Saturday, October 6, 2012

पितृ दोष -निवारण -अन्य उपाय

READ MORE ABOUT PITRA-DOSH- AN ARTICLE BY RAMKISHAN SHARMA POSTED ON FACE BOOK BY MR. SUBHASH MALHOTRA -


निवारण - पितृ दोष के बारे में मनीषियों का मत है कि पूर्व जन्म के पापों के कारण या पितरो के शाप के कारण यह दोष कुंडली में प्रकट होता है । अत: पित्र का निवारण पितृ पक्ष में शास्त्रोक्त विधि से किया जाता है ।

अन्य उपाय -
(1) प्रत्येक अमावस्या को एक ब्राह्मण को भोजन कराने व दक्षिणा वस्त्र भेंट करने से पितृ दोष कम होता है ।

(2) प्रत्येक अमावस्या को कंडे की धूनी लगाकर उसमें खीर का भोग लगाकर दक्षिण दिशा में पितरों का आव्हान करने व उनसे अपने कर्मों के लिये क्षमायाचना करने से भी लाभ मिलता है ।

(3) पिता का आदर करने, उनके चरण स्पर्श करने, पितातुल्य सभी मनुष्यों को आदर देने से सूर्य मजबूत होता है ।

(4) सूर्योदय के समय किसी आसन पर खड़े होकर सूर्य को निहारने, उससे शक्ति देने की प्रार्थना करने और गायत्री मंत्र का जाप करने से भी सूर्य मजबूत होता है ।

(5) सूर्य को मजबूत करने के लिए माणिक भी पहना जाता है, मगर यह कूंडली में सूर्य की स्थिति पर निर्भर करता है ।

यह तय है कि पितृदोष होने से जातक को श्रम अधिक करना पड़ता है, फल कम व देर से मिलता है । अत: इस हेतु मानसिक तैयरी करना व परिश्रम की आदत डालना श्रेयस्कर रहता है ।


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Friday, October 5, 2012

पितृदोष कारण और निवारण

GOOD ARTICLE BY MR. VAGHARAM PARIHAR

परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
जिला- सिरोही (राज.) 307512
मो. 9001742766,02972-276626,09001846274
Email-pariharastro444@gmai.com

परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरांत परिवारजनों द्वारा जब उसकी इच्छाओं एवं उसके द्वाराछुटे अधुरे कार्यों को परिवारजनों द्वारा पुरा नही किया जाता। तब उसकी आत्मा वही भटकती रहती है एवं उन कार्यो को पुरा करवाने के लिए परिवारजनों पर दबाव डालती है। इसी कारणपरिवार में शुभ कार्यो में कमी एवं अशुभता बढती जाती है। इन अशुभताओं का कारण पितृदोष माना गया है। इसके निवारण के लिए श्राद्धपक्ष में पितर शांति एवं पिंडदान करना शुभ रहता हैं। 

भारतीय धर्म शास्त्रों के अनुसार ’’पुन्नाम नरकात् त्रायते इति पुत्रम‘‘ एवं ’’पुत्रहीनो गतिर्नास्ति‘‘ अर्थात पुत्रहीन व्यक्तियों की गति नही होती व पुत नाम के नरक से जो बचाता है, वह पुत्र है। इसलिए सभी लोग पुत्र प्राप्ति की अपेक्षा करते है। वर्तमान में पुत्र एवं पुत्री को एक समान माने जाने के कारण इस भावना में सामान्य कमी आई है परन्तु पुत्र प्राप्ति की इच्छा सबको अवश्य ही बनी रहती है । जब पुत्र प्राप्ति की संभावना नही हो तब ही आधुनिक विचारधारा वाले लोग भी पुत्री को पुत्र के समान स्वीकारते है। इसमे जरा भी संशय नही है।

पुत्र द्वारा किए जाने वाले श्राद्ध कर्म से जीवात्मा को पुत नामक नरक से मुक्ति मिलती है। किसी जातक को पितृदोष का प्रभाव है या नही। इसके बारे में ज्योतिष शास्त्र में प्रश्न कुंडली एवं जन्म कुंडली के आधार पर जाना जा सकता है। पाराशर के अनुसार-

कर्मलोपे पितृणां च प्रेतत्वं तस्य जायते।

तस्य प्रेतस्य शापाच्च पुत्राभारः प्रजायते।।


अर्थात कर्मलोप के कारण जो पुर्वज मृत्यु के प्श्चात प्रेत योनि में चले जाते है, उनके शाप के कारण पुत्र संतान नही होती। अर्थात प्रेत योनि में गए पितर को अनेकानेक कष्टो का सामना करनापडता है। इसलिये उनकी मुक्ति हेतु यदि श्राद्ध कर्म न किया जाए तो उसका वायवीय शरीर हमे नुकसान पहुंचाता रहता है। जब उसकी मुक्ति हेतु श्राद्ध कर्म किया जाता है, तब उसे मुक्ति प्राप्त होने से हमारी उनेक समस्याएं स्वतः ही समाप्त हो जाती है। 

पितर दोष के प्रमुख ज्योतिषिय योग-

1 लग्न एवं पंचम भाव में सूर्य , मंगल एवं शनि स्थित हो एवं अष्टम या द्वादश भाव में वृहस्पति राहु से युति कर स्थित हो पितृशाप से संतान नही होती।

2 सूर्य को पिता का एवं वृह. को पितरो का कारक माना जाता है। जब ये दोनो ग्रह निर्बल होकर शनि, राहु, केतु के पाप प्रभाव में हो तो पितृदोष होता है।

3 अष्टम या द्वादश भाव में कोई ग्रह निर्बल होकर उपस्थित हो तो पितृदोष होता है।

4 सूर्य, चंद्र एवं लग्नेश का राहु केतु से संबंध होने पर पितृदोष होता है।

5 जन्मांग चक्र में सूर्य शनि की राशि में हो एवं वृह. वक्री होकर स्थित हो तो ऐसे जतक पितृदोष से पिडित रहते है।

6 राहु एवं केतु का संबंध पंचम भाव-भावेश से हो तो पितृदोष से संतान नही होती है।

7 अष्टमेश एवं द्वादशेश का संबंध सूर्य वृह. से हो तो पितृदोष होता है।

8 जब वृह. एवं सूर्य नीच नवांश में स्थित होकर शनि राहु केतु से युति-दृष्टि संबंध बनाए तो पितृदोष होता है।

पितृदोष निवारण

1 पितृदोष निवारण के लिए श्राद्ध करे। समयाभाव में भी सर्वपितृ अमावस्या या आश्विन कृष्ण अमावस्या के दिन श्राद्ध अवश्य श्रद्धापूर्वक करे।

2 गुरूवार के दिन सायंकाल के समय पीपल पेड की जड पर जल चढाकर सात बार परिक्रमा कर घी का दीपक जलाए।

3 प्रतिदिन अपने भोजन मे से गाय, कुते व कौओ को अवश्य खिलाए।

4 भागवत कथा पाठ कराए रूा श्रवण करे।

5 नरायण बली, नागबली आदि पितृदोष शांति हेतु करे।

6 माह में एक बार रूद्राभिषेक करे। संभव नही होने पर श्रावण मास में रूद्राभिषेक अवश्य करे।

7 अपने कुलदेवी-देवता का पुजन करते रहे।

8 श्राद्ध काल में पितृसुक्त का प्रतिदिन पाठ अवश्य करे।

पितृ सुक्त


पितृदोष के निवारण के लिए श्राद्ध काल में पितृ सुक्त का पाठ संध्या समय में तेल का दीपक जलाकर करे तो पितृदोष की शांति होती है।
अर्चितानाम मूर्ताणां पितृणां दीप्ततेजसाम्।

नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्चक्षुषाम्।।
हिन्दी- जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यनत तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्य दुष्टि सम्पन्न है, उन पितरो को मै सदा नमस्कार करता है।
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा।

सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान्।।
अर्थात, जो इन्द्र आदि देवताओ, दक्ष, मारीच, सप्त ऋषियो तथा दुसरो के भी नेता है। कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता है।
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रूसोस्तयथा।

तान् नमस्याम्यहं सर्वान पितृनप्सुदधावपि।।
अर्थात, जो मनु आदि राजार्षियों, मुनिश्वरो तथा सूर्य चंद्र के भी नायक है, उन समस्त पितरो को मैं जल और समुद्र मै भी नमस्कार करता है।
नक्षत्राणां ग्रहणां च वाच्व्यग्न्योर्नभसस्तथा।

द्यावापृथिव्योश्च तथा नमस्यामि कृतांजलि5।।
अर्थात, जो नक्षत्रों ,ग्रहो,वायु,अग्नि,आकाश और द्युलोक एवं पृथ्वीलोक के जो भी नेता है, उन पितरो को मै हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।
देवर्षिणां जनितंृश्च सर्वलोकनमस्कृतान्।

अक्षच्चस्य सदादातृन नमस्येळहं कृतांजलिः।।
अर्थात, जो देवर्षियो के जन्मदाता, समस्त लोको द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता है। उन पितरो को मै हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।
प्रजापतेः कश्यपाय सोमाय वरूणाय च।

योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृतांजलिः।।
अर्थात, प्रजापति, कश्यप, सोम,वरूण तथा योगेश्वरो के रूप् में स्थित पितरो को सदा हाथ जोडकर प्रणाम करता हूँ।
नमो गणेभ्यः सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु।

स्वयंभूवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे।।
अर्थात, सातो लोको मे स्थित सात पितृगणो को नमस्कार है। मै योगदृश्टि संपन्न स्वयंभू ब्रह्मजी को प्रणाम करता है।
सोमाधारान् पितृगणानयोगमूर्ति धरांस्तथा।

नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम्।।

अर्थात, चंद्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित और योगमूर्तिधारी पितृगणों को मै प्रणाम करता हूँ। साथ ही संपूर्ण जगत के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ।

अग्निरूपांस्तथैवान्याम् नमस्यामि पितृनहम्।
अग्निषोममयं विश्वं यत एतदशेषतः।।

अर्थात, अग्निस्वरूप् अन्य पितरो को भी प्रणाम करता हूँ क्याकि यह संपूर्ण जगत अग्नि और सोममय है।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तयः।
जगत्स्वरूपिणश्चैवतथा ब्रह्मस्वरूपिणः।।

अर्थात, जो पितर तेज मे स्थित है जो ये चन्द्रमा, सूषर्् और अग्नि के रूप् मै दृष्टिगोचर होते है तथा जो जगतस्वरूप् और ब्रह्मस्वरूप् है।

तेभ्योळखिलेभ्यो योगिभ्यः पितृभ्यो यतमानसः।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुजः।।

अर्थात, उन संपूर्ण योगी पितरो को मै। एकाग्रचित होकर प्रणाम करता है। उन्हे बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझ पर प्रसन्न हो।



विशेष- यदि आप संस्कृत पाठ नही कर सके तो हिन्दी में पाठ कर भी पितृ कृपा प्राप्त कर सकते है।


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Wednesday, October 3, 2012

MAKE YOUR LIFE BETTER


HI FRIENDS !

We are always facing one or more problems in our life. Many of us make some spiritual efforts with faith and determination and get better lifestyle.

Gemmology and Vaastu Science both are indeed very helpful and supportive in improving your lifestyle and removing small hurdles.

We strongly feel that positive results of these two therapies are based on balancing positive energy, or improving positivity in your mind and home.

Problems like -


  • Children are very unstable and away from studies ! Why ?
  • No chemistry between Husband and Wife ! Why?
  • Money flows fast, no saving ! Why?
  • No Friend-Circle, No charm in life ! Why?
  • Frequently health problems, Why?
  • No Job satisfaction, No growth in Business, Why?
These above questions are answered properly in Gemmology and Vaastu Science.


You may please contact for more information if required.

Thanks
Best Wishes

Ashutosh

Write to me with Subject - "SHREEPAD SUPPORT"

ashutosh2362@gmail.com
OR
shreepadgems@gmail.com

OR

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रोग नाश हेतु करे धनतेरस का व्रत एवं पूजा


BY MR. VAGHA RAM PARIHAR ON FACE BOOK

परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
जिला- सिरोही (राज.) 307512



कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को रोग नाश हेतु व्रत किया जाता है। इस दिन आम जन धन तेरस एवं चिकित्सा क्षेत्र से संबंधित लोग धन्वन्तरी जयंति के रूप में मनाते है। इस दिन धन्वन्तरी की पुजा करते हुए व्रत किया जाता है। इसके लिए सर्वप्रथम सूर्योदय से पूर्व उठकर नहा धोकर पवित्र होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करे। फिर सूर्य देव एवं धन्वन्तरी को प्रणाम करते हुए रोग नाश की प्रार्थना करते हुए संकल्प कर व्रत प्रारंभ करे। इस दिन भगवान धन्वंतरी की कथा का वाचन अथवा श्रवण करे।

देवताओ ने सागर मंथन का महत्व बताकर दानवो को भी अपने साथ मिला दिया। क्योकि अकेले देवताओं मे सागर मंथन करने की सामथ्र्य नही थी । इस पर देव और दानवो ने मिलकर समुद्र मंथन प्रारंभ कर दिया। इस कार्य हेतु अनेक औषधियो को सागर मे डालकर मन्दरांचल को मथानी एवं वासुकि नाग को रस्सी बनाकर सागर मंथन प्रारंभ किया लेकिन मन्दरांचल का कोई आधार नही होने से वह समुद्र में धसने लगा। तब भगवान श्री हरि ने कुर्म रूप धारण कर मन्दरांचल को अपनी पीठ पर धारण कर लिया। एवं स्वयं ने अदृश्य रूप से सागर मंथन मे सहयोग भी किया। इस मंथन से हलाहल,कामधेनु,ऐरावत,उच्चैश्रवा, अश्व,अप्सराएं,कौस्तुभमणि,वारूणी,शंख,कल्पवृक्ष,चंद्रमा,लक्ष्मी जी और कदली वृक्ष प्रकट हो चुके थे। इसके पश्चात अमृत प्राप्ति के लिए पुनः समुद्र मंथन होने लगा और अंत मे हाथ मे अमृत कलश धारण किए भगवान धन्वन्तरी प्रकट हुए। भगवान धन्वन्तरी कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रकट हुए थे। इसलिए इस दिन भगवान धन्वन्तरी के निमित व्रत कर पुजा की जाती है।

भगवान धन्वन्तरी कलश लेकर प्रकट हुए थे। इसीलिए इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा चल पडी जो वर्तमान मे सोना,चांदी एवं अन्य वस्तुओ की खरीद भी की जाती है। उसी प्रकार धन की पुजा अर्चना भी की जाने लगी। इसी कारण इसे धन तेरस के नाम से भी प्रचलित हो गया। भगवान धन्वन्तरी ने जब भगवान विष्णु से कहा कि देवलोक मे मेरा स्थान और भाग भी निश्चित कर दे। इस पर भगवान विष्णु ने कहा कि देवो के बाद आने के कारण तुम ईश्वर नही हो। परंतु तुम्हे अगले जन्म मे सिद्धिया प्राप्त होकर तुम लोक मे प्रसिद्ध होंगे उसी शरीर से तुम्हे देवत्व प्राप्त होगा। फिर इन्द्र के अनुरोध पर देववैद्य का पद स्वीकार किया। फिर कुछ समय पश्चात जब पृथ्वी पर अनेक रोग फैलने लगे। तब इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान दिवोदास के रूप मे प्रकट हुए। हरिवंश पुराण के अनुसार काशिराज धन्व की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके पुत्र रूप मे जन्म लेकर धन्वंतरी नाम धारण किया। इस प्रकार इस दिन भगवान धन्वन्तरी का जन्म हुआ।
धनतेरस के व्रत मे एक बार फलाहार कर शाम को पुजन कर निम्न मंत्र का जाप करना चाहिए। जिससे आपका रोग नष्ट हो जाए।

1 ओम धन्वंतरये नमः
2 ओम नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरायैः ,
अमृत कलश हस्ताय सर्वभय विनाशाय सर्वरोग निवारणाय।
त्रिलोकपथाय त्रि लोक नाथाय श्री महाविष्णुस्वरूप ,
श्री धन्वंतरी स्वरूप श्री श्री श्री औषध चक्र नारायणाय नमः।।
3 धनतेरस के दिन संध्याकाल मे दक्षिण की तरफ मुख रखते हुए यम से प्रार्थना कर दीपक जलाए तो अकाल मृत्यु का भय नही रहता है।
4 धनतेरस के दिन रोगी व्यक्ति के सिर से लेकर पांव तक के नाप का काला धागा ले। इसे सुखे जटा नारियल पर लपेटे। नारियल को हरे कपडे मे बांधकर जल प्रवाह करे। जल प्रवाह करते समय रोगी व्यक्ति के नाम का गौत्र सहित उच्चारण करते हुए उसके शीघ्र सवस्थ होने की कामना करे तो रोगी व्यक्ति के स्वास्थ्य मे सुधार होने लगता है।
आप भी यदि किसी रोग से ग्रसित है या परिवार मे कोई रोग ग्रस्त है तो इस दिन व्रत रखकर उपरोक्त उपाय करने से अवश्य ही स्वास्थ्य लाभ होता है।

परिहार ज्योतिष अनुसंधान केन्द्र
मु. पो. आमलारी, वाया- दांतराई
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Monday, October 1, 2012

श्राद्ध में इन 10 चीजों का दान देता है तरक्की व सफलता


FROM DAINIK BHASKAR DOT COM


हिन्दू धर्म में दान को धर्म पालन का अहम और जरूरी अंग माना गया है। खासतौर पर पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्धपक्ष में किए जाने वाले सोलह श्राद्ध के श्राद्धकर्म के साथ किए जाने वाले दान न केवल पितृदोष खत्म करते हैं बल्कि घर-परिवार की तरक्की व खुशहाली में आ रही सारी रुकावटों को दूर करते हैं। पितृपक्ष में खासतौर पर दस दान महादान माने गए हैं। तस्वीरों के साथ जानिए ये दान और उनके फल - 

  1. तिल का दान - श्राद्ध के हर कर्म में तिल का महत्व है। इसी तरह श्राद्ध में दान की दृष्टि से काले तिलों का दान संकट, विपदाओं से रक्षा करता है।
  2. घी का दान - श्राद्ध में गाय के घी का एक पात्र में रखकर दान परिवार के लिए शुभ और मंगलकारी माना जाता है।
  3. सोने का दान - सोने का दान कलह का नाश करता है। किंतु अगर सोने का दान संभव न हो तो सोने के दान के निमित्त यथाशक्ति धन दान भी कर सकते हैं।
  4. अनाज का दान - अन्नदान में गेंहू, चावल का दान करना चाहिए। इनके अभाव में कोई दूसरा अनाज भी दान किया जा सकता है। यह दान संकल्प सहित करने पर मनोवांछित फल देता है।
  5. वस्त्रों का दान - इस दान में धोती और दुपट्टा सहित दो वस्त्रों के दान का महत्व है। यह वस्त्र नए और स्वच्छ होना चाहिए।
  6. चाँदी का दान - पितरों के आशीर्वाद और संतुष्टि के लिए चाँदी का दान बहुत प्रभावकारी माना गया है।
  7. भूमि दान - अगर आप आर्थिक रुप से संपन्न है तो श्राद्ध पक्ष में किसी कमजोर या गरीब व्यक्ति को भूमि का दान आपको संपत्ति और संतति लाभ देता है। किंतु अगर यह संभव न हो तो भूमि के स्थान पर मिट्टी के कुछ ढेले दान करने के लिए थाली में रखकर किसी ब्राह्मण को दान कर सकते हैं।
  8. गुड़ का दान - गुड़ का दान पूर्वजों के आशीर्वाद से कलह और दरिद्रता का नाश कर धन और सुख देने वाला माना गया है।
  9. गाय का दान - धार्मिक दृष्टि से गाय का दान सभी दानों में श्रेष्ठ माना जाता है। लेकिन श्राद्ध पक्ष में किया गया गाय का दान हर सुख और ऐश्वर्य देने वाला माना गया है।
  10. नमक का दान - पितरों की प्रसन्नता के लिए नमक का दान बहुत महत्व रखता है। इस दान के पहले यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन कराएं और उसके बाद दान करते समय यह श्लोक बोलकर भगवान विष्णु से श्राद्धकर्म की शुभ फल की प्रार्थना करें - यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु। न्यूनं सम्पूर्णतां याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्।।