Friday, February 14, 2014

Significance of Magh Purnima 2014 -

from - 
www.onlineprasad.com


According to Brahma Vaivarta Purana, Lord Vishnu resides in the water on Ganges on this day. Hence, it is believed that even touching the holy water of Ganges on this day provides salvation. Magh Purnima provides a person with success, peace of mind and salvation. It  is one of the most also beneficial day for holistic bath in river Ganga, Yamuna and Saraswati. Makes you free from all kinds of sins and problem. It also provides peace of mind and purity. Charity on Magha purnima gives a remarkable significance and also gives the fruitful bliss. 

You should observe fast. Wake up early and take bath in a nearby river before sunrise. If taking bath in a river is not possible add some amount of Gangajal in water while bath and chant maa Ganga name. Worship Lord Vishnu, hanumanji and Lord Satyanarayan. Donate food, clothes, jaggery, ghee, laddoo, fruits, cereals etc.. Taking part in Puja, charities and yagyas organized on this day are considered to be very important. Donating sesame seeds is considered to be very important during this month. At many places and temples Lord Satyanarayana’s katha is organized. You should try to listen this katha or take part in organising it. Ancestor rituals i.e offering tarpan is also performed on this day. In evening offer ardhy to Moon. - 

Mantra while offering ardhya to Moon
वसंतबान्धव विभो शीतांशो स्वस्ति न: कुरु।
गगनार्णवमाणिक्य चन्द्र दाक्षायणीपते।।


http://blog.onlineprasad.com/magh-purnima-2014-puja-vidhi-and-mantra/?utm_source=OnlinePrasad+Sign-ups&utm_campaign=e1659fc9d4-140210_Jaya_Ekadashi&utm_medium=email&utm_term=0_27bd47a9ee-e1659fc9d4-65896581

Friday, January 31, 2014

माघ मास की गुप्त नवरात्रि का प्रारंभ

AN ARTICLE FROM - www.bhaskar.com

31 जनवरी 2014, शुक्रवार से माघ मास की गुप्त नवरात्रि का प्रारंभ हो रहा है, इसका समापन 8 फरवरी, शनिवार को होगा। गुप्त नवरात्रि में हर दिन देवी के विभिन्न रूप की पूजा की जाती है। इन नौ दिनों में विविध प्रकार की पूजा से माता को प्रसन्न किया जाता है। गुप्त नवरात्रि में देवी को विभिन्न प्रकार के भोग लगाए जाते हैं। 
शास्त्रों के अनुसार प्रतिपदा से लेकर नौ तिथियों में देवी को विशिष्ट भोग अर्पित करने तथा ये ही भोग गरीबों को दान करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं व साधक को धन की कभी कमी नहीं होती। यदि आप भी इस मौके का लाभ उठाना चाहते हैं तो आगे की स्लाइड्स पर क्लिक कीजिए और जानिए गुप्त नवरात्रि में किस तिथि पर देवी मां को किस चीज का भोग लगाएं। 

प्रतिपदा (31 जनवरी, शुक्रवार) को माता को घी का भोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे रोगी को कष्टों से मुक्ति मिलती है तथा वह निरोगी होता है।
- द्वितीया (1 फरवरी, शनिवार) को माता को शक्कर काभोग लगाएं तथा उसका दान करें। इससे साधक को दीर्घायु प्राप्त होती है।
- तृतीया (2 फरवरी, रविवार) को माता को दूध चढ़ाएं तथा इसका दान करें। ऐसा करने से सभी प्रकार के दु:खों से मुक्ति मिलती है।

चतुर्थी(3 फरवरी, सोमवार) को मालपूआ चढ़ाकर दान करें। इससे सभी प्रकार की समस्याएं स्वत: ही समाप्त हो जाती हैं।
- पंचमी तिथि (4 फरवरी, मंगलवार) को माता दुर्गा को केले का भोग लगाएं  व गरीबों को केले का दान करें। इससे आपके परिवार में सुख-शांति रहेगी। 
- षष्ठी तिथि (5 फरवरी, बुधवार) के दिन माता दुर्गा को शहद का भोग लगाएं व इसका दान भी करें। इस उपाय से गरीब भी मालामाल हो जाता है।



 सप्तमी (6 फरवरी, गुरुवार) को माता को गुड़ की वस्तुओं का भोग लगाएं तथा दान भी करें। इससे दरिद्रता का नाश होता है।
- अष्टमी (7 फरवरी, शुक्रवार) को नारियल का भोग लगाएं तथा नारियल का दान भी करें। इससे सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
- नवमी (8 फरवरी, शनिवार) को माता को विभिन्न प्रकार के अनाजों का भोग लगाएं व यथाशक्ति गरीबों में दान करें। इससे लोक-परलोक में आनंद व वैभव मिलता है।



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Monday, January 13, 2014

14th January - 2014- Makar Sankranti

http://onlineprasad.com/products/prasad-shani-shingnapur-tailabhishekam

AN ARTICLE FROM - 

www.onlineprasad.com




Makar Sankranti is dedicated to worship of Surya Dev - Father of lord Shani. This day marks the “holy phase of transition”. Sun changes its celestial path and enters into the Makar Rashi from Dhanu Rashi.


Hence paying homage to Shani dev on this day is considered highly auspicious.


Makar Sankranti is a symbol of 
  • Spiritual enlightenment, 
  • Peace, prosperity and happiness.
  • It is a day to perform Charity. And we all know that charity please Lord Shani.

Significance of Pious day of Makar Sankranti
Bonding Between Father and Son 

Surya visits the house of his son Saturn (the lord of Makar rashi or Capricorn) for a month on this day. Therefore this day also enhance the importance of the special bonding between the father and the son.

End of Negativity

On this very day, Lord Vishnu put an end to the increasing terror of the demons by demolishing them and burying their heads under the Mandara Parvata. Therefore Makar Sankaranti also represents the end of ‘negativity’ and beginning of an era of righteous living.


Monday, December 30, 2013

शरीर के चक्रों को जाग्रत कैसे करे?

AN ARTICLE SELECTED FROM WEB DUNIA, INDORE - अद्भुत आलेख


1. मूलाधार चक्र : 

यह शरीर का पहला चक्र है। गुदा और लिंग के बीच चार पंखुरियों वाला यह 'आधार चक्र' है। 99.9% 

लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है और वे इसी चक्र में रहकर मर जाते हैं। जिनके जीवन में भोग, संभोग और निद्रा की प्रधानता है उनकी ऊर्जा इसी चक्र के आसपास एकत्रित रहती है।

मंत्र : लं

चक्र जगाने की विधि : मनुष्य तब तक पशुवत है, जब तक कि वह इस चक्र में जी रहा है इसीलिए 
भोग, निद्रा और संभोग पर संयम रखते हुए इस चक्र पर लगातार ध्‍यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने
लगता है। इसको जाग्रत करने का दूसरा नियम है यम और नियम का पालन करते हुए साक्षी भाव में रहना।

प्रभाव : इस चक्र के जाग्रत होने पर व्यक्ति के भीतर वीरता, निर्भीकता और आनंद का भाव जाग्रत हो जाता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए वीरता, निर्भीकता और जागरूकता का होना जरूरी है। 





2. स्वाधिष्ठान चक्र-

यह वह चक्र है, जो लिंग मूल से चार अंगुल ऊपर स्थित है जिसकी छ: पंखुरियां हैं। अगर आपकी ऊर्जा इस चक्र पर ही एकत्रित है तो आपके जीवन में आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, घूमना-फिरना और मौज-मस्ती करने की प्रधानता रहेगी। यह सब करते हुए ही आपका जीवन कब व्यतीत हो जाएगा आपको पता भी नहीं चलेगा और हाथ फिर भी खाली रह जाएंगे।

मंत्र : वं

कैसे जाग्रत करें : जीवन में मनोरंजन जरूरी है, लेकिन मनोरंजन की आदत नहीं। मनोरंजन भी व्यक्ति की चेतना को बेहोशी में धकेलता है। फिल्म सच्ची नहीं होती लेकिन उससे जुड़कर आप जो अनुभव करते हैं वह आपके बेहोश जीवन जीने का प्रमाण है। नाटक और मनोरंजन सच नहीं होते।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने पर क्रूरता, गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवज्ञा, अविश्वास आदि दुर्गणों का नाश 

होता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि उक्त सारे दुर्गुण समाप्त हो तभी सिद्धियां आपका द्वार खटखटाएंगी।

3. मणिपुर चक्र :

नाभि के मूल में स्थित रक्त वर्ण का यह चक्र शरीर के अंतर्गत मणिपुर नामक तीसरा चक्र है, जो दस 

कमल पंखुरियों से युक्त है। जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा यहां एकत्रित है उसे काम करने की धुन-सी
रहती है। ऐसे लोगों को कर्मयोगी कहते हैं। ये लोग दुनिया का हर कार्य करने के लिए तैयार रहते हैं।

मंत्र : रं

कैसे जाग्रत करें : आपके कार्य को सकारात्मक आयाम देने के लिए इस चक्र पर ध्यान लगाएंगे। पेट से श्वास लें।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने से तृष्णा, ईर्ष्या, चुगली, लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष दूर हो 

जाते हैं। यह चक्र मूल रूप से आत्मशक्ति प्रदान करता है। सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आत्मवान होना 
जरूरी है। आत्मवान होने के लिए यह अनुभव करना जरूरी है कि आप शरीर नहीं, आत्मा हैं। 
आत्मशक्ति, आत्मबल और आत्मसम्मान के साथ जीवन का कोई भी लक्ष्य दुर्लभ नहीं।



4. अनाहत चक्र- 

हृदय स्थल में स्थित स्वर्णिम वर्ण का द्वादश दल कमल की पंखुड़ियों से युक्त द्वादश स्वर्णाक्षरों से 

सुशोभित चक्र ही अनाहत चक्र है। अगर आपकी ऊर्जा अनाहत में सक्रिय है, तो आप एक सृजनशील
व्यक्ति होंगे। हर क्षण आप कुछ न कुछ नया रचने की सोचते हैं। आप चित्रकार, कवि, कहानीकार, 
इंजीनियर आदि हो सकते हैं।

मंत्र : यं

कैसे जाग्रत करें : हृदय पर संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है। खासकर 

रात्रि को सोने से पूर्व इस चक्र पर ध्यान लगाने से यह अभ्यास से जाग्रत होने लगता है और सुषुम्ना 
इस चक्र को भेदकर ऊपर गमन करने लगती है।

प्रभाव : इसके सक्रिय होने पर लिप्सा, कपट, हिंसा, कुतर्क, चिंता, मोह, दंभ, अविवेक और अहंकार 

समाप्त हो जाते हैं। इस चक्र के जाग्रत होने से व्यक्ति के भीतर प्रेम और संवेदना का जागरण होता है।
इसके जाग्रत होने पर व्यक्ति के समय ज्ञान स्वत: ही प्रकट होने लगता है।व्यक्ति  अत्यंत आत्मविश्वस्त, सुरक्षित, चारित्रिक रूप से जिम्मेदार एवं भावनात्मक रूप से संतुलित  व्यक्तित्व बन जाता हैं। ऐसा व्यक्ति अत्यंत हितैषी एवं बिना किसी स्वार्थ के मानवता प्रेमी एवं सर्वप्रिय बन जाता है।

5. विशुद्ध चक्र-

कंठ में सरस्वती का स्थान है, जहां विशुद्ध चक्र है और जो सोलह पंखुरियों वाला है। सामान्यतौर पर 
यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र के आसपास एकत्रित है तो आप अति शक्तिशाली होंगे।

मंत्र : हं

कैसे जाग्रत करें : कंठ में संयम करने और ध्यान लगाने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव : इसके जाग्रत होने कर सोलह कलाओं और सोलह विभूतियों का ज्ञान हो जाता है। इसके जाग्रत 

होने से जहां भूख और प्यास को रोका जा सकता है वहीं मौसम के प्रभाव को भी रोका जा सकता है।
6. आज्ञाचक्र :

भ्रूमध्य (दोनों आंखों के बीच भृकुटी में) में आज्ञा चक्र है। सामान्यतौर पर जिस व्यक्ति की ऊर्जा यहां 
ज्यादा सक्रिय है तो ऐसा व्यक्ति बौद्धिक रूप से संपन्न, संवेदनशील और तेज दिमाग का बन जाता है 
लेकिन वह सब कुछ जानने के बावजूद मौन रहता है। इस बौद्धिक सिद्धि कहते हैं।

मंत्र : ऊं

कैसे जाग्रत करें : भृकुटी के मध्य ध्यान लगाते हुए साक्षी भाव में रहने से यह चक्र जाग्रत होने लगता है।

प्रभाव : यहां अपार शक्तियां और सिद्धियां निवास करती हैं। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से ये सभी 

शक्तियां जाग पड़ती हैं और व्यक्ति एक सिद्धपुरुष बन जाता है।

7. सहस्रार चक्र : 

सहस्रार की स्थिति मस्तिष्क के मध्य भाग में है अर्थात जहां चोटी रखते हैं। यदि व्यक्ति यम, नियम 
का पालन करते हुए यहां तक पहुंच गया है तो वह आनंदमय शरीर में स्थित हो गया है। ऐसे व्यक्ति को 
संसार, संन्यास और सिद्धियों से कोई मतलब नहीं रहता है।

कैसे जाग्रत करें : 


मूलाधार से होते हुए ही सहस्रार तक पहुंचा जा सकता है। लगातार ध्यान करते रहने से यह चक्र जाग्रत 
हो जाता है और व्यक्ति परमहंस के पद को प्राप्त कर लेता है।

प्रभाव : शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्वपूर्ण विद्युतीय और जैवीय विद्युत का संग्रह है। यही मोक्ष का द्वार है।



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Tuesday, December 24, 2013

शरीर की वास्तु -पंच-तत्व शरीर को स्वस्थ बनाए रखते हैं


शरीर की वास्तु -पंच-तत्व शरीर को स्वस्थ बनाए रखते हैं

योगाचार्य सुरक्षित गोस्वामी
अद्भुत आलेख

शरीर पांच तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु व आकाश- से मिलकर बना है। ये तत्व शरीर को धारण किए हुए उसे स्वस्थ बनाए रखते हैं। जब इन तत्वों में से किसी एक की शक्ति कम होती है या वह तत्व मलयुक्त हो जाता है, तो उससे अनेक बीमारियां होने लगती हैं। प्रत्येक तत्व अपना-अपना कार्य करता है, जिससे उसका मल भी बनता रहता है। मल का अर्थ है जो शरीर को मलिन कर दे, अर्थात् जिन पदार्थों को शरीर के अंग अंदर से त्याग दें, वही मल है। अंगों द्वारा त्याग देने के बाद भी यदि वह मल शरीर में रुक जाए, तो शरीर दूषित होकर रोगी हो जाता है। इसलिए, स्वस्थ रहने के लिए जरूरी है कि ये सभी मल सही प्रकार से समयानुसार शरीर से बाहर निकलते रहें।

हमारी प्रातः कालीन दिनचर्या इन मलों को बाहर निकालने की एक प्रक्रिया है। दिनचर्या में सुबह सबसे पहले शौच के लिए जाते हैं और मल-मूत्र त्याग करते हैं। मल को पुरीष भी कहा जाता है। यह पृथ्वी तत्व का मल है और मूत्र जल तत्व का मल होता है। मल त्याग करने के पश्चात आसन, प्राणायाम, व्यायाम, टहलना या अन्य शारीरिक कसरतें करते हैं। इनसे वायु तत्व का मल, जैसे कार्बन डाइआक्साइड इत्यादि विषाक्त वायु बाहर निकल जाती है। स्नान करने से शरीर से दूषित गर्मी निकल जाती है, जिससे अग्नि तत्व का मल बाहर निकल जाता है। इसके पश्चात पूजा-पाठ, ध्यान, जप, प्रभु स्मरण, भजन, सत्संग आदि करते हैं, तो आकाश तत्व का मल अर्थात् नकारात्मक विचार मन से बाहर निकल जाते हैं। इस प्रकार सुबह ही अपने पांचों तत्वों के मलों को बाहर निकाल कर हम अपने तन-मन को स्वस्थ रखते हैं। यदि ये पांचों मल सही प्रकार से शरीर से बाहर न निकलें, तो शरीर विषाक्त व मलिन हो जाता है और शरीर में अनेक प्रकार की बीमारियां उत्पन्न होने लगती हैं।

अगर पृथ्वी तत्व का मल-पुरीष-ठीक प्रकार से बाहर न निकले तो कब्ज, अपच, गैस, भूख न लगना, डकारें, मोटापा, बवासीर, रक्तदोष, चर्मरोग, थकान, उदासी, सुस्ती, जोड़ों का दर्द, सिर दर्द, भारीपन, नेत्र ज्योति कम होना, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, बालों के रोग, धातु रोग, स्वप्नदोष, नपुंसकता इत्यादि रोग हो सकते हैं। इसी प्रकार जल तत्व का मल अर्थात् मूत्र अगर सही प्रकार से बाहर न निकले, तो शरीर में टॉक्सिन्स बढ़ने लगते हैं और मूत्राशय व किडनी के रोग हो सकते हैं।


स्नान न करने से अग्नि तत्व का मल बाहर नहीं निकल पाता, जिससे शरीर में जलन, पसीने में बदबू, शरीर में भारीपन, रोग प्रतिरोधक शक्ति का कम होना, रोमकूपों व मलमार्गों की सफाई न होने के कारण त्वचा रोग, इंद्रियों के दोष, तरोताजगी का अभाव, भूख न लगना, बल की कमी आदि रोग हो सकते हैं।

यदि आसन, प्राणायाम, व्यायाम, टहलना आदि शारीरिक अभ्यास न किए जाएं, तो वायु तत्व का मल-दूषित वायु-शरीर से बाहर नहीं निकल पाती। इससे श्वास रोग, अस्थमा, हृदय रोग, रक्त विकार, चर्म रोग, किडनी के रोग, कोशिकाओं की क्षतिपूर्ति न होना, स्मरण शक्ति की कमी, आलस्य, उबासी, जोड़ों के दर्द आदि रोग हो जाते हैं।

इसी प्रकार, यदि प्रातः काल पूजा-पाठ, जप, ध्यान, योग, सत्संग आदि के लिए समय न निकाला जाए, तो आकाश तत्व का मल मन में रुक जाता है और नकारात्मक विचारधारा, तनाव, चिंता, चिड़चिड़ापन, डिप्रेशन, उच्च रक्तचाप, उद्विग्नता, क्रोध, अनिद्रा, असंतोष, हिंसा, चंचलता, धैर्य व स्मरण शक्ति की कमी, अभिमान आदि विकार हो जाते हैं।
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