे, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभुमि की और अग्रसर हुये।
सर्वव्यापी कृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिये उसे रोका और यह जानकर उनकी हंसी भी उडायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकस में ही आयेगा। यिद तीनो बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनो लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस पीपल के पेड के सभी पत्रों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खडे थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और इश्वर को स्मरण कर बाण पेड के पत्तो की और चलाया।
तीर ने क्षण भर में पेड के सभी पत्तों को भेद दिया और कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होनें अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये वर्ना ये आपके पैर को चोट पहुंचा देगा। कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस और से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराये कि वह युद्ध में जिस और से भाग लेगा जो कि निर्बल हो और हार की और अग्रसर हो। कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है, और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
ब्राह्मण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा. कृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिये चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की द्डता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और कृष्ण के बारे में सुन कर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।
उन्होनें बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमीं की पूजा के लिये एक वीर्यवीर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यक्ता होती है, उन्होनें बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतैव उनका शीश दान में मांगा. बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्री कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होनें अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभुमि के समीप ही एक पहाडी पर सुशोभित किया गया, जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।
युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी खींचाव-तनाव हुआ कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर कृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है अतैव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है। सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि कृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभुमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली दुर्गा कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।
कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है।

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को रणभूमि में प्रकट हुई १४ देवियों ( सिद्ध, अम्बिका, कपाली, तारा, भानेश्वरी, चर्ची, एकबीरा, भूताम्बिका, सिद्धि, त्रेपुरा, चंडी, योगेश्वरी, त्रिलोकी, जेत्रा) के द्वारा अमृतसे सिंचित करवा कर उस शीश को देवत्व प्रदान करके अजर अमर कर दिया... एवं भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को कलियुग में देव रूप में पूजित होकर भक्तों की मनोकामनाओ को पूर्ण करने का वरदान दिया... वीर बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष महाभारत के युद्ध देखने की अपनी प्रबल इच्छा को बताया जिसे श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के देवत्व प्राप्त शीश को ऊंचे पर्वत पर रखकर पूर्ण की... एवं उनके धड़ काअंतिम संस्कार शास्त्रोक्त विधि से सम्पूर्ण करवाया...

उनका शीश खाटू में दफ़नाया गया। एक बार एक गाय उस स्थान पर आकर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी, बाद में खुदायी के बाद वह शीश प्रगट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिये एक ब्राह्मण को सुपुर्द कर दिय गया। एक बार खाटू के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिये और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिये प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनाया गया था. मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर १७२० ई० में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया. मंदिर इस समय अपने वर्तमान आकार ले लिया और मूर्ति गर्भगृह में प्रतिष्ठापित किया गया था. मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बना है. खाटूश्याम परिवारों की एक बड़ी संख्या के परिवार देवता है.-- 

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महाभारत युद्ध की समाप्ति पर महाबली श्री भीमसेन को यह अभिमान हो गया कि, यह महाभारत का युद्ध केवल उनके पराक्रम से जीता गया है, तब श्री अर्जुन ने कहा कि, वीर बर्बरीक के शीश से पूछा जाये की उसने इस युद्ध में किसका पराक्रम देखा है.... तब वीर बर्बरीक के शीश ने महाबली श्री भीमसेन का मान मर्दन करते हुए उत्तर दिया की यह युद्ध केवल भगवान श्रीकृष्ण की निति के कारण जीता गया.... और इस युद्ध में केवल भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र चलता था, अन्यत्र कुछ भी नहीं था... वीर बर्बरीक के द्वारा ऐसा कहते ही समस्त नभ मंडल उद्भाषित हो उठा... एवं उस देव स्वरुप शीश पर पुष्प की वर्षा होने लगी... देवताओं की दुदुम्भिया बज उठी... तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः वीर बर्बरीक के शीश को प्रणाम करते हुए कहा - "हे वीर बर्बरीक आप कलिकाल में सर्वत्र पूजित होकर अपने सभी भक्तो के अभीष्ट कार्य को पूर्ण करोगे... अतएव आपको इस क्षेत्र का त्याग नहीं करना चाहिये, हम लोगो से जो भी अपराध हो गए हो, उन्हें कृपा कर क्षमा कीजिये"

इतना सुनते ही पाण्डव सेना में हर्ष की लहर दौड गयी... सैनिको ने पवित्र तीर्थो के जल से शीश को पुनः सिंचित किया और अपनी विजय ध्वजाएँ शीश के समीप फहराई... इस दिन सभी ने महाभारत का विजय पर्व धूमधाम से मनाया।

वीरवर मोरवीनंदन श्री बर्बरीक जी का चरित्र स्कन्द पुराण के "माहेश्वर खंड के अंतर्गत द्वितीय उपखंड 'कौमारिक खंड'" में सुविस्तार पूर्वक दिया हुआ है। ऋषि वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण में "माहेश्वर खंड के द्वितीय उपखंड कौमरिका खंड" के ६६ वें अध्याय के ११५वे एवं ११६वे श्लोक में इनकी स्तुति इस आलौकिक स्त्रोत्र से भी की है।
पाण्डवकुलभूषण मोरवीनंदन खाटूश्याम
दादा का नाम : महाबली भीमसेन
दादी का नाम : हिडिंबा
पिता का नाम : महाबली घटोत्कच
माता का नाम : कामकटंककटा (मोरवी)
अस्त्र  : तीन अमोघ बाण, धनुष
वाहन  : नीला घोड़ा
पाठ्य  : स्कन्द पुराण (कौमारिका खंड)
सीकर जिला , राजस्थान में खाटू श्याम जी मंदिर