Saturday, April 26, 2014

क्या है ग्रहों की महादशा?


ज्योतिषाचार्य डॉ.दत्तात्रेय होस्केरे-

http://navabharat.org/jyotish/

आज के इस आलेख में बदलते समय और उसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव का विश्लेषण किया गया है जो इस प्रकार है. यदि हम सूर्य की, चन्द्र और पृथ्वी की सापेक्ष खगोलीय स्थिति का अध्ययन करें तो पता लगता है, कि इनमें प्रतिपल कुछ न कुछ आंशिक परिवर्तन होता है. हो सकता है ये अत्यंत सूक्ष्म हो और इससे ज्यादा सूक्ष्म सापेक्ष परिवर्तन अन्य ग्रहों का भी हो सकता है. हम सभी अवगत हैं कि, मनुष्य पर प्रकाश, उसकी उष्मा और जल इत्यादि का प्रभाव पड़ता है. किसी को गर्मी अच्छी लगती है तो किसी को ठंडी. कोई शीत ऋतु में ज्यादा ऊर्जावान महसूस करता है तो कोई ग्रीष्म ऋतु में ज्यादा अच्छी मानसिक स्थिति में रहता है. हम ये कह सकते हैं कि मनुष्य पर प्रत्येक ग्रह का कुछ न कुछ प्रभाव अवश्य पड़ता है. जिस तरह सूर्य की तासीर गर्म करने की, चन्द्र की शीतलता प्रदान करने की है उसी तरह अन्य सभी ग्रहों के भी निश्चित प्रभाव हैं और इन सभी का असर समान रूप से सभी पर पड़ता है.

क्या है ग्रहों की महादशा? 

प्रत्येक मनुष्य को अपने निश्चित जीवन काल में लगभग प्रत्येक ग्रह की महादशा से होकर गुजरना पड़ता है. इसे कुछ इस तरह से समझाया जा सकता है: जैसे हम हर कक्षा में विभिन्न विषय पढ़ते है. हर विषय की एक किताब होती है, उस किताब में अध्याय होते हैं और प्रत्येक अध्याय के अंतर्गत अलग अलग टॉपिक्स होते हैं. ठीक इसी तरह मनुष्य का जीवन एक कक्षा है जिसमें विभिन्न ग्रहों की अलग अलग किताबें हैं. जिन्हें पढ़ना आवश्यक है. इन किताबों को महादशा कह सकते हैं.  प्रत्येक ग्रह की किताब कम या ज्यादा पन्नों की है. जैसे शुक्र की किताब सबसे ज्यादा मोटी है, क्योंकि उसकी महादशा भी सबसे ज्यादा  20 वर्ष की है. प्रत्येक ग्रह की किताब में शेष सभी ग्रहों के छोटे-छोटे अध्याय हैं जिन्हे हम प्रत्यंतर दशा कहते है. इसी तरह और भी विभक्तिकरण हम कर सकते हैं. आइये जानते हैं किस ग्रह की मह दशा कितने वर्षों की है: सूर्य:6 वर्ष, चन्द्र:10वर्ष, मंगल और केतु:7 वर्ष, बुध:17वर्ष, गुरु:16 वर्ष, शुक्र:20 वर्ष, शनि:19वर्ष, राहु: 18वर्ष.
हर मनुष्य पर विभिन्न ग्रह दशाओं का प्रभाव, उसकी लग्न कुंडली में उस ग्रह की स्थिति के अनुसार पड़ता है. उदाहरण के लिये यदि किसी व्यक्ति की लग्न कुंडली में चन्द्र उच्च का है या कारक भाव में है, तो चन्द्र की महदशा में उसे लाभ होगा. आइये जानते हैं, विभिन्न ग्रहों की दशाओं में कैसा प्रभाव पड़ता है:

1.सूर्य की महादशा: 

सूर्य आत्मा,शक्ति और लक्ष्मी का कारक ग्रह है. इसे पिता के रूप में भी देखा जाता है. यदि लग्न  कुंडली में सूर्य उच्च का होकर मेष राशि में हो, लग्नस्थ या नवम भाव में हो तो अनुकूल प्रभाव देता है. सिंह और धनु राशि के जातकों के लिये लाभदायक है और तुला तथा कुम्भ राशि के जातकों को कुछ कष्ट हो सकता है. वैसे सूर्य की महादशा में मनुष्य की आदतों में अवश्य परिवर्तन आता है. चूंकि सूर्य तुला राशि में नीच का होता है इसलिये इस राशि के जातकों को सूर्य की महादशा प्रारम्भ होते ही अपनी आदतों और संगति दोनो पर सूक्ष्म दृष्टि रखनी चाहिये. अधिकतम लाभ के लिये बेल के वृक्ष की प्रतिदिन पूजा करें. सूर्य को जल दें.

2.चन्द्र की महादशा: 

चन्द्रमा मन, माता,राज्य कृपा इत्यादि का कारक ग्रह है. यदि आपकी कुंडली में चन्द्र उच्च का होकर वृषभ राशि में है या चतुर्थ भाव में है तो चन्द्र की महादशा में आपको सकारात्मक परिणाम मिलेंगे. वृश्चिक राशि के जातकों को सर्वाधिक लाभ हो सकता है. वैसे तो चन्द्र की महादशा किसी के लिये भी कष्टकारक नही होती. लेकिन यदि आपकी कुंडली में चन्द्र राहु या शनि द्वारा दृष्ट है या उनकी युति में है तो भावनात्मक कष्ट हो सकते हैं. लाभ के लिये शिव जी की आराधना करें. चाँदी का एक सिक्का अपने पास रखें.

3.मंगल की महादशा: 

मंगल को वीरता, छोटा भाई, शत्रु और भूमि का कारक माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में मंगल उच्च का होकर मकर राशि में है या तीसरे या छठवें भाव में है तो आपको मंगल के दशा में लाभ होगा. कर्क और मीन राशी के जातकों के लिये मंगल की महादशा लाभदायक होती है. वृषभ,कन्या और मकर राशि के जातकों को मंगल की महादशा में अत्याधिक क्रोध के कारण हानि हो सकती है. मंगल की महादशा में भूमि,स्वास्थ्य और रोजगार सम्बन्धी समस्याओं के समाधान के लिये हनुमत आराधना कर एक ताँबे का सिक्का अपने पास हमेशा रखें.

4.बुध की महादशा: 

बुध को विद्या,बुद्धि, विवेक और कार्य क्षमता का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में बुध कन्या राशि में अवस्थित उच्च का है या चौथे अथवा दशम भाव में है तो बुध की महादशा आपके लिये विकास के बहुत सारे अवसर लेकर आयेगी. वैसे तो बुध की महादशा सभी के लिये सामान्य होती है लेकिन कन्या व मिथुन राशि के जातकों के लिये उत्तम होती है. मीन राशि के जातकों के निर्णय बुध की महादशा में गलत हो सकते हैं. विद्या प्राप्ति और कार्य क्षमता बढ़ाने के लिये बुध की महदशा में विधारा की जड़ धारण करें. गणेश जी का प्रतिदिन पूजन करें.

5.गुरु की महादशा:  

गुरु को गुरु, संतान,देह और सौन्दर्य का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में गुरु दूसरे, पाँचवे,नवें, दसवें और ग्यारहवें भाव में है तो आपको गुरु की महादशा में लाभ होगा. यदि गुरु मकर राशि में पड़कर नीच का है या राहु अथवा शनि द्वारा दृष्ट है तो हानि भी हो सकती है. मेष राशि के जातकों को व्यवसायिक उन्नति   और प्रमोशन जैसे लाभ गुरु की महादशा में ही होते हैं. कन्या राशि के जातकों को गुरु की महादशा में राज्य से सम्बन्धित हानि हो सकती है. समग्र उन्नति के लिये गुरु की महादशा में केले के पेड़ का पूजन कर विष्णु मंत्रों का जप करें.

6. शुक्र की महादशा:

शुक्र को शास्त्रों में पत्नि सुख, वाहन,प्रेम, सौन्दर्य इत्यादि का कारक ग्रह माना गया है. यदि आपकी कुंडली में शुक्र सप्तम भाव में है या मीन राशि में अवस्थित उच्च का है तो आपको शुक्र की महादशा में अद्वितीय लाभ होगा. शुक्र यदि कन्या राशि में है, तो आर्थिक हानि हो सकती है. मिथुन मकर और कुम्भ राशि के जातकों के लिये शुक्र की महादशा अत्यंत लाभदयक हो सकती है. कर्क और वृश्चिक राशि के जातकों को आर्थिक निर्णय सोच समझ कर लेने होंगे. शुक्र की महादशा में अधिकतम लाभ के लिये श्वेत अश्व का दर्शन प्रतिदिन करें. लक्ष्मी जी की आराधना करें.

7.शनि की महादशा: 

शनि को आयु, जीविका, नौकरी इत्यादि का कारण माना गया है. यदि आपकी लग्न कुंडली में शनि तुला में होकर उच्च का है अथवा छठवें,आठवें,दसवें या बारहवें भाव में है तो आपको सम्पन्नता की राह दिखाता है. वृषभ और कन्या राशि के जातकों के लिये शनि की महादशा लाभदायक होती है. मेष, सिंह और धनु राशि के जातकों को न्याय सम्बन्धी समस्याएं आ सकती है. वैसे तो शनि की महादशा में सभी को हर तरह की परिस्थियों से दो चार होना पड़ता है, क्योंकि शनि की महादशा 19 वर्ष की एक लम्बी अवधि होती है. अधिकतम लाभ के लिये पीपल के पेड़ की छाँव में बैठ कर शनि मंत्रों का जाप करना या लोहे का एक छल्ला मध्यिका में पहनें.

8.राहु की महादशा: 

राहु एक छाया ग्रह है और दादा और पूर्वजों का कारक ग्रह है. मनुष्य के जीवन में जब भी कोई अवस्था ऐसी हो जब उसे कुछ सूझ न रहा हो तो समझना चाहिये कि राहु का प्रभाव है.  राहु अस्थिरता का कारक ग्रह है. यदि आपकी कुंडली में मिथुन राशि में है तो अपनी महादशा में सकारात्मक प्रभाव देगा. आपकी कुंडली में राहु यदि दशम भावस्थ है तो अपनी महादशा में व्यवसायिक प्रगति दे सकता है. राहु की महादशा में शिव जी की आराधना अवश्य करें. चन्दन का एक टुकड़ा कंठ में धारण करें. लाभ के लिये अच्छे लोगों से मित्रता करें.

9.केतु की महादशा: 

राहु के तरह केतु भी एक छाया ग्रह है जो धनु राशि में उच्च का होता है. ये नाना और अन्य पितरों का कारक ग्रह है. केतु की महा दशा में अनचाहे कार्यों को करने के स्थिति आ सकती है. मनुष्य विपरीत परिस्थितियों में फंस सकता है. यदि आपकी कुंडली में लग्नस्थ केतु सूर्य की युति में है तो अपनी दशा में आपको आर्थिक लभ दे सकता है. लाभ के लिये मत्स्यावतार का पूजन करें. पानी से भरा एक बर्तन सदैव अपने आसपास रखें.
वैसे यह आम धारणा है कि राहु, केतु और शनि अपनी महादशा में मनुष्य का अहित करते हैं, जो कि गलत है. 

हमारे पुरातन आध्यात्म में स्थिरता, नेकनियती और सत्कर्म को बहुत ज्यादा महत्व दिया गया है. जो भी इन सभी नियमों का पालन कर दृढ़ता से अपने  कार्य को सम्पादित करता है, उसे ये तीनो ही ग्रह अत्याधिक लाभ देते हैं. सभी ग्रहों की महादशा मनुष्य को एक सन्देश देती है कि प्रत्येक मनुष्य को विभिन्न समय चक्र से गुजर कर ही अपने आप को सफल साबित करना है, अत: किसे भी ग्रह की महादशा अपनी नैतिकता को न खोयें. प्रत्येक ग्रह की महादशा आपके लिये सफलता का एक पायदान है




Wednesday, April 23, 2014

MAKE YOUR LIFE BETTER


Saturday, April 19, 2014

जनेऊ का धार्मिक महत्व


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आपने देखा होगा कि बहुत से लोग बाएं कांधे से दाएं बाजू की ओर एक कच्चा धागा लपेटे रहते हैं। इस धागे को जनेऊ कहते हैं। जनेऊ का धार्मिक दृष्टि से बड़ा महत्व है।

जनेऊ का निर्माण दो तूड़ियों से किया जाता है जिसमें तीन -तीन लपेट होते हैं। तीनों लपेट क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु और महेश इन तीनों देवताओं के प्रतीक माने गए हैं। धार्मिक दृष्टि से माना जाता है कि जनेऊ धारण करने से शरीर शुद्घ और पवित्र होता है।

जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से जनेऊ स्वास्थ्य और पौरुष के लिए बहुत ही लाभकारी होता है। यह हृदय रोग की संभावना को कम करता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दाएं कान की नस अंडकोष और गुप्तेन्द्रियों से जुड़ा होता है।

मूत्र विसर्जन के समय दाएं कान पर जनेऊ लपेटने से शुक्र की रक्षा होती है। जिन पुरुषों को बार-बार बुरे स्वप्न आते हैं उन्हें सोते समय कान पर जनेऊ लपेट कर सोना चाहिए। माना जाता है कि इससे बुरे स्वप्न की समस्या से मुक्ति मिल जाती है।

कान पर जनेऊ लपेटने से पेट संबंधी रोग एवं रक्तचाप की समस्या से भी बचाव होता है। माना जाता है कि शरीर के पृष्ठभाग में पीठ पर जाने वाली एक प्राकृतिक रेखा है जो विद्युत प्रवाह की तरह काम करती है।

यह रेखा दाएं कंधे से लेकर कमर तक स्थित है। जनेऊ धारण करने से विद्युत प्रवाह नियंत्रित रहता है जिससे काम-क्रोध पर नियंत्रण रखने में आसानी होती है।


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Wednesday, April 16, 2014

खाटूश्यामजी कलियुग मे कृष्ण का अवतार है,


http://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%96%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%82%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%9C%E0%A5%80

FROM WIKI PEDIA 

हिन्दू धर्म के अनुसार, खाटूश्यामजी कलियुग मे कृष्ण का अवतार है, जिन्होनें श्री कृष्ण से वरदान प्राप्त किया था कि वे कलियुग में उनके नाम से पूजे जायेंगे। कृष्ण बर्बरीक के महान बलिदान से काफ़ी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि जैसे जैसे कलियुग का अवतरण होगा, तुम श्याम के नाम से पूजे जाओगे। तुम्हारे भक्तों का केवल तुम्हारे नाम का सच्चे दिल से उच्चराण मात्र से ही उद्धार होगा। यदि वे तुम्हारी सच्चे मन और प्रेमभाव रखकर पूजा करेंगे तो उनकी सभी मनोकामना पूर्ण होगी और सभी कार्य सफ़ल होंगे।

श्याम बाबा की अपूर्व कहानी मध्यकालीन महाभारत से आरम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे महान पान्डव भीम के पुत्रघटोतकच्छ और नाग कन्या मौरवी के पुत्र है। बाल्यकाल से ही वे बहुत वीर और महान यौद्धा थे। उन्होने युद्ध कला अपनी माँ से सीखी। भगवान शिव की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अभेध्य बाण प्राप्त किये और तीन बाणधारी का प्रसिद्ध नाम प्राप्त किया। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया, जो कि उन्हें तीनो लोकों में विजयी बनाने में समर्थ थे।
महाभारत का युद्ध कौरवों और पाण्डवों के मध्य अपरिहार्य हो गया था, यह समाचार बर्बरीक को प्राप्त हुये तो उनकी भी युद्ध में सम्मिलित होने की इच्छा जाग्रत हुयी। जब वे अपनी माँ से आशीर्वाद प्राप्त करने पहुंचे तब माँ को हारे हुये पक्ष का साथ देने का वचन दिया। वे अपने लीले घोडे, जिसका रंग नीला था, पर तीन बाण और धनुष के साथ कुरूक्षेत्र की रणभुमि की और अग्रसर हुये।
सर्वव्यापी कृष्ण ने ब्राह्मण वेश धारण कर बर्बरीक से परिचित होने के लिये उसे रोका और यह जानकर उनकी हंसी भी उडायी कि वह मात्र तीन बाण से युद्ध में सम्मिलित होने आया है। ऐसा सुनने पर बर्बरीक ने उत्तर दिया कि मात्र एक बाण शत्रु सेना को ध्वस्त करने के लिये पर्याप्त है और ऐसा करने के बाद बाण वापिस तरकस में ही आयेगा। यिद तीनो बाणों को प्रयोग में लिया गया तो तीनो लोकों में हाहाकार मच जायेगा। इस पर कृष्ण ने उन्हें चुनौती दी की इस पीपल के पेड के सभी पत्रों को छेद कर दिखलाओ, जिसके नीचे दोनो खडे थे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तुणीर से एक बाण निकाला और इश्वर को स्मरण कर बाण पेड के पत्तो की और चलाया।
तीर ने क्षण भर में पेड के सभी पत्तों को भेद दिया और कृष्ण के पैर के इर्द-गिर्द चक्कर लगाने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होनें अपने पैर के नीचे छुपा लिया था, बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पैर को हटा लीजिये वर्ना ये आपके पैर को चोट पहुंचा देगा। कृष्ण ने बालक बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस और से सम्मिलित होगा तो बर्बरीक ने अपनी माँ को दिये वचन दोहराये कि वह युद्ध में जिस और से भाग लेगा जो कि निर्बल हो और हार की और अग्रसर हो। कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार तो कौरवों की ही निश्चित है, और इस पर अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम उनके पक्ष में ही होगा।
ब्राह्मण ने बालक से दान की अभिलाषा व्यक्त की, इस पर वीर बर्बरीक ने उन्हें वचन दिया कि अगर वो उनकी अभिलाषा पूर्ण करने में समर्थ होगा तो अवश्य करेगा. कृष्ण ने उनसे शीश का दान मांगा। बालक बर्बरीक क्षण भर के लिये चकरा गया, परन्तु उसने अपने वचन की द्डता जतायी। बालक बर्बरीक ने ब्राह्मण से अपने वास्तिवक रूप से अवगत कराने की प्रार्थना की और कृष्ण के बारे में सुन कर बालक ने उनके विराट रूप के दर्शन की अभिलाषा व्यक्त की, कृष्ण ने उन्हें अपना विराट रूप दिखाया।
उन्होनें बर्बरीक को समझाया कि युद्ध आरम्भ होने से पहले युद्धभूमीं की पूजा के लिये एक वीर्यवीर क्षत्रिय के शीश के दान की आवश्यक्ता होती है, उन्होनें बर्बरीक को युद्ध में सबसे वीर की उपाधि से अलंकृत किया, अतैव उनका शीश दान में मांगा. बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, श्री कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। फाल्गुन माह की द्वादशी को उन्होनें अपने शीश का दान दिया। उनका सिर युद्धभुमि के समीप ही एक पहाडी पर सुशोभित किया गया, जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।
युद्ध की समाप्ति पर पांडवों में ही आपसी खींचाव-तनाव हुआ कि युद्ध में विजय का श्रेय किसको जाता है, इस पर कृष्ण ने उन्हें सुझाव दिया कि बर्बरीक का शीश सम्पूर्ण युद्ध का साक्षी है अतैव उससे बेहतर निर्णायक भला कौन हो सकता है। सभी इस बात से सहमत हो गये। बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि कृष्ण ही युद्ध मे विजय प्राप्त कराने में सबसे महान पात्र हैं, उनकी शिक्षा, उनकी उपस्थिति, उनकी युद्धनीति ही निर्णायक थी। उन्हें युद्धभुमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखायी दे रहा था जो कि शत्रु सेना को काट रहा था, महाकाली दुर्गा कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना के रक्त से भरे प्यालों का सेवन कर रही थीं।
कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है।

योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को रणभूमि में प्रकट हुई १४ देवियों ( सिद्ध, अम्बिका, कपाली, तारा, भानेश्वरी, चर्ची, एकबीरा, भूताम्बिका, सिद्धि, त्रेपुरा, चंडी, योगेश्वरी, त्रिलोकी, जेत्रा) के द्वारा अमृतसे सिंचित करवा कर उस शीश को देवत्व प्रदान करके अजर अमर कर दिया... एवं भगवान श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के शीश को कलियुग में देव रूप में पूजित होकर भक्तों की मनोकामनाओ को पूर्ण करने का वरदान दिया... वीर बर्बरीक ने भगवान श्रीकृष्ण के समक्ष महाभारत के युद्ध देखने की अपनी प्रबल इच्छा को बताया जिसे श्रीकृष्ण ने वीर बर्बरीक के देवत्व प्राप्त शीश को ऊंचे पर्वत पर रखकर पूर्ण की... एवं उनके धड़ काअंतिम संस्कार शास्त्रोक्त विधि से सम्पूर्ण करवाया...

उनका शीश खाटू में दफ़नाया गया। एक बार एक गाय उस स्थान पर आकर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी, बाद में खुदायी के बाद वह शीश प्रगट हुआ, जिसे कुछ दिनों के लिये एक ब्राह्मण को सुपुर्द कर दिय गया। एक बार खाटू के राजा को स्वप्न में मन्दिर निर्माण के लिये और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिये प्रेरित किया गया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनाया गया था. मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर १७२० ई० में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया. मंदिर इस समय अपने वर्तमान आकार ले लिया और मूर्ति गर्भगृह में प्रतिष्ठापित किया गया था. मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बना है. खाटूश्याम परिवारों की एक बड़ी संख्या के परिवार देवता है.-- 

...

महाभारत युद्ध की समाप्ति पर महाबली श्री भीमसेन को यह अभिमान हो गया कि, यह महाभारत का युद्ध केवल उनके पराक्रम से जीता गया है, तब श्री अर्जुन ने कहा कि, वीर बर्बरीक के शीश से पूछा जाये की उसने इस युद्ध में किसका पराक्रम देखा है.... तब वीर बर्बरीक के शीश ने महाबली श्री भीमसेन का मान मर्दन करते हुए उत्तर दिया की यह युद्ध केवल भगवान श्रीकृष्ण की निति के कारण जीता गया.... और इस युद्ध में केवल भगवान श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र चलता था, अन्यत्र कुछ भी नहीं था... वीर बर्बरीक के द्वारा ऐसा कहते ही समस्त नभ मंडल उद्भाषित हो उठा... एवं उस देव स्वरुप शीश पर पुष्प की वर्षा होने लगी... देवताओं की दुदुम्भिया बज उठी... तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने पुनः वीर बर्बरीक के शीश को प्रणाम करते हुए कहा - "हे वीर बर्बरीक आप कलिकाल में सर्वत्र पूजित होकर अपने सभी भक्तो के अभीष्ट कार्य को पूर्ण करोगे... अतएव आपको इस क्षेत्र का त्याग नहीं करना चाहिये, हम लोगो से जो भी अपराध हो गए हो, उन्हें कृपा कर क्षमा कीजिये"

इतना सुनते ही पाण्डव सेना में हर्ष की लहर दौड गयी... सैनिको ने पवित्र तीर्थो के जल से शीश को पुनः सिंचित किया और अपनी विजय ध्वजाएँ शीश के समीप फहराई... इस दिन सभी ने महाभारत का विजय पर्व धूमधाम से मनाया।

वीरवर मोरवीनंदन श्री बर्बरीक जी का चरित्र स्कन्द पुराण के "माहेश्वर खंड के अंतर्गत द्वितीय उपखंड 'कौमारिक खंड'" में सुविस्तार पूर्वक दिया हुआ है। ऋषि वेदव्यास जी ने स्कन्द पुराण में "माहेश्वर खंड के द्वितीय उपखंड कौमरिका खंड" के ६६ वें अध्याय के ११५वे एवं ११६वे श्लोक में इनकी स्तुति इस आलौकिक स्त्रोत्र से भी की है।
पाण्डवकुलभूषण मोरवीनंदन खाटूश्याम
दादा का नाम : महाबली भीमसेन
दादी का नाम : हिडिंबा
पिता का नाम : महाबली घटोत्कच
माता का नाम : कामकटंककटा (मोरवी)
अस्त्र  : तीन अमोघ बाण, धनुष
वाहन  : नीला घोड़ा
पाठ्य  : स्कन्द पुराण (कौमारिका खंड)
सीकर जिला , राजस्थान में खाटू श्याम जी मंदिर

Tuesday, April 15, 2014

विभिन्न देवी-देवताओं के लिये गायत्री मन्त्र

गणेश गायत्री

एकदंताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात् ।। 

महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।। 

गजाननाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दंती प्रचोदयात्।।

ब्रह्मा गायत्री


ओं वेदात्मने विद्महे, हिरण्यगर्भाय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।। ओं चतुर्मुखाय विद्महे, कमण्डलु धाराय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।। ओं परमेश्वर्याय विद्महे, परतत्वाय धीमहि, तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात् ।।

शिव गायत्री


ओं तत्पुरुषाय विद्महे, महादेवाय धीमहि, तन्नो रुद्र: प्रचोदयात् ।।

विष्णु गायत्री


नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्। ।।

कृष्ण गायत्री


ओं देवकीनन्दनाय विद्महे, वासुदेवाय धीमहि, तन्न: कृष्ण: प्रचोदयात् ।।

सूर्य गायत्री


आदित्याय विद्महे मार्तण्डाय धीमहि तन्नः सूर्यः प्रचोदयात् ।।

नारायण गायत्री

त्रैलोक्य-मोहनाय विद्महे काम-देवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात् ।।


हनुमान गायत्री

ओं आञ्जनेयाय विद्महे, वायुपुत्राय धीमहि, तन्नो हनुमान् प्रचोदयात् ।। ओं वायुपुत्राय विद्महे, रामदूताय धीमहि, तन्नो 


दुर्गा गायत्री


महा देव्यै विद्महे दुर्गायै धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ।।

अग्नि गायत्री


ओं महा ज्वालाया विधमहे, अग्नि देवाय धीमहि, तन्नो अग्नि प्रचोदयात् ।। ओं विश्वनाराय विधमहे, लालीलाय 
धीमहि, तन्नो अग्नि प्रचोदयात् ।।

KAALI GAAYATREE

काली गायत्री


ओं कालिकायै च विद्महे, स्मशानवासिन्यै धीमहि, तन्नो घोरा प्रचोदयात् ।।

लक्ष्मी गायत्री

महा लक्ष्म्यै विद्महे महा - श्रियै धीमहि तन्नः श्रीः प्रचोदयात् 

सरस्वती गायत्री


वाग्देव्यै विद्महे काम- राजाय धीमहि तन्नो देवी प्रचोदयात् ।।

तुलसी गायत्री


ओं तुलसीदेव्यै च विद्महे, विष्णुप्रियायै च धीमहि, तन्नो ब्रिन्दा प्रचोदयात् ।।

सीता गायत्री



ओं जनकनन्दिंयै विद्महे, भूमिजयै धीमहि, तन्नो सीता प्रचोदयात् ।।

नरसिंह गायत्री

ओम नरसिंहया विद्महे, वज्रा नखाया धीमहि. तन्नो नरसिंहः प्रचोदयात्. ।।

कुबेर गायत्री

ओं यक्षा राजाया विद्महे, वैशरावनाया धीमहि, तन्नो कुबेराह प्रचोदयात् ।।

भूमि देवी गायत्री


ओं वसुंधराया विद्महे, भूतधतराया धीमहि, तन्नो भूमिः प्रचोदयात् ।।

कामदेव गायत्री


ओं कामदेवाया विद्महे, पुष्पा बनाया धीमहि, तन्नो अनंगहा प्रचोदयात् ।।

श्री दक्षिणामूर्थ्य गायत्री


ओं दक्षिणामूर्तये विद्महे ध्यानस्थया धीमहि, तन्नो ढीशा: प्रचोदयात् ।।

शक्ति गायत्री


ओं सर्वसंमोहिन्यै विद्महे, विश्वजनन्यै धीमहि, तन्नो शक्ति प्रचोदयात् ।।

नन्दिकेश्वरा गायत्री


ओं तत्पुरूषाय विद्महे, नन्दिकेश्वराय धीमहि, तन्नो वृषभ: प्रचोदयात् ।।

धनवन्त्री गायत्री


ओं अमुद हस्ताय विद्महे, आरोग्य अनुग्रहाय धीमहि, तन्नो धनवन्त्री प्रचोदयात् ।।

शिरडी साइ गायत्री


ओं शिरडी वासाया विधमाहे, सच्चिदानन्द धीमहि, तन्नो साइ प्रचोदयात् ।।


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