Thursday, November 8, 2012

अपने जीवन तथा भविष्य को बेह्तर कैसे बनाये ?

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अपने जीवन तथा भविष्य को बेह्तर कैसे बनाये ?


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Sunday, November 4, 2012

तिलक लगाने का महत्व :-



BY ASTROLOGER 

"SHRI KAUSHAL PANDEY" 

ON FACE BOOK


हिंदुत्व की असली पहचान है तिलक , तिलक लगाने से समाज में मस्तिस्क हमेशा गर्व से ऊँचा होता है , 

समाज में अपनी एक अलग पहचान बनानी हो तो करे आज से ही माथे पर तिलक और दूसरों को भी 

उत्साहित करे ,क्योंकी ये हमारे प्राचीन धर्म का गौरव है .. साथ ही हमारेवैष्णव संप्रदाय में तिलक को लगाने 

की परंपरा के पीछे यह बताया जाता है कि वैष्णव लोग तो श्री हरि के पदचिहों को अपने मस्तक पर धारण 


करते हैं। उनके मत में तिलक और कुछ नहीं, विष्णु के चरण चिन्ह ही हैं। तिलक का आकार अलग-अलग 

संप्रदायों ने अलग-अलग ढंग से प्रकट किया है, इसलिए कैसे भी तिलक करे लेकिन अवश्य करे ..

इसके पीछे आध्यात्मिक महत्व है। दरअसल, हमारे शरीर में सात सूक्ष्म ऊर्जा केंद्र होते हैं, जो अपार शक्ति के 

भंडार हैं। इन्हें चक्र कहा जाता है। माथे के बीच में जहां तिलक लगाते हैं, वहां आज्ञाचक्र होता हैयह चक्र हमारे 

शरीर का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है, जहां शरीर की प्रमुख तीन नाडि़यां इड़ा, पिंगला व सुषुम्ना आकर मिलती 

हैं, इसलिए इसे त्रिवेणी या संगम भी कहा जाता है। यह गुरु स्थान कहलाता है। यहीं से पूरे शरीर का संचालन 

होता है। यही हमारी चेतना का मुख्य स्थान भी है। इसी को मन का घर भी कहा जाता है। इसी कारण यह 

स्थान शरीर में सबसे ज्यादा पूजनीय है। योग में ध्यान के समय इसी स्थान पर मन को एकाग्र किया जाता है.

तिलक हिंदू संस्कृति में एक पहचान चिन्ह का काम करता है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है बल्कि 


इसके कई वैज्ञानिक कारण भी हैं हिंदू धर्म में जितने संतों के मत हैं, जितने पंथ है, संप्रदाय हैं उन सबके अपने 

अलग-अलग तिलक होते हैं। तंत्र शास्त्र में पंच गंध या अस्ट गंध से बने तिलक लगाने का बड़ा ही महत्व है , 

तंत्र शास्त्र में शरीर के तेरह  भागों पर तिलक करने की बात कही गई है, लेकिन समस्त शरीर का संचालन 

मस्तिष्क करता है, इसलिए इस पर तिलक करने की परंपरा अधिक प्रचलित है। तिलक लगाने में सहायक 

हाथ की अलग-अलग  अंगुलियों का भी अपना महत्व है।



क्या है मस्तक पर तिलक लगाने का महत्व..?


हमारे दोनों भोहों के मध्य में आज्ञाचक्र होता है, इस चक्र में सूक्ष्म द्वार होता है जिससे इष्ट और अनिष्ट दोनों ही

शक्ति प्रवेश कर सकती है, यदि इस सूक्ष्म प्रवेश द्वार को हम सात्त्विक पदार्थ का लेप एक विशेष रूप में दें तो 

इससे ब्रह्माण्ड में व्याप्त इष्टकारी शक्ति हमारे पिंड में आकृष्ट होती है और इससे हमारा अनिष्टकारी शक्तियों से 

रक्ष भी होती है | बिना तिलक धारण किए कोई भी पूजा-प्रार्थना शुरू नहीं होती है। मान्यताओं के अनुसार सूने 

मस्तक को शुभ नहीं माना जाता। माथे पर चंदन, रोली, कुमकुम, सिंदूर या भस्म का तिलक लगाया जाता है।



किस अंगुली से लगाये माथे पर तिलक :-


अनामिका शांति दोक्ता, मध्यमायुष्यकरी भवेत्।

अंगुष्छठ:पुष्टिव:प्रोत्त, तर्जनी मोक्ष दायिनी।।

अर्थात्,  तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली मानसिक शांति प्रदान करती है, मध्यमा अंगुली मनुष्य की 

आयु वृद्धि करती है, अंगूठा प्रभाव, ख्याति और आरोग्य प्रदान करता है, इसलिए विजयतिलकअंगूठेसे ही 

करने की परम्परा है। तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है। इसलिए मृतक को तर्जनी से तिलक लगाते हैं।

सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार, अनामिका और अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका अंगुली 

सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है। इसका अर्थ यह है कि साधक सूर्य के समान दृढ, तेजस्वी, निष्ठा-प्रतिष्ठा और 

सम्मान वाला बने। दूसरा अंगूठा है, जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवनी शक्ति का 

प्रतीक है। इससे साधक के जीवन में शुक्र के समान ही नव जीवन का संचार होने की मान्यता है।

स्त्रीयों को गोल और पुरुषों को लम्बवत तिलक धारण करना चाहिए। तिलक लगाने से मन शांत रहता है। 

अनिष्टकारी शक्तियों से रक्षण होने के कारण और सात्विकता एवं देवत्व आकृष्ट होने के कारण हमारे चारों ओर 

सूक्ष्म कवच का निर्माण होता है। 



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Friday, November 2, 2012


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Ashutosh Joshi

( Astrologer, Vastu consultant, Gemologist & Palmist )

Friday, October 26, 2012

शरद पूर्णिमा २९ अक्टूबर २०१२ (सोमवार)

GOOD ARTICLE BY
SHREE ARVINDER SINGH
ON FACE BOOK 



शरद पूर्णिमा अश्विन मास में होती है. इसे रास पूर्णिमा भी कहते है और कोजागर पूर्णिमा भी. शरद ऋतु में आमतौर मौसम साफ़ रहता है. आकाश में न तो बादल होते है और न ही धूल के गुब्बार. पुरे वर्ष भर में केवल अश्विन मास की पूर्णिमा का चंद्रमा ही षोडस कलाओं (१६ कलाये) का होता है. कहा जाता है कि इस पूर्णिमा की रात्रि को चंद्रमा अमृत की वर्षा करता है. इस रात्रि में भ्रमण करना और चन्द्र किरणों का शरीर पर पड़ना बहुत ही शुभ माना जाता है. शरद पूर्णिमा की रात को ही भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज -बालाओं के साथ वृन्दावन में महारास किया था. 
इस पावन पर्व में क्या करे जिससे जीवन में खुशहाली आ सके. तो मै आप सब के लिए राशि के आधार पर कुछ बताने की कोशिश कर रहा हु..... 

मेष राशि - सबसे पहले कन्याओं को दूध - खीर खिलाये (कन्या कितनी भी हो सकती है) और मीठे चावल बनाकर, उसमे देसी घी डालकर पक्षियों को दें, लाभ होगा.

वृषभ राशि - दही (दही भी अगर गौ दुग्ध की हो तो उत्तम) और गाय का घी मंदिर में दान करें, लाभ होगा. 

मिथुन राशि - व्रत रख सकते है व एक समय भोजन करें, संध्या समय श्री सत्य नारायण कथा करे या करवाए. दूध - चावल का दान करें. (दूध - चावल कितना भी हो सकता है) लाभ होगा.

कर्क राशि - इस दिन से शुरू करते हुए, लाल चंदन का तिलक माथे पर लगाएं. मिश्री मिला हुआ दूध धार्मिक स्थल में दान दे. लाभ होगा.

सिंह राशि - संध्या समय तुलसी जी के पौधे के पास गाय के घी का दीपक प्रज्ज्वलित करके उसमे दो लौंग डाल दे और जाने - अनजाने में जो गलतियाँ हो गयी है, उनके लिए माफ़ी मांगे और प्रणाम करके सुख शांति का निवेदन करे. धार्मिक स्थल में गुड़ का दान करें. लाभ होगा.

कन्या राशि - इस दिन से शुरू करते हुए माथे पर गोपीचंदन का तिलक लगायें और ९ साल तक की कन्याओं को भोजन में खीर खिलाये. लाभ होगा.

तुला राशि - भगवान् श्री कृष्ण जी की अराधना करें, उनको धूप-दीप के साथ माखन - मिश्री का भोग लगाये और धार्मिक स्थल में दूध, चावल व घी का दान दें. लाभ होगा.

वृश्चिक राशि - इस दिन से शुरू करते हुए, ४० दिन लगातार पीपल वृक्ष के समक्ष धूप-दीप के साथ तिल के तेल का दीपक अर्पित करे और मंगल ग्रह से संबंधित वस्तुओं का दान करे (ये पंडित जी को देना है, जो संकल्प करवा कर लेंगे) तथा ९ साल तक की कन्याओं को दूध - चांदी का दान दें. लाभ होगा.

धनु राशि - इस दिन श्री राधाकृष्ण जी का जहा भी मंदिर हो, वहा पर उनकी मूर्ति के सामने तुलसी जी का पौधा एवं गंगाजल रख कर, धूप-दीप के साथ माखन मिश्री का भोग लगाकर, माफ़ी मांग कर घर वापस आ जाए. धार्मिक स्थल में सवा किलो चने की दाल, सवा मीटर पीले कपड़े में रख कर दान दें. लाभ होगा.

मकर राशि - इस दिन से शुरू करते हुए, ४० दिन लगातार परिवार के सब सदस्यों के साथ, श्री हनुमान बाबा जी के मंदिर जायें, वहा पर धूप-दीप के साथ गुड की मीठी - मोटी रोटी अर्पित करे. ५ बार हनुमान चालीसा का पाठ करे. माफ़ी मांग कर घर वापस आ जाए. सवा किलो चावल साफ़ चलते पानी में बहा दे, संकल्प के साथ. लाभ होगा.

कुम्भ राशि - इस दिन से शुरू करते हुए, ४० दिन श्री हनुमान बाबा जी के मंदिर में लाल चंदन का दान करें, धूप-दीप ज़रूर अर्पित करे और ५ बार हनुमान चालीसा का पाठ कर, घर वापस आ जाए. १० अन्धो को खाना खिलाना विशेष रहेगा. सिर्फ खाना ही खिलाना है, रूपये - पैसे नहीं देने है. लाभ होगा.

मीन राशि - इस दिन बाबा श्री हनुमान जी को चोला अर्पित करे और ब्राह्मणों को जितना हो सके भोजन करवाए और उचित दान दक्षिणा के साथ विदा करे. 

इस दिन हर राशि के व्यक्ति, प्रातः १० बजे पीपल जी की जितनी सेवा हो सके, करे.. क्यूंकि १० बजे माता लक्ष्मी जी का एक बार फेरा ज़रूर लगता है. ऐसा शास्त्रों में कहा है. पूरी रात भर अगर जागरण कर सकते है तो बहुत ही उत्तम होगा.
भगवान् शिव जी का रुद्राभिषेक करवाए उत्तम है, उनको खीर का भोग लगाये. 

दान देने वाली जितनी भी चीज़े बताई है, वो आप सब किसी गरीब को दे सकते है या फिर ज़रूरतमंद को दे सकते है या फिर सिद्ध श्री शिव मंदिर में जाकर भी दान कर सकते है. 

Tuesday, October 23, 2012

कन्या रूप पूजनीय क्यों?


GOOD ARTICLE BY
PT. SHREE ASHU BAHUGUNA 
ON FACE BOOK


हमारे धर्मग्रन्थों में कन्या-पूजन को नवरात्र-व्रतका अनिवार्य अंग बताया गया है। छोटी बालिकाओं में देवी दुर्गा 


का रूप देखने के कारण श्रद्धालु उनकी पूजा-अर्चना करते हैं।



हिंदु धर्म में दो वर्ष की कन्या को कुमारी 
कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इसके पूजन से दुख और दरिद्रता समाप्त हो जाती है।

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तीन वर्ष की कन्या त्रिमूर्ति 
मानी जाती है। त्रिमूर्ति के पूजन से धन-धान्य का आगमन और स
ंपूर्ण परिवार का कल्याण होता है।

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चार वर्ष की कन्या कल्याणी 
के नाम से संबोधित की जाती है। कल्याणी की पूजा से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है

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पांच वर्ष की कन्या रोहिणी 
कही जाती है। रोहिणी के पूजन से व्यक्ति रोग-मुक्त होता है।

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छ:वर्ष की कन्या कालिका 
की अर्चना से विद्या, विजय, राजयोग की प्राप्ति होती है।

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सात वर्ष की कन्या चण्डिका
के पूजन से ऐश्वर्य मिलता है।

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आठ वर्ष की कन्या शाम्भवी 
की पूजा से वाद-विवाद में विजय तथा लोकप्रियता प्राप्त होती है।

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नौ वर्ष की कन्या दुर्गा 
की अर्चना से शत्रु का संहार होता है तथा असाध्य कार्य सिद्ध होते हैं।

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दस वर्ष की कन्या सुभद्रा 
कही जाती है। सुभद्रा के पूजन से मनोरथ पूर्ण होता है तथा लोक-परलोक में सब सुख प्राप्त होते हैं।.....





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